Gujarat Election 2022: गुजरात चुनाव से ठीक पहले वोटरों के सामने बड़े मुद्दे क्या हैं ? चौंकाने वाला सर्वे

Gujarat Assembly Election 2022 Dates And Phases : गुजरात विधानसभा चुनाव की घंटी बज चुकी है। राज्य में पांच वर्ष पहले 182 सीटों के लिए दो फेज में ही चुनाव हुए थे। भाजपा को 99 और कांग्रेस को 77 सीटें मिली थीं। लेकिन, इसबार आम आदमी पार्टी की जोरदार मौजूदगी के चलते समीकरण बदल चुके हैं। हम आपको यह बताना चाह रहे हैं कि इस बार चुनावों से ठीक पहले मतदाताओं के सामने बड़े मुद्दे क्या हैं? वे किन मुद्दों पर वोट देने की सोच रहे हैं? एक सर्वे हुआ है, जिससे सत्ताधारी बीजेपी की चिंताएं बढ़ सकती हैं। क्योंकि, इस समय अधिकतर मतदाता बढ़ती कीमतें और बेरोजगारी के मसलों से परेशान हैं।

गुजरात चुनावों को लेकर हुए एक बड़ा सर्वे

गुजरात चुनावों को लेकर हुए एक बड़ा सर्वे

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2013-14 से केंद्र की राजनीति में सक्रिय हुए हैं और अब उसके करीब एक दशक होने वाले हैं। तब विकास का गुजरात मॉडल पूरे देश के लिए एक उदाहरण था। पीएम मोदी के गुजरात से निकलने के बाद दिसंबर में वहां दूसरा विधानसभा चुनाव होने जा रहा है। 2012 के विधानसभा चुनावों तक गुजरात का नेतृत्व सीधे उन्हीं के हाथों में था। सवाल है कि गुजराती वोटरों के मन में क्या वह गुजरात मॉडल अभी भी बरकरार है या उसमें कुछ बदलाव हुआ है। या फिर वोटर और चीजों की ओर देखने लगे हैं। हाल ही में लोकनीति और सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (CSDS) ने एक सर्वे किया है, जिससे वहां के मतदाताओं के दिमाग में पैदा हो रहे सवालों का एक अनुमान मिला है।

अभी गुजरात में महंगाई सबसे बड़ा मुद्दा- सर्वे

अभी गुजरात में महंगाई सबसे बड़ा मुद्दा- सर्वे

गुजरात में सर्वे के दौरान जब लोगों से सीधा सवाल किया गया कि जब आप वोट डालने जाएंगे तो आपके सामने सबसे बड़ा मुद्दा क्या रहेगा? इसमें 51% लोगों का जवाब था-महंगाई। जबकि, 2017 के चुनाव में सिर्फ 15% लोगों के लिए ही गुजरात में महंगाई कोई मुद्दा था। इसी तरह 2022 में 15% लोगों के सामने बेरोजगारी सबसे महत्वपूर्ण मसला रहने वाला है, जो कि 2017 में सिर्फ 11% था। इसबार 6% लोग सरकार के काम पर वोट देंगे। हालांकि, अभी सिर्फ 6% लोगों के सामने ही भूख या गरीबी कोई मुद्दा है, जबकि पांच साल पहले ऐसे लोगों की संख्या 9% थी। बाकी मुद्दों को इसबार 22% लोग अहमियत देंगे, जो कि 2017 में 65% था। यानि 10 में से 7 लोगों के मन में अर्थव्यवस्था से जुड़े मसले प्रभावी तौर पर होंगे।

इस साल विधानसभा चुनावों में महंगाई कितना बड़ा मुद्दा रहा ?

इस साल विधानसभा चुनावों में महंगाई कितना बड़ा मुद्दा रहा ?

हालांकि, महंगाई और बेरोजगारी के मसले को लेकर गुजरात के लोग अभी जिस तरह से सोच रहे हैं और चुनावों में वोटिंग पर उसका क्या असर पड़ेगा? यह दो अलग-अलग बातें हैं। क्योंकि, ऐसा नहीं है कि महंगाई अचानक आ गई है या बेरोजगारी एकाएक पैदा हो गई है। यह समस्याएं कमोबेश हमेशा रहती हैं और चुनावों में उसे भुनाने में विपक्षी दल कितना कामयाब हो पाते हैं और सत्ताधारी दल वोटरों को मौजूदा आर्थिक हालातों को किस तरह से समझा पाता है, सबकुछ इसपर निर्भर होता है। इसी साल हुए कुछ राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव इसके बेहतरीन साक्ष्य हैं। जब वोटर वोट डालने पहुंचे तो बढ़ती कीमतों पर उत्तर प्रदेश में सिर्फ 6%, उत्तराखंड में भी 6%, गोवा में 3% और पंजाब में महज 2% लोगों ने ही वोट डाला था। इसी तरह बेरोजगारी के मुद्दे पर क्रमश: 7%, 14%, 8% और 9% फीसदी लोगों ने ही वोट डाला था। जबकि, सरकार के कामकाज पर यूपी में 10%, उत्तराखंड में 9% और गोवा, पंजाब में 7-7% लोगों ने वोट डाला था।

गुजरात के वोटरों के लिए सबसे अहम मुद्दे

गुजरात के वोटरों के लिए सबसे अहम मुद्दे

गुजरात के मतदाताओं से एक सवाल यह पूछा गया कि विधानसभा चुनावों में आपके सामने बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण, थोड़ा-बहुत महत्वपूर्ण, बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं और बिल्कुल महत्वपूर्ण नहीं मुद्दे क्या होंगे ? इसमें बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण मुद्दे पर जवाब इस तरह आया है-

बढ़ती कीमतें- 84%

बेरोजगारी- 77%

बदलाव- 52%

हिंदुत्व- 50%

लंपी रोग- 41%

जातिगत भेदभाव- 35%

बिलकिस बानो के दोषियों की रिहाई- 28%

पाटीदारों की ओबीसी स्टैटस की मांग- 14%

कल्याणकारी योजनाओं की सफलता बड़ा हथियार

कल्याणकारी योजनाओं की सफलता बड़ा हथियार

वैसे एक पक्ष ये भी है कि विभिन्न सरकारी कल्याणकारी योजनाओं को लोगों तक पहुंचाने में सरकार का प्रदर्शन कुल मिलाकर बेहतर है। इसलिए, सत्ताधारी बीजेपी के पास आर्थिक चुनौतियों से निपटने के लिए यह कल्याणकारी योजनाएं एक मजबूत हथियार का काम कर सकती हैं, जिसके दम पर अर्थव्यस्था के मोर्चे पर बन रही नकारात्मक छवि से उबरने की कोशिश की जा सकती है। यानि, आर्थिक चुनौतियों का सामना वोटरों को तो करना पड़ रहा है, लेकिन मतदान वाले दिन ईवीएम का बटन दबाने तक वोटरों के दिमाग में यही मुद्दे हावी रहेंगे, इसका अनुमान लगाना चुनावी पंडितों के लिए भी टेढ़ी खीर है और यह कई चुनावों में साबित भी हो चुका है।

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