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गांधी @ 150: जब गांधी धोती और लंगोट में बकिंघम पैलेस पहुंचे

गांधी
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महात्मा गांधी की ज़िंदगी का एक पहलू उनका मज़ाकिया होना था. बल्कि गांधी खुद अपने बारे में कहते थे कि अगर मुझमें सेन्स ऑफ ह्यूमर ना होता, मैं मज़ाक ना कर सकता तो मैंने आत्महत्या कर ली होती.

उनको यह लगता था कि काम का बोझ इतना ज़्यादा है कि उसमें डूब जाना जान गंवा देने के बराबर होगा. इसलिए वो अक्सर लोगों को हंसाते रहते थे और जब मौक़ा मिलता था खुद भी ठहाका लगाकर हंसते थे.

कुछ किस्से उनके बारे में बहुत मशहूर हैं. मसलन एक बार एक अंग्रेज़ रिपोर्टर ने उनसे पूछा, "आप तीसरे दर्जे में सफ़र क्यों करते हैं?"

इसके जवाब में उन्होंने कहा, "बहुत आसान है, इसलिए कि चौथा दर्जा नहीं होता."

महात्मा गांधी
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दूसरा किस्सा है लंदन के बकिंघम पैलेस में किंग जॉर्ज पंचम से उनकी मुलाक़ात के समय का.

जब गांधी जी गोल मेज़ सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए लंदन गए थे. वो अपनी धोती और लंगोट पहनकर ही बकिंघम पैलेस चले गए थे.

इस पर तमाम लोगों को ऐतराज़ था, उन्हें लगता था कि गांधी को अच्छी तरह से ठीक-ठाक कपड़े पहनने चाहिए.

इस पर गांधी ने कहा, "मुझे कपड़े पहनने की क्या ज़रूरत है, जितने कपड़े आपके राजा के बदन पर हैं वो हम दोनों के लिए काफी हैं."

ये अंदाज़ था गांधी के बात करने का.

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लेकिन मैं आपको दूसरे दो किस्से बताता हूं जिनसे से आपको यह अंदाज़ा होगा कि गांधी किसी बेहद गंभीर स्थिति को भी कैसे हल्का बना देते थे.

बात 1910 की है, उस वक्त गांधी जोहन्सबर्ग में थे. वहां सरकारें हर रोज़ नए फरमान जारी करती थी, उसी दौरान एक फरमान आ गया कि जिनकी शादियां दक्षिण अफ़्रीका में नहीं हुई हैं, वहां रजिस्टर्ड नहीं हैं. उनको पति पत्नी नहीं माना जाएगा.

यह बात बहुत गंभीर थी क्योंकि इससे कई लाख भारतीय मूल के लोग प्रभावित होने वाले थे.

गांधी घर लौटे और उन्होंने बा को यानी कस्तूरबा जी को आवाज़ दी और कहा, "तुम आज से मेरी रखैल हो गई."

बा ने कहा, "क्या बात हुई? मेरी शादी हुई है, आप इस तरह की बात कैसे कह रहे हैं?"

गांधी ने कहा, "सरकार ने क़ानून बना दिया है अब हमारी शादी मान्य नहीं है. और अब अगर तुम मेरे साथ रहोगी तो मेरी रखैल रहोगी."

ये बात सिर्फ घर के अंदर नहीं रही, ये बात फैलने लगी. पूरे दक्षिण अफ़्रीका में जो भारतीय समाज था उसके बीच ये बात फैल गई और फिर बा ने वहां भारतीय लोगों को संगठित किया.

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पहली बार दक्षिण अफ़्रीका में आंदोलन के समय औरतें और बच्चे अपने-अपने घरों से बाहर निकले. उन्होंने छह मील लंबा जुलूस निकाला और सरकार को ये क़ानून वापस लेना पड़ा.

ये सिर्फ़ एक बात कहने का ढंग ही था जो आपको बताता है कि गांधी कैसे सोचते थे और कैसे चीज़ों को अपने हक़ में बदल देते थे.

एक किस्सा और है उनका. जब गांधी हिंदुस्तान लौट चुके थे तो लोगों ने उनसे कहा, "मुसलमान बहुत अड़ियल किस्म के लोग हैं, ये कोई बात ही नहीं सुनते."

"हम उनसे सुलह की बात करते हैं. हम उनसे कहते हैं कि आंदोलन में साथ आइए. लेकिन वो इसमें भाग लेने के लिए राजी ही नहीं है."

"हमने उन्हें बहुत समझाया, बहुत कहा कि हिंदुस्तान तुम्हारा भी मुल्क है. तुम यहीं पैदा हुए हो. इसके अलावा कहां जाओगे तुम. लेकिन कोई राजी नहीं है सुनने को."

तब गांधी ने उन लोगों से कहा, "आप डंडा लेकर किसी लड़की के पास जाएंगे और उससे पूछेंगे कि मुझसे इश्क करोगी. तो क्या करेगी वो, आपको भगा देगी."

"जब आप किसी से बात करें तो नरमी रखें- अपने स्वभाव में, अपने शब्दों में और अपनी आवाज़ में. कायदे से बात करिए. कोई इतना नामुनासिब हो ही नहीं सकता कि वो आपकी बात ही ना सुने."

"सब सुनेंगे, सब साथ होंगे, हिंदुस्तान आज़ाद होगा."

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