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गोल्‍डमैन सैक्‍स ने बताया भारत के लिये क्यों जरूरी हैं नरेंद्र मोदी

narendra modi
बेंगलूर। लीडिंग अमेरिकन इनवेस्‍टमेंट बैंक गोल्‍डमैन सैक्‍स ने एक बार फिर नरेंद्र मोदी की तारीफों के पुल बांधे हैं। गोल्‍डमैन सैक्‍स की शुक्रवार को जारी हुई एक रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर देश में गुजरात की तरह लेबर लॉ होते तो देश में पिछले 10 वर्षों में 10 से 20 मिलियन भारतीय युवाओं को अच्‍छी नौकरियां मिल सकती थीं। अमेरिकन न्‍यूजपेपर वॉल स्‍ट्रीट जनरल में इस बात की जानकारी दी गई है।

पढ़ें- मोदी विरोधी हैं तो पढ़ें इक्नॉमिक फ्रीडम की रिपोर्ट

वॉल स्‍ट्रीट जनरल ने यह साफ कर दिया है कि इस रिपोर्ट से यह नहीं समझा जाना चाहिए गोल्‍डमैन सैक्‍स बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्‍मीदवार और गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए चुनावों के मद्देनजर किसी तरह की कै‍पेनिंग कर रहा है। बल्कि इस रिपोर्ट के जरिए सिर्फ यह बताने की कोशिश की जा रही है कि कैसे भारत ने मजदूरों और प्रोफेशनल्‍स को तकलीफ पहुंचाने वाले कड़े लेबर लॉ को अपनाया हुआ है। हालांकि यह भी सच है कि गोल्‍डमैन सैक्‍स पहले भी नरेंद्र मोदी की तारीफ कर चुका है।

सात साल में सिर्फ दो मिलियन नौकरियां

गोल्‍डमैन सैक्‍स ने लिखा है कि पिछले एक दशक में भारत में आर्थिक प्रगति तो हुई है लेकिन इस देश में लोगों की जरूरतों के हिसाब से नर्इ नौकरियों के अवसर पैदा नहीं किए जा सके हैं। दुनिया का दूसरे सबसे ज्‍यादा जनसंख्‍या वाले और एशिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्‍यवस्‍था के रूप में पहचाने जाने वाले भारत में कृषि क्षेत्रों में नौकरियों के अवसरों को पैदा करने में अभी भी खासी दिक्‍कतों का सामना करना पड़ रहा है।

चीन, जापान और पूरे एशिया में किसान फैक्ट्रियों की ओर आ रहे हैं जिसकी वजह से इन जगहों पर सामाजिक बदलाव और शहरीकरण तेजी से हो रहा है लेकिन भारत में ऐसा कुछ भी नजर नहीं आता है। दूसरे कई अर्थशास्त्रियों की तरह ही गोल्‍डमैन का भी मानना है कि देश की आर्थिक तरक्‍की के बावजूद नौकरियों के अवसर न आने की सबसे बड़ी वजह है कि यहां पर कंपनियां जब लोगों को हायर करती हैं उन्‍हें सजा मिलती है। इंप्‍लॉयज की एक निश्वित संख्‍या साधारणतया 50 या 100 तक पहुंच जाने पर भारतीय कानूनों के तहत उन्‍हें कई मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। इसका नतीजा है कि उद्यमी यहां पर छोटे उद्योगों तक ही सीमित रहते हैं, इस तरह के उद्योगों से दूर रहते हैं जो मजदूरों को आकर्षित करें और लोगों को काम पर रखने के बजाय वह मशीनों का प्रयोग ज्‍यादा करते हैं।

गोल्‍डमैन के मुताबिक जब देश में ज्‍यादा से ज्‍यादा फैक्‍ट्री जॉब्‍स आनी चाहिए, बहुत कम नौकरियों के अवसर उत्‍पन्‍न हो रहे हैं। गोल्‍डमैन की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2005 से साल 2010 के वित्‍तीय वर्षों के खत्‍म होने तक भारत में पांच मिलियन मैन्‍यूफैक्‍चरिंग जॉब्‍स के अवसर मिल सकते थे लेकिन ऐसा नहीं हो सका। गोल्‍डमैन ने लिखा है, 'जिन उद्योगों से नौकरियां सबसे ज्‍यादा गायब हो रही हैं वह टेक्‍सटाइल, इलेक्‍ट्रॉनिक्‍स और वस्‍त्र उद्योग हैं।'

गोल्‍डमैन के एक अनुमान के मुताबिक साल 2005 से साल 2012 तक भारत में इंप्‍लॉयमेंट ग्रोथ सिर्फ दो मिलियन ही रही है। जबकि साल 2002 से साल 2005 तक यही ग्रोथ 12 मिलियन तक थी। जब सर्विसेज सेक्‍टर में अच्‍छी नौकरियां होनी चाहिए थी, लेबर लॉ ने उन पर रोक लगा दी।

तो अगले10 वर्षों में होंगी 40 मिलियन नई नौकरियां

गोल्‍डमैन ने अपनी रिपोर्ट में साफ कहा है कि देश में जहां नौकरियों के अवसर कम आ रहे थे वहीं गुजरात पर इसका कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। गोल्‍डमैन की रिपोर्ट की मानें तो गुजरात का रुख इन कानूनों के प्रति काफी लचीला था। यहां पर कंपनियों को आजादी दी गई कि वह अपनी इच्‍छा के मुताबिक लोगों को हायर करें या फिर उन्‍हें निकाल दें। इस तरह से गुजरात में मैन्‍यूफैक्‍चरिंग सेक्‍टर्स से जुड़ी ज्‍यादा से ज्‍यादा नौकरियों के अवसर सामने आए।

गोल्‍डमैन ने अपनी रिपोर्ट में वेस्‍ट बंगाल का उदाहरण दिया जहां कड़े कानूनों की वजह से हालात अच्‍छे नहीं है। गोल्‍डमैन के मुताबिक भारत में अगर गुजरात की तर्ज पर ही नियमों में ढील दे जाए तो अगले 10 वर्षो के दौरान पूरे देश में मैन्‍यूफैक्‍चरिंग सेक्‍टर से जुड़ी 40 मिलियन नई नौकरियों के अवसर पैदा किए जा सकेंगे। वहीं अगर भारत इससे थोड़ा आगे जाए तो देश में इतने ही वर्षों में 110 मिलियन नई नौकरियां पैदा की जा सकेंगी।

क्या लिखा है गोल्डमैन सैक्स ने।

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