Goa assembly elections 2022: क्या गोवा ममता बनर्जी का दूसरा लॉन्चिंग पैड बनेगा ?

क्या गोवा तृणमूल कांग्रेस के राजनीतिक प्रक्षेपण का दूसरा लॉन्चिंग पैड बनेगा ? क्या ममता बनर्जी के मिशन 2024 में गोवा की खास भूमिका होने वाली है ? राजनीतिक पंडितों का मानना है कि ममता बनर्जी 2024 में पीएम पद का उम्मीदवार बनने के लिए कुछ और राज्यों में जीत का डंका बजाना चाहती हैं। उनकी तीनदिवसीय गोवा यात्रा से राजनीति के नये परिदृश्य उभरे हैं। गोवा के पूर्व मुख्यमंत्री लिईजिन्हो फेलेरियो पहले ही तृणमूल में शामिल हो चुके हैं। अब मशहूर टेनिस खिलाड़ी लिएंडर पेस और अभिनेत्री नफीसा अली जैसी चर्चित हस्तियां भी पार्टी में आ चुकी हैं। लियेंडर पेस के पिता और ओलम्पिक पदक विजेता डॉ. वेस पेस दक्षिण गोवा के वेलिम गांव के रहने वाले हैं। ममता बनर्जी एक तरफ गोवा में तृणमूल के विस्तार में लगी हैं तो दूसरी ओर क्षेत्रीय दलों से गठबंधन की संभावनाएं भी तलाश रही हैं।

तृणमूल का गोवा अभियान

तृणमूल का गोवा अभियान

पश्चिम बंगाल में प्रचंड जीत से उत्साहित ममता बनर्जी इसी मुहिम के तहत गोवा फॉरवर्ड पार्टी के प्रमुख और पूर्व डिप्टी सीएम विजय सरदेसाई से मुलाकात कर चुकी हैं। विजय सरदेसाई की पार्टी को 2017 में तीन सीटें मिली थीं और उन्होंने 13 सीटें जीतने वाली भाजपा को सरकार बनाने में मदद की थी। एनसीपी के विधायक और पूर्व मुख्यमंत्री चर्चिल अलेमाओ भी ममता बनर्जी से मिल चुके हैं। निर्दलीय विधायक रोहन काउंते भी प्रशांत किशोर के सम्पर्क में हैं । उनका कहना है कि वे गोवा में ममता के विजन को समझने के बाद ही आगे कोई फैसला लेंगे। गोवा में भाजपा की सरकार है। कांग्रेस 17 सीटें जीत कर भी सरकार नहीं बना सकी थी। ममता बनर्जी अन्य दलों के सहयोग से भाजपा के खिलाफ एक मजबूत मोर्चा बनाना चाहती हैं ताकि उसे हराया जा सके। तृणमूल के गोवा अभियान का खाका प्रशांत किशोर तैयार कर रहे हैं। वे निर्दलीय विधायकों और अन्य दलों के मजबूत नेताओं को तृणमूल से जोड़ने की रणनीति बना रहे हैं। तृणमूल के चर्चित सांसद डेरिक ऑ ब्रायन भी प्रशांत किशोर को सहयोग कर रहे हैं।

ममता ने राजनीतिक विस्तार के लिए गोवा को ही क्यों चुना ?

ममता ने राजनीतिक विस्तार के लिए गोवा को ही क्यों चुना ?

पश्चिम बंगाल में मां, माटी और मानुष की राजनीति करने वाली ममता बनर्जी भविष्य की तलाश में गोवा कैसे पहुंच गयी ? दोनों राज्यों की सामाजिक- राजनीतिक पृष्ठभूमि में जमीन आसमान का अंतर है। भाषा और संस्कृति भी अलग-अलग है। गोवा की अतिआधुनिक जीवनशैली पश्चिम बंगाल की परम्परावादी सोच से मेल नहीं खाती। तो फिर ममता बनर्जी को गोवा में कैसे प्रबल राजनीतिक संभावनाएं दिखनी लगीं ? दरअसल ममता बनर्जी के भतीजे और तृणमूल के महासचिव अभिषेक बनर्जी को यह दायित्व सौंपा गया था कि वे वैसे राज्यों की पहचान करें जहां पार्टी के विस्तार के लिए अनुकूल संभावनाएं हैं। अभिषेक बनर्जी और प्रशांत किशोर में गहरी दोस्ती है। प्रशांत किशोर की टीम ने अनुकूल राज्यों की पहचान के लिए कई सर्वे और रिसर्च किये। इसके आधार पर एक मान्यता स्थापित की गयी, "टारगेट जितना छोटा होगा उसको एचीव करने की संभावना उतनी ही अधिक होगी।" मतलब जिन राज्यों में विधानसभा की कम सीटें हैं, अगर तृणमूल मेहनत करे तो सार्थक परिणाम निकल सकते हैं। इस कड़ी में त्रिपुरा, मेघालय और गोवा को प्रथम वरीयता में रखा गया। गोवा में 2022 में विधानसभा का चुनाव होना है। इसलिए तृणमूल ने सबसे पहले 'मिशन गोवा' शुरू किया। गोवा में विधानसभा की 40 सीटें हैं। बहुमत के लिए 21 सीटें चाहिए।

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    केवल ममता ही रोक सकती हैं मोदी को !

    केवल ममता ही रोक सकती हैं मोदी को !

    पश्चिम बंगाल में विजय के बाद तृणमूल यह स्थापित करने की कोशिश में है कि सिर्फ ममता बनर्जी ही नरेन्द्र मोदी को रोक सकती हैं। नरेन्द्र मोदी और अमित शाह पश्चिम बंगाल में धुआंधार प्रचार के बाद भी भाजपा को जीत नहीं दिला सके थे। साथ ही साथ यह संदेश भी दिया जा रहा है कि अब कांग्रेस में वो ताकत नहीं रही कि वह नरेन्द्र मोदी का विकल्प बन सके। मतलब तृणमूल, कांग्रेस को भाजपा विरोधी राजनीति के केन्द्र से हटा कर खुद वह जगह लेना चाहती है। लेकिन इसके लिए सांसदों का संख्याबल जरूरी है। सबसे बड़ा विपक्षी दल बन कर ही तृणमूल यह स्थान प्राप्त कर सकती है। इसके लिए आवश्यक है कि उसे दूसरे राज्यों में भी चुनावी जीत मिले। तृणमूल इसी मकसद से गोवा के चुनावी मैदान में उतरी है। गोवा की राजनीति मुम्बई की बरसात की तरह रंग बदलती रहती है। दल बदल यहां एक सामान्य राजनीतिक घटना है। 2017 में कांग्रेस के 17 विधायक जीते थे। लेकिन अक्टूबर 2021 के आते-आते केवल चार विधायक ही कांग्रेस में बचे। फेलेरियों ने जब कांग्रेस छोड़ी थी तब वे पार्टी को अलविदा कहने वाले 13वें विधायक थे। यानी गोवा में सबसे बड़ी पार्टी रही कांग्रेस का अब विध्वंस हो चुका है। तृणमूल कांग्रेस के विध्वंश पर ही अपनी नयी इमारत खड़ा करना चाहती हैं।

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