लोकतंत्र की खातिर गर्त में जाती कांग्रेस को बचाओ
नई दिल्ली (विवेक शुक्ला)। कांग्रेस धूल में ही नहीं मिल रही, इतनी पुरानी पार्टी अब बंट भी रही है। तमिलनाडु में कांग्रेस टूट गई। यह चुनावी झटके के बाद पार्टी में पहला औपचारिक विभाजन है। पूर्व केन्द्रीय मंत्री जी. के. वासन ने कहा कि वे के. कामराज के सपने को पूरा करने के लिए अलग हुए हैं। इसके पहले उन्होंने 1996 में बनी तमिल मनिला कांग्रेस को फिर से पुनर्जीवित करने की बात की थी।

लोकतंत्र के लिए खतरा
जानकार मान रहे हैं कि देश में लोकतंत्र की मजबूती के लिए कांग्रेस की मौजूदा हालत बेहद चिंतनीय है। सशक्त विपक्ष लोकतंत्र की पहली शर्त है। वरिष्ठ पत्रकार अवधेश कुमार कहते हैं कि तब समय केन्द्र के विरुद्ध विद्रोह करने वालों में स्व. जी. के. मूपनार के नेतृत्व में पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम भी शामिल थे। इस बार तो उन्होंने लोकसभा चुनाव में अपने पुत्र को उतारा था जो कांग्रेस विरोधी लहरों में पराजित हो गए।
पता नहीं वे क्या करेंगे। लेकिन संकेत यही है कि वासन के साथ आगे कई नेता आयेंगे। चूंकि निकट में अभी चुनाव नहीं है, इसलिये नेताओं के पास फैसला करने का समय है। पर जिस तरह से कांग्रेस के अंदर देशव्यापी असंतोष व राजनीतिक भविष्य के लिए चिंता दिख रही है और उसके शमन के लिए कोई ठोस प्रयास के आसार नहीं उसमें विभाजन का विस्तार की ही संभावना ज्यादा है। यह प्रश्न सबके मन में कौंध रहा है वह डर भी पैदा कर रहा है कि आखिर नरेन्द्र मोदी की आवाज, आचार और छवि का मुकाबला होगा तो कैसे?
लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस हरिय़ाणा और महाराष्ट्र में भी धूल में मिली। कांग्रेस और कितना गिरेगी, इसका अंदाजा लगाना कठिन है। अब जम्मू-कश्मीर, झारखंड और दिल्ली विधानसभा के चुनाव होंगे। देखिए इसका क्या हश्र होता है।












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