G-20 Presidency: भारत के पास आने वाला है सुनहरा मौका, इन लंबित मुद्दों को सुलझाया सकता है- SBI Research
नई दिल्ली, 22 मई: दिसंबर से भारत को जी-20 की अध्यक्षता मिलने वाली है। इस समय यह दुनिया का बहुत बड़ा आर्थिक समूह है, जिसकी दुनिया की जीडीपी में 85% भागेदारी है। इस समूह के सदस्य देशों में दुनिया की अधिकांश आबादी रहती है और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भी लगभग इसका पूरी तरह से कंट्रोल है। ऐसे में एसबीआई रिसर्च का कहना है कि अध्यक्षता करते हुए भारत ऐसे कई लंबित मुद्दों को सुलझा सकता है, जिसके कारण आज भी विकसित और विकासशील देशों के बीच आर्थिक मोर्चे पर कई तरह की विसंगतियां मौजूद हैं, जिसका लाभ खासकर भारत जैसी तेजी से बढ़ी वैश्विक अर्थव्यस्था को मिल सकता है।

जी-20 की अध्यक्षता भारत के लिए सुनहरा मौका- एसबीआई रिसर्च
दिसंबर में भारत को जी-20 की अध्यक्षता मिलने वाली है। न्यूज एजेंसी एएनआई की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि एसबीआई रिसर्च की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक यह देश के लिए विकाशसील देशों के खिलाफ वैश्विक स्तर पर लंबे समय से जारी विसंगतियों को दूर करने का सुनहरा मौका है। रिपोर्ट के मुताबिक विशेष तौर पर कृषि और खाद्य सब्सिडी के क्षेत्र में यह भारत के लिए एक बहुत ही अच्छा अवसर साबित हो सकता है। भारत 1 दिसंबर, 2022 से लेकर 30 नवंबर, 2023 तक जी-20 की अध्यक्षता करने वाला है।

दुनिया की जीडीपी में 85% जी-20 की भागीदारी
इस समय जी-20 की अर्थव्यवस्था का वैश्विक जीडीपी में 85% भागीदारी है। इसकी आबादी दुनिया की दो-तिहाई है और यह अंतरराष्ट्रीय व्यापार में 75% योगदान दे रहा है, जिससे यह अंतरराष्ट्रीय आर्थिक सहयोग के लिए प्रमुख मंच बन चुका है। रिपोर्ट में कहा गया है कि 2016 में अमेरिका में प्रति किसान 60,586 डॉलर का डोमेस्टिक सपोर्ट था, जबकि यूके में यह 6,762 डॉलर का था। जबकि, महामारी की वजह से अब इसमें काफी उछाल आ चुका होगा। रिपोर्ट में कहा गया है कि यहां तक की चीन का ये समर्थन भी भारत से करीब-करीब चार गुना ज्यादा है।

कृषि सब्सिडी पर बहस शुरू करने का है अवसर
कृषि के मुद्दों में एक महत्वपूर्ण विषय सब्सिडी है। विकसित देशों में किसानों को मिलने वाली ज्यादा सब्सिडी उनके कृषि उत्पादों को वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धात्मक तौर पर ज्यादा सशक्त बनाते हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि 'जहां तक भारत की बात है तो हम महामारी के बाद की संख्या को भी देखें तो यह मुश्किल से 600 डॉलर है। इस तरह से शायद कृषि सब्सिडी को लेकर विकसित और विकासशील देशों के बीच बहस शुरू करने का एक अच्छा तरीका हो सकता है।' विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के नियमों के तहत, व्यापार विकृतियों को पैदा करने वाली कृषि सब्सिडी की अनुमति नहीं है।

भारत जैसे विकासशील देशों के सामने है बड़ी चुनौती
विकसित और विकासशील देशों में सब्सिडी की सीमा उनके कृषि उत्पादन का क्रमश: 5% और 10% है। रिपोर्ट में बताया गया है कि 1987 की कीमतों के आधार पर (जो कि रेफ्रेंस वर्ष है) भारत को विश्व व्यापार संगठन के 10 फीसदी के दायरे में सब्सिडी को लाने के लिए मौजूदा दी जा रही सब्सिडी में 92 फीसदी की कटौती करनी पड़ जाएगी। इसका मतलब यह होगा कि भारत में कृषि सब्सिडी को ही पूरी तरह से मिटा दिया जाए, जबकि ग्रामीण अर्थव्यवस्था वाले भारत जैसे देश के लिए यह कल्पना से भी बाहर की बात है। यह अनुमान भारत सरकार की ओर से दी जाने वाली विभिन्न सब्सिडी को ध्यान में रखने के बाद लगाया गया है, जिसमें खाद्य, खाद, ऊर्जा, सिंचाई, बाजारों से संबंधित योजना और समर्थन मूल्यों, फसल बीमा, क्रेडिट इंटरेस्ट सब्सिडी के साथ-साथ पीएम किसान के तहत सीधे किसानों के खाते में दी जाने वाली रकम भी शामिल है।

बदली परिस्थियों में सुधार कराने का उठाया जा सकता है मुद्दा
एसबीआई रिसर्च के मुताबिक विश्व व्यापार संगठन का 1987 वाला रेफ्रेंस साल अब पुराना पड़ चुका है और इसमें वर्तमान परिस्थितियों के आधार पर बदलाव होने चाहिए। कुल मिलाकर इसके हिसाब से इस बदलाव के तहत भारत को मौजूदा स्तर पर डब्ल्यूटीओ के लक्ष्य के तहत सब्सिडी में 31% की कटौती करने की जरूरत पड़ सकती है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कोविड से पहले भारत ने सब्सिडी पर काफी अच्छा काम किया था और यहां तक वित्त वर्ष 2018-19 में कृषि सब्सिडी विश्व व्यापार संगठन के लक्ष्य से भी कम था। लेकिन, महामारी ने भारत के प्रयासों को काफी बाधित कर दिया। खासकर 80 करोड़ आबादी को संकट से बचाने के लिए मुफ्त अनाज वितरण करने का नीतिगत निर्णय लेना पड़ा, जिससे कि अर्थव्यवस्था को भी बचाने में काफी सहायता मिली है। (तस्वीरें- प्रतीकात्मक)












Click it and Unblock the Notifications