Gulf War: खाड़ी युद्ध की तपिश से सुलगा यूपी-हरियाणा! इंडस्ट्रियल बेल्ट में क्यों टूटा मजदूरों के सब्र का बांध?

उत्तर प्रदेश और हरियाणा के औद्योगिक इलाकों (Industrial areas) में इन दिनों भारी अफरा-तफरी का माहौल है। फैक्ट्रियों में काम करने वाले मजदूरों का सब्र अब जवाब दे गया है, और इसकी सबसे बड़ी वजह बनी है रसोई गैस (Cooking Gas) की कीमतों में आया जबरदस्त उछाल। महंगाई के इस ताजा झटके ने मजदूरों की पुरानी वेतन संबंधी मांगों की आग में घी डालने का काम किया है। आइए जानतें हैं जमीन पर हालात किस तरह बिगड़ते चले गए?

औद्योगिक बेल्ट में चल रहे इस विरोध प्रदर्शन का सबसे बड़ा कारण रसोई गैस की बेतहाशा बढ़ती कीमतें हैं। खुले बाजार में गैस के दाम जिस तेजी से बढ़े हैं, उसने गरीब मजदूरों के घर का बजट पूरी तरह बिगाड़ दिया है। पिछले कुछ महीनों में गैस की कीमतें 100 रुपये प्रति किलो से बढ़कर सीधे 600-700 रुपये प्रति किलोतक पहुंच गई हैं।

Gulf War impact on India

कमाई पर भारी पड़ रहा खाना पकाने का खर्च

दरअसल, जो मजदूर महीने में मुश्किल से 10,000 से 13,000 रुपए कमाते हैं, उनके लिए सिर्फ खाना पकाने का खर्च ही अब 2,500 रुपए के करीब पहुंच गया है।

महंगाई की चौतरफा मार

एनसीआर (NCR) के इलाकों में रहना पहले ही महंगा था, लेकिन अब हालात काबू से बाहर हो चुके हैं। मजदूरों का कहना है कि उनकी सीमित कमाई में अब गुजर-बसर करना नामुमकिन है, क्योंकि किराया, बिजली और आने-जाने का खर्च (ट्रांसपोर्ट) लगातार बढ़ रहा है। न्यूनतम वेतन में संशोधन न होने की वजह से मजदूरों में सालों से गुस्सा भरा हुआ था, जिसे गैस की कीमतों ने सड़क पर ला दिया है।

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कहां से शुरू हुई विरोध की चिंगारी?

यह विरोध प्रदर्शन किसी एक इलाके तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने देखते ही देखते पूरे औद्योगिक बेल्ट को अपनी चपेट में ले लिया:

  • हड़ताल की शुरुआत: प्रदर्शन की शुरुआत इस महीने की शुरुआत में मानेसरके कॉन्ट्रैक्ट वर्कर्स ने की थी।
  • बड़ा आंदोलन: अब यह आंदोलन ऑटोमोबाइल और कपड़ा उद्योग के हब तक फैल चुका है। हजारों की संख्या में प्रवासी मजदूर और महिलाएं 20,000 रुपये महीनेकी न्यूनतम मजदूरी की मांग को लेकर डटे हुए हैं।

सरकार की कोशिशें नाकाम

तनाव को कम करने के लिए प्रशासन और राज्य अधिकारियों ने वेतन बढ़ाने की घोषणा तो की है, लेकिन मजदूर इससे संतुष्ट नहीं हैं। प्रदर्शनकारियों का साफ कहना है कि प्रशासन द्वारा की गई बढ़ोतरी ऊंट के मुंह में जीरे के समान है और उनकी जरूरतों के हिसाब से यह बेहद अपर्याप्त है।

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