पढ़े: यौन उत्पीड़न का शिकार हुई तहलका की महिला पत्रकार का पत्र

महिला पत्रकार के ही शब्दों में
एक महिला के साथ हुए गलत व्यवहार को भले ही राजनीतिक रूप देने की कोशिश की गई हो लेकिन इस दौरान महिलावादी राजनीतिकों ने जो समझ का परिचय दिया है, वह सुखद संकेत है। मैं उनसे अनुरोध करती हूं कि ऐसे संवेदनशील मुद्दे पर उन्हें राजनीति से दूर रहना चाहिए। मुझे इन बातों से नाराजगी होती है कि कुछ लोग अभी भी इन बातों को नहीं समझ रहे हैं कि महिलाएं अपने लिए अपने निर्णयों को लेने के लिए स्वतंत्र होती हैं।
पिछले कुछ समय में सवाल उठाये गये कि जब मैं घटना की शिकार हुई उसके बाद या इस दौरान मैंने क्या किया? मुझ पर सवाल उठाये गये कि मैंने शिकायत करने में देर क्यों लगाई? मैं यह भी बता देना चाहती हूं कि मैंने रेप या यौन उत्पीड़न जैसे शब्दों का प्रयोग नहीं किया, यह विक्टिम का काम नहीं है। ये काम कानून का है कि वह किसी घटना को किस दायरे में लाकर देखता है, तेजपाल ने जो भी व्यवहार किया वह कानून के अंतर्गत रेप के दायरे में आता है। मेरा मानना है कि कानून सभी के लिए एक जैसा होना चाहिए, चाहे वह एक आम इंसान हो या कोई प्रभावशाली व्यक्ति।
मेरा पालन पोषण मेरी मां ने किया है, मेरे पिता की हालात नाजुक है। मैं अपनी गरिमा के लिए लड़ रही हूं जबकि तेजपाल अपने लाभ और अपने रूतबे को बचाये रखने के लिए काम कर रहे हैं। अब मैं अपनी नौकरी खो चुकी हूं और आने वाले वक्त का मुझे और भी बहादुरी से सामना करना होगा। मैंने अपने लेख में हमेशा ही लिखा है कि महिलाओं को अपने खिलाफ होने वाले अपराधों के विरूद्ध हमेशा ही आवाज उठानी चाहिए। अभी एक राजनेता ने कहा था कि यौन उत्पीड़न के आरोपों के बाद महिलाओं का करिअर मुश्किल में पड़ जाएगा लेकिन ऐसे मसलों पर एक महिला को शांत क्यों बने रहना चाहिए। अगर मैंने इस अपराध के खिलाफ आवाज न उठाई होती तो शायद मैं खुद का भी सामना आसानी से न कर पाती। अंत में मैं यही कहूंगी कि अगर तहलका जैसी संस्था मुश्किल में आकर बंद हो जाती है तो इसका जिम्मेदार वो है, जिसने गलत आचरण किया न कि मैं जिसने अपने खिलाफ होने वाले अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई।












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