दूसरे देशों में क्यों बैन है EVM मशीन, और क्या है भारत में इसका समाधान
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों ने समझाया क्यों है ईवीएम मशीनो को लेकर विवाद और क्या है इसका समाधान, दूसरे देश में क्यों बैन है ईवीएम मशीनें
नई दिल्ली। जिस तरह से हाल के चुनाव परिणामों के बाद तमाम राजनीतिक दलों ने ईवीएम मशीन पर सवाल उठाए हैं उसके बाद दो पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ने सुझाव दिया है कि अगर ईवीएम मशीन में पेपर ट्रेल यानि वोट देने के बाद उसकी पर्ची दी जाए तो मशीन पर उठने वाले सवालों पर विराम लग सकता है। इस कदम के बाद तमाम राजनीतिक दलों का ईवीएम मशीनों पर शक और आरोप हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा।

पूर्व चुनाव आयुक्तों ने सुझाया समाधान
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी और एचएस ब्रम्हा ने कहा कि ईवीएम मशीनों में पर्ची की सुविधा एक बेहतर विकल्प है जिसके जरिए मशीन पर लग रहे आरोपों को खत्म किया जा सकता है। ब्रम्हा ने कहा कि मैं इस बात को लेकर काफी चिंतित हूं कि राजनीतिक दल ईवीएम मशीनों पर सवाल उठा रहे हैं, ईवीएम मशीन की विश्वसनीयता पर कोर्ट ने भी भरोसा जताया है, लेकिन मैं कहना चाहता हूं कि अगर वोटर वेरीफाइड पेपर ऑडिट ट्रेल के जरिए मशीन पर उठने वाले 90 फीसदी आरोपों को खत्म किया जा सकता है, इस कदम के बाद भारत में चुनाव प्रक्रिया दुनिया में सबसे अधिक विश्वसनीय प्रक्रिया होगी।

मतदान की पर्ची से हो सकता है समाधान
तमाम दलों जिसमें बसपा, सपा, आम आदमी पार्टी शामिल हैं ने ईवीएम मशीनों पर सवाल उठाया है, पार्टियों ने पंजाब, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड के नतीजों के बाद मशीनों को कटघरे में खड़ा किया था। 2014 के चुनाव परिणामों से पहले भाजपा ने ईवीएम मशीन पर सवाल उठाए थे। लेकिन ईवीएम मशीन के जरिए वोट देने के बाद अगर उसकी पर्ची मतदाता को दी जाए तो इन आरोपों को खत्म किया जा सकता है। मतदाताओं को दी जाने वाली पर्ची को बाद में एक बॉक्स में जमा कराया जा सकता है जिसके बाद किसी भी तरह के विवाद के उठने पर इसकी गिनती आसानी से की जा सकती है।

3500 करोड़ की वजह से फंसा है पेंच
आपको बता दें कि 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को यह निर्देश दिया था कि ईवीएम मशीनों में वीवीपीएटी की सुविधा शुरु की जाए, जिसपर आयोग ने आश्वासन दिया है कि वह 2019 तक इस सुविधा को देशभर में ईवीएम मशीनों पर लागू करेगा। चुनाव आयोग इस संबंध में कानून मंत्रालय को पत्र भी लिख चुका है कि वह उसे 16 लाख वीवीपीएटी लगाने के लिए 3100 करोड़ रुपए की राशि का आवंटन करे। जून 2014 तक आयोग ने कानून मंत्रालय को 10 पत्र लिखे हैं लेकिन बावजूद इसके अभी तक बजट का आवंटन नहीं किया जा सका। इसी के चलते चुनाव आयोग के मुखिया नसीम जैदी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 25 अक्टूबर 2016 को एक पत्र लिखकर बजट आवंटित करने को कहा था।

केंद्र पर बिफरे कुरैशी
फंड के आवंटन में विलंब किए जाने की आलोचना करते हुए एसवाई कुरैशी ने कहा कि चुनाव आयोग कह चुका है कि वह नई मशीनें बनवाने में 30 महीने का वक्त लगेगा, जिसकी कुल कीमत 3500 करोड़ रुपए है, यह पारदर्शी चुनाव प्रक्रिया के लिए बहुत ही छोटी राशि है। यह ऐसा मुद्दा है जिसपर केंद्र सरकार को त्वतिर कार्रवाई करनी चाहिए, लेकिन पता नहीं वह क्या कर रहे हैं।

दूसरे देशों में क्यों बैन है ईवीएम मशीन
वहीं कुरैशी ने कहा कि यूरोप के चार देशों में ईवीएम मशीन बैन है, लेकिन यह वॉक्सवैगन की धोखाधड़ी का मामला है, एक देश में ईवीएम मशीन के फेल होने के बाद चारों देशों ने इस मशीन को बैन कर दिया क्योंकि यह सभी मशीनें नीदरलैंड में बनती है, वहीं लोग यह भी आरोप लगाते हैं कि जर्मनी की कोर्ट ने ईवीएम मशीन पर रोक लगाई है लेकिन किसी ने कोर्ट के फैसले को नहीं पढ़ा है, मैंने फैसले को पढ़ा है जिसमे कहा गया कि लोग चुनाव प्रक्रिया को पारदर्शी बनाना चाहते हैं, लोगों की मांग है कि जब वह वोट देते हैं तो उन्हें यह नहीं दिखता है उनका वोट किसे गया है। कोर्ट ने ईवीएम मशीनों को बैन किया है लेकिन मशीन वह इसकी तकनीक पर सवाल नहीं उठाया है।

जब केरल के नतीजों को रद्द किया था कोर्ट ने
कुरैशी ने कहा कि हम जर्मनी कोर्ट के फैसले का पालन नहीं करते हैं, बल्कि हम अपने देश की सुप्रीम कोर्ट के फैसले का पालन करते हैं, 25 साल पहले केरल के चुनाव के नतीजों को कोर्ट ने कानूनी वजह के चलते रद्द किया था, लेकिन इसे रद्द करने के पीछे तकनीकी वजह नहीं थी। कोर्ट ने कहा था कि कानून में ईवीएम मशीनों के उपयोग का प्रावधान नहीं है। जिसके बाद हम संसद गए और वहां नया कानून आया जिसके बाद ईवीएम मशीनों के प्रयोग को मंजूरी दी गई, हम इस मशीन का प्रयोग सफलतापूर्वक 20 वर्ष से कर रहे हैं।
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