क्या सियासत का शिकार होगी इसराइल और तुर्की की नाज़ुक दोस्ती

नेतन्याहू और अर्दोआन
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नेतन्याहू और अर्दोआन

  • तुर्की और इसराइल के बीच रिश्ते सामान्य करने की शुरुआत 2022 में हुई. वर्षों की तल्ख़ी के बाद कूटनीतिक संबंध पूरी तरह बहाल हुए
  • कुछ विश्लेषक नेतन्याहू की अगुवाई वाली इसराइली सरकार के साथ इन संबंधों के जारी रहने पर संदेह जता रहे हैं.
  • विश्लेषकों का कहना है कि ये संबंध अब 'स्ट्रेस टेस्ट' से गुज़रेंगे.
  • तुर्की में होने वाले चुनावों की वजह से अर्दोआन भी इसराइल के प्रति सख़्त रुख़ अपना सकते हैं ताकि दक्षिणपंथी वोटरों को रिझाया जा सके.

तुर्की के टीकाकारों ने इसराइस के साथ संबंधों में पिछले साल हुई प्रगति के भविष्य पर अटकलें लगाना शुरू कर दी हैं. ये क़यास इसराइल में बिन्यामिन नेतन्याहू के नेतृत्व में दक्षिणपंथी सरकार के गठन के बाद तेज़ हो गए हैं.

दोनों देशों के बीच संबंधों को सामान्य बनाने के प्रयास 2022 में लगातार चलते रहे. मार्च 2022 में इसराइल के राष्ट्रपति आइज़ैक हर्ज़ोग ने तुर्की की राजधानी अंकारा में जाकर रेचेप तैय्यप अर्दोआन से मुलाक़ात की थी.

इसके अलावा पिछले साल दोनों देशों के विदेश और रक्षा मंत्री भी एक-दूसरे से वार्ताएं कर चुके हैं. राजदूतों की नियुक्ति की गई है और डिप्लोमेटिक संबंध पूर्णतया बहाल हो चुके हैं. ये सारे क़दम वर्षों से तल्ख़ रहे रिश्तों की तेज़ गति से बहाली के ठोस संकेत रहे हैं.

विवाद की जड़

साल 2010 में इसराइल ने तुर्की के एक समुद्री जहाज़ पर हमला किया था क्योंकि ये जहाज़, इसराइल द्वारा ग़ज़ा की कि जा रही आर्थिक नाकेबंदी को तोड़ने का प्रयास कर रहा था.

इस घटना के बाद दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संबंध ख़त्म हो गए थे.

दरअसल फ़लस्तीन का मुद्दा दोनों देशों के बीच संबंधों में अविश्वास की जड़ है और इसराइल में धुर दक्षिणपंथी सरकार आने के बाद, जो कुछ पिछले साल हासिल हुआ है उसके भविष्य पर प्रश्न उठने लगे हैं.

तुर्की सरकार के हिमायती अख़बार हुर्रियत में टीकाकार सेदात एर्गिग ने हाल ही में लिखा कि इसराइल में नई सरकार के आने के बाद द्विपक्षीय संबंधों में 'नई परिस्थितियों का निर्माण' हो रहा है.

बीते वर्षों में अर्दोआन और नेतन्याहू के बीच कई बार ग़ुस्से भरी बयानबाज़ियां हुई हैं. यहां तक कि साल 2018 में तुर्की के नेता अर्दोआन ने नेतन्याहू को आतंकवादी तक कह दिया था.

दोनों देशों के बीच हाल के दिनों में एकमात्र आधिकारिक बात 17 नवंबर को फ़ोन के माध्यम से हुई थी. इस बातचीत में अर्दोआन ने कहा था, "ये तुर्की और इसराइल के साझे हित में है कि दोनों देश एक दूसरे की संवेदनाओं का सम्मान करते हुए संबंध बरकरार रखें."

लेकिन इसके बाद तुर्की ने इसराइल के राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री एत्मार बे ग्वीर की तीन जनवरी को यरूशलम के अल-अक़्सा मस्जिद कंपाउंड की यात्रा की निंदा की थी.

तुर्की के विदेश मंत्रालय ने इसराइली मंत्री की इस यात्रा को उकसाने वाला क़दम बताया था.

तुर्की के विदेश मंत्री मेव्लुत चोवाशुग्लू और इसराइल के विदेश मंत्री एली कोहेन के बीच चार जनवरी को बातचीत हुई थी. इस दौरान चोवाशुग्लू ने इसराइल से कहा था कि अल-अक़्सा मस्जिद कंपाउंड में इसराइली मंत्री का दौरा उन्हें अस्वीकार्य है.

नाज़ुक दौर में रिश्ते

एके पार्टी की रैली
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एके पार्टी की रैली

विश्लेषक दोनों देशों के बीच संबंधों को संभवत जून में तुर्की में होने वाले चुनाव के मद्देनज़र प्रभावित होते देख रहे हैं.

तुर्की की एक स्वतंत्र वेबसाइट टी 24 में पत्रकार करेल वालेंसी लिखती हैं, "तुर्की और इसराइल के बीच संबंध नाज़ुकता की दहलीज़ की ओर बढ़ रहे हैं."

वालेंसी लिखती हैं कि अर्दोआन आगामी चुनावों के मद्देनज़र इसराइल के ख़िलाफ़ सख़्त रवैया अपना सकते हैं ताकि उनकी दक्षिणपंथी वोटरों में पैठ बढ़ सके.

वे लिखती हैं, "तुर्की की घरेलू नीति उसकी विदेश नीति को प्रभावित कर सकती है. जैसा कि हम पहले भी देख चुके हैं कि वोटों के लिए कुछ रिश्तों की क़ुर्बानी दी जा सकती है."

"दूसरी ओर इसराइल की नई सरकार का फ़लस्तीनियों के प्रति निर्णय भी संबंधों की इस नाज़ुक संतुलन पर असर डाल सकते हैं. तुर्की में चुनाव का माहौल द्विपक्षीय संबंधों को एक टेस्ट से गुज़ारेगा."

स्ट्रेस टेस्ट

पत्रकार बार्चिप यीनेंस ने बेवसाइट टी 24 में तीन जनवरी को लिखा कि दोनों देशों के बीच संबंध इस वर्ष एक 'स्ट्रेस टेस्ट' का सामना करेंगे.

बार्चिप यीनेंस लिखते हैं, "इसराइल की सरकार के फ़लस्तीनियों के ख़िलाफ़ उठाए जाने वाले क़दमों के बाद तुर्की की सत्तारूढ़ पार्टी, इसराइल के ख़िलाफ़ बोलने को मजबूर हो जाएगी. अर्दोआन के लिए भी फ़लस्तीनियों के ख़िलाफ़ उठाए गए क़दमों पर ख़ामोश रहना मुश्किल हो जाएगा."

राजनीतिक विश्लेषक ज़ैनप गुरचानली अपनी वेबसाइट इकोनोमिम में लिखती हैं कि इन संबंधों पर यूक्रेन-रूस युद्ध का भी असर पड़ सकता है क्योंकि अब तक अर्दोआन रूस और यूक्रेन के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाने का प्रयास कर चुके हैं. अब इसराइल भी मध्यस्थता करने की फ़िराक में है.

गुरचानली लिखती हैं, "इसका अर्थ ये है कि तुर्की की सरकार को एक और प्रतिद्वंद्वी का सामना करना पड़ेगा."

पत्रकार ने अपने तर्क के पक्ष में इसराइली विदेश मंत्री कोहेन के उस बयान का हवाला दिया है जिसमें कोहेन ने कहा था कि वे रूस-यूक्रेन युद्ध पर अब 'अधिक ज़िम्मेदार नीति' का पालन करेंगे.

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