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पांच राजनीतिक दल और 5 उत्तराधिकारी, जिनकी काबिलियत पर उठते रहे हैं सवाल?

नई दिल्ली। भारतीय राजनीति में वंशवादी बेल के दिन बहुरेंगे इस पर बड़ा प्रश्नचिन्ह बिहार विधानसभा चुनाव 2020 में राष्ट्रीय जनता दल अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव के पुत्र और उत्तराधिकारी तेजस्वी यादव की हार ने लगा दिया है। हालांकि बिहार चुनाव में महागठबंधन का नेतृत्व कर रहे तेजस्वी यादव की पोल लोकसभा चुनाव 2019 में ही खुल चुकी थी, जब बिहार में पार्टी एक भी सीट पर जीत नहीं सकी और तेजस्वी बिहार छोड़कर प्रवास पर चले गए थे। यह तेजस्वी यादव की राजनीतिक अक्षमता ही थी वरना राजद के परंपरागत वोटर्स छिटककर असदुद्दीन ओवैसी के खाते में थोड़े ही जाते।

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यह तेजस्वी की पराजय नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति में समूचे राजनीतिक दलों की नई पीढ़ी को मिल रही पराजय की विस्तार है, जिन्हें जनता ने नकारना शुरू कर दिया है। इस कडी़ में कांग्रेस के उत्तराधिकारी राहुल गांधी, समाजवादी पार्टी के उत्तराधिकारी अखिलेश यादव, राष्ट्रीय लोकदल के उत्तराधिकारी जंयत चौधरी और शिवसेना उत्तराधिकारी उद्धव ठाकरे को रखा जा सकता है। भारतीय राजनीति में जनता अब परिवार और परिवारवाद को नकार रही है, लेकिन विपक्ष में बैठने लायक सीटें जरूर दे रही है, जो इस बात का परिचायक है कि जनता परिवार को महत्व नहीं दे रही है।

तेजस्वी यादव

बिहार विधानसभा चुनाव 2020 से पहले तेजस्वी को उभरता हुआ चेहरा बताने की कोशिश करने वाले चुनावी पंडितों ने एक्जिट पोल के जरिए तेजस्वी यादव की बिहार में सरकार बनवा ही दी थी। कमोबेश यही प्रय़ास लोकसभा चुनाव 2019 में भी किया गया था, लेकिन तब भी राजद उत्तराधिकारी की मिट्टी पलीद हुई थी और इस चुनाव के प्रदर्शन और बिहार विधानसभा चुनाव 2015 की तुलना करें तो राजद और बुरी तरह से हारी है। आंकड़ों पर गौर करेंगे तो पाएंगे कि बिहार चुनाव 2020 के चुनाव में राजद और महागठबंधन में शामिल कांग्रेस समेत सभी राजनीतिक दलों के प्रदर्शन में बड़ी गिरावट दर्ज हुई है।

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कह सकते हैं कि तेजस्वी यादव, राहुल गांधी, अखिलेश यादव, जंयत चौधरी और उद्धव ठाकरे के व्यक्तित्व मे एक गंभीर नेता की गहराई नहीं है, वरना कोरोना महामारी काल में विपक्ष के नेता रहे तेजस्वी यादव के लिए कई ऐसे मौके आए हैं, जो उनके राजनीतिक उत्थान का परिचायक बन सकते थे। इनमें मुजफ्फरनगर में चमकी बुखार, मॉब लिंचिंग, बड़ी आपराधिक घटनाएं और पटना में भीषण जलजमाव शामिल है। तेजस्वी यादव महामारी के दौरान बिहार में प्रवासी मजदूरों और छात्रों की घऱवापसी पर हलकान रहे सीएम नीतीश कुमार को भी आड़ों हाथ लेने से चूक गए थे।

उद्धव ठाकरे

शिव सेना संस्थापक बाबा साहेब ठाकरे के बेटे और महाराष्ट्र में गठबंधन सरकार का नेतृत्व कर रहे मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे का राजनीतिक परिवार छोड़कर राजनीति से दूर-दूर से नाता नहीं रहा है। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव 2019 में एनडीए के साथ चुनाव लड़ने वाली शिवसेना ने परंपरागत भाजपा को छोड़कर चिर प्रतिद्वंदी कांग्रेस और एनसीपी के साथ मिलकर सत्ता में पहुंच गई। उद्धव ठाकरे ने ऐसा करके न केवल पार्टी की विचारधारा को ताख पर रखा, बल्कि बाबा साहेब ठाकरे की कमाई हुई राजनीतिक विरासत को भी दांव पर लगा दिया।

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सभी जानते हैं कि महाराष्ट्र की महाविकास अघाड़ी मोर्च का असली रिंग मास्टर कौन है, जिसके इशारे पर महाराष्ट्र के मुखिया महाराष्ट्र की सरकार चला रहे हैं। कोरोना काल में महाराष्ट्र की दशा-दिशा, एक्टर सुशांत सिंह राजपूत की रहस्यमयी मौत केस की जांच नाम पर लीपापोती, अभिनेत्री कंगना रनौत के साथ फूहड़ बयानबाजी और उनके घर पर की गई तोड़-फोड़ और पत्रकार अर्नब गोस्वामी के साथ मुंबई पुलिस का रवैया और कार्रवाई बताती है कि एक राजनीतिक के रूप में उद्धव ठाकरे कितने गंभीर राजनीतिक हैं।

राहुल गांधी

100 से अधिक पुरानी हो चुकी राजनीतिक पार्टी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के उत्तराधिकारी राहुल गांधी को भी जनता नकार चुकी है, लेकिन कांग्रेस बार-बार काठ की हांडी को चूल्हे पर चढ़ाती आ रही है। कांग्रेस भी अच्छी तरह से जान चुकी है कि पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व में पार्टी रसातल में जा रही है, लेकिन परिवारवाद इस कद्र पार्टी पर हावी है कि एक बड़ी राजनीतिक दल धीरे-धीरे अवसान की ओर बढ़ रही है।

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अपने अब तक के राजनीतिक जीवन में राहुल गांधी अपने नेतृत्व में कांग्रेस को सिर्फ हार दिलाई है। 2019 लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी को गांधी खानदान की परंपरागत सीट अमेठी को छोड़कर वायनाड भागना पड़ा, क्योंकि वहां हार राहुल गांधी का इंतजार कर रही थीं। राहुल गांधी का व्यक्तित्व जैसा भी है, लेकिन वो राजनीतिक तो बिल्कुल नहीं हैं। उनमें एक कुशल राजनीतिक जैसी गंभीरता नहीं हैं, जिसके नमूने वो अक्सर खुद देते रहते हैं।

अखिलेश यादव

2012 विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के उत्थान के लिए चुनावी पंडितों ने पार्टी संस्थापक और पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के बेटे और सांसद अखिलेश यादव को उगता हुआ सूरज बताते हुए अखबारों के संपादकीय भर दिए। नतीजा यह हुआ कि मुलायम सिंह यादव को न चाहते हुए मुख्यमंत्री पद के लिए अखिलेश यादव का नाम आगे बढ़ाना पड़ गया। लोगों को अखिलेश यादव की परिपक्वता और उनके प्रबंधन की जानकारी उनके मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने के बाद हुई।

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यह बात किसी से छिपी नहीं है कि अपने मुख्यंमत्री कार्यकाल के तीन साल अखिलेश यादव पार्टी के वरिष्ठ सपा नेताओं के कंधे पर बैठकर काटे थे, लेकिन वो महत्वाकांक्षी इतने थे कि पिता को ही अध्यक्ष पद से हटाकर खुद सपा मुखिया बन बैठे। सपा मुखिया बनने के बाद अखिलेश ने अपनी रणनीतिक और राजनीतिक समझ का मुजाहरा भी खूब करवाया। लोकसभा चुनाव में चिर प्रतिद्वंदी बसपा से गठबंधन सपा को जहां ले डूबा। वहीं, यूपी विधानसभा चुनाव 2017 में कांग्रेस के साथ गठबंधन ने सपा की लुटिया डूबाने की शुरूआत की थी।

जयंत चौधरी

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के पोते और राष्ट्रीय लोक दल पार्टी अध्यक्ष चौधरी अजीत सिंह के बेटे जयंत चौधरी की पार्टी की पहचान राष्ट्रीय ही नहीं, अब क्षेत्रीय दल की भी नहीं रह गई है। राष्ट्रीय लोकदल पार्टी में वर्तमान में एक भी सांसद नहीं है। लोकसभा और राज्यसभा दोनों में पार्टी का एक भी सदस्य हैं। यह किसी ऐसी पार्टी स्थिति है, जिनके पिता पूर्व प्रधानमंत्री थे। जी हां, किसान नेता चौधरी चरण सिंह देश के प्रधानमंत्री रह चुके हैं।

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इतना ही नहीं, राष्ट्रीय लोकदल की हैसियत यूपी विधानसभा में भी कुछ नहीं हैं, जहां उसका महज एक विधायक है। चौधरी चरण सिंह पोते जयंत सिंह का राजनीतिक सफर भी बिल्कुल खराब कहा जा सकता है, जो खुद 2014 के बाद से कोई चुनाव नहीं जीत सके हैं। आखिरी बार जंयत चौधरी 2009 लोकसभा चुनाव में मथुरा से सांसद चुने गए थे।

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