आर्टिकल-370 के मुद्दे पर कांग्रेस में कौन नहीं था साथ? गुलाम नबी आजाद ने राहुल गांधी के खास का लिया नाम

गुलाम नबी आजाद ने अपनी आत्मकथा में कांग्रेस को लेकर कई ऐसे खुलासे किए हैं, जिससे पार्टी में खलबली मच सकती है। उन्होंने जयराम रमेश, आर्टिकल 370 से लेकर सोनिया तक पर कई खुलासे किए हैं।

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कांग्रेस के पूर्व नेता और डेमोक्रैटिक प्रोग्रेसिव आजाद पार्टी के चीफ गुलाम नबी आजाद ने अपनी आत्मकथा में आर्टिकल-370 को लेकर कांग्रेस और उसके नेताओं पर जमकर निशाना साधा है। उन्होंने बताया है कि पार्टी किस तरह से इस मसले पर पहले कही गई बातों से पीछे हट रही है। सबसे बड़ी बात ये है कि उन्होंने इस मामले में राहुल गांधी के बहुत ही खास माने जाने वाले सांसद जयराम रमेश पर बहुत बड़ा आरोप लगाया है।

उन्होंने कहा है कि संसद में भी जब उनकी अगुवाई में आर्टिकल-370 का विरोध चल रहा था तो जयराम वहां से कन्नी काट गए थे। आजाद ने कांग्रेस की कमजोरी की शुरुआत से लेकर सोनिया गांधी की राजनीति में दिलचस्पी बढ़ने तक को लेकर कई बड़े राज खोले हैं।

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गुलाम ने कांग्रेस के अंदर के कई राज खोले
कांग्रेस के पूर्व दिग्गज नेता गुलाम नबी आजाद ने अपनी आत्मकथा में कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति को लेकर कई बड़े खुलासे किए है। उन्होंने पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के समय से लेकर सोनिया गांधी की अध्यक्षता तक पार्टी की गतिविधियों पर अपनी दिल की बात को किताब में लिखने के दावे किए हैं।

इसी में उन्होंने 2019 में मोदी सरकार की ओर से जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल-370 खत्म किए जाने के समय में कांग्रेस की कश्मकश की भी बात लिखी है। उन्होंने इस मसले पर कांग्रेस के संचार प्रभारी और पार्टी महासचिव जयराम रमेश पर सीधा हमला किया है।

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आर्टिकल-370 के विरोध में जी-23 का बड़ा रोल
गुलाम नबी आजाद ने अपनी किताब में लिखा है कि जिन पांच तात्कालिक कांग्रेसी सांसदों ने जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल-370 खत्म किए जाने पर संसद में भाषण दिया, वह सारे के सारे जी-23 के सदस्य थे, जिन्होंने कांग्रेस में आंतरिक लोकतंत्र की बहाली को लेकर तत्कालीन पार्टी

अध्यक्ष सोनिया गांधी को बड़ी चिट्ठी लिखी थी। इसमें खुद आजाद, आनंद शर्मा, कपिल सिब्बल, मनीष तिवारी और शशि थरूर शामिल थे। लेकिन, इसके साथ ही आजाद ने जयराम पर बहुत गंभीर आरोप लगाए हैं।

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'आर्टिकल-370 के विरोध में आने से जयराम रमेश ने किया इनकार'
पूर्व केंद्रीय मंत्री ने लिखा है कि जब कांग्रेस के राज्यसभा सांसद उनकी अगुवाई में (तब वे उच्च सदन में नेता प्रतिपक्ष थे) सदन के वेल में आर्टिकल 370 के खात्मे के लिए लाए गए प्रस्ताव के खिलाफ धरना दे रहे थे तो जयराम रमेश ने उनके साथ आने से इनकार कर दिया था। जयराम रमेश आजकल कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व में काफी प्रभावी माने जाते हैं।

वह पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष और लोकसभा की सदस्यता से अयोग्य ठहराए जा चुके राहुल गांधी के बहुत ही खास नेता हैं। आजाद की शिकायत है कि सीडब्ल्यूसी में आर्टिकल 370 हटाने के खिलाफ प्रस्ताव पारित होने के बावजूद कांग्रेस नेतृत्व ने अब तो इसपर बात करना भी बंद कर दिया है।

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कहां से हुई कांग्रेस की कमजोरी की शुरुआत?
पूर्व कांग्रेसी दिग्गज ने अपनी किताब में यह भी चर्चा की है कि कांग्रेस की कमजोरी कहां से शुरू हुई। उन्होंने इसके लिए 1963 में नेहरू के जमाने में लागू हुआ कामराज प्लान को जिम्मेदार बताया है। आजाद के मुताबिक कामराज योजना की वजह से ही कांग्रेस में हाई कमांड की परंपरा शुरू हुई थी।

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    तब पार्टी के ताकतवर नेताओं की जगह नामित नेताओं की नियुक्ति करने की परंपरा डाली गई और पार्टी को इसका खामियाजा आजतक भुगतना पड़ रहा है। तब उन्हीं की सलाह पर नेहरू ने तमाम जनाधार वाले मुख्यमंत्रियों और केंद्रीय मंत्रियों का इस्तीफा ले लिया था। आजाद लिखते हैं, 'मैं आज भी समझ नहीं पाता हूं कि कामराज योजना के पीछे का असली मकसद क्या था।'

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    'अध्यक्ष बनने के लिए 5 मिनट में तैयार हुईं सोनिया'
    इसी तरह उन्होंने पहली बार सोनिया गांधी के सक्रिय राजनीति में आने को लेकर भी बड़ा खुलासा किया है। उन्होंने बताया है कि शरद पवार और एके एंटनी की मौजूदगी में सोनिया ने उनसे कहा था कि कांग्रेस की अध्यक्षता संभालने के लिए सीडब्ल्यूसी के प्रस्ताव पर सोचने के लिए 6 महीने का समय चाहिए।

    जब उन्होंने उन्हें समझाया कि राजनीति में यह बहुत लंबा वक्त होता है और हो सकता है कि तब कोई सक्षम व्यक्ति अध्यक्ष बन चुका हो तो मुश्किल होगी। उन्होंने लिखा है कि उन्होंने सोनिया से कहा कि उन्हें अभी फैसला करना होगा। 'करीब पांच मिनट तक देखने के बाद उन्होंने कहा कि वह दायित्व संभालने के लिए तैयार हैं।'

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