कृषि कानूनों की वापसी और किसानों का जवाब, फिर फेल हुआ पीएम मोदी का 'मास्टर स्ट्रोक'?

नई दिल्ली, 20 नवंबर: साल 2014 के बाद से केंद्र सरकार के कामकाज में एक बदलाव आया है, प्रधानमंत्री बनने के बाद से नरेंद्र मोदी मोदी आमतौर बड़े फैसलों की घोषणा खुद ही करते रहे हैं। नोटबंदी, सर्जिकल स्ट्राइक, लॉकडाउन,जीएसटी जैसे तमाम फैसलों के पीछे अकेले मोदी ही दिखे। उनके फैसलों को समर्थक मास्टर स्ट्रोक कहते रहे हैं। जून 2020 में लाए गए तीन नए कृषि कानूनों को भी नरेंद्र मोदी ने उसी अंदाज में बिना किसानों से या दूसरे दलों से कोई बात किए देश के नाम संबोधन के दौरान वापस लेने का ऐलान कर दिया। जिसके बाद उनका खास समर्थक वर्ग और मीडिया में इसे मास्टर स्ट्रोक कहते हुए पेश किया गया। हालांकि उनके इस ऐलान को एक दिन बीत जाने के बाद अब लगता है कि उनका ये मास्टर स्ट्रोक भी नोटबंदी की तरह फेल हो गया है।

क्यों कहा गया मास्टर स्ट्रोक

क्यों कहा गया मास्टर स्ट्रोक

नए कृषि कानूनों के खिलाफ देशभर में जबरदस्त आंदोलन को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसानों के आगे झुकते हुए शुक्रवार को कानूनों की वापसी का ऐलान किया। साथ ही किसानों से धरना स्थल से घर लौटने की अपील भी की। इस पर भाजपा, सत्ता के समर्थक लोग और मीडिया इसको पीएम का शानदार फैसला बताते कहा कि अब किसान और सरकार के बीच की खाई पटन जाएगी। इतना ही नहीं ये भी कहा कि किसानों के मुद्दों पर चुनाव में जाने की कोशिश कर रहे विपक्षी दलों से भी उन्होंने ये मौका छीन लिया है। ऐसे में राजनीतिक तौर पर मास्टर स्ट्रोक है। वहीं कहा गया कि इससे पीएम की छवि में भी एक संवेदनशील नेता के तौर पर सुधार होगा

किसानों की प्रतिक्रिया ने जोश किया ठंडा

किसानों की प्रतिक्रिया ने जोश किया ठंडा

शुक्रवार सुबह पीएम ने कानून वापसी का ऐलान किया तो लगा कि शायद किसान अभी आंदोलन खत्म करने का ऐलान कर देंगे लेकिन शाम तक जिस तरह की प्रतक्रिया आई, उसने भाजपा समर्थकों का जोश ठंडा कर दिया। राकेश टिकैत ने पीएम के इस तरह आकर ऐलान करने के तरीके पर सवाल उठाते हुए कहा कि जो काम संसद का है, उसे संसद को ही करने दिया जाए, ये संबोधन में इस तरह के ऐलान करने का तरीका ठीक नहीं है। किसान नेताओं ने साफ शब्दों में पीएम पर अविश्वास भी जताया और कहा कि वो संसद में कानूनों की वापसी तक धरना स्थल नहीं छोड़ेंगे। किसानों ने ये भी कहा है एमएसपी के मुद्दे को भी वो नहीं छोड़ेंगे और अभी धरनास्थल नहीं छोड़ेंगे। किसानों ने धरने में जान देने वाले 700 किसानों का नाम तक ना लेने के लिए भी पीएम की आलोचना भी की। जाहिर है कि बीजेपी और सरकार समर्थकों को किसानों से जिस तरह की प्रतिक्रिया की उम्मीद होगी, उसके मुताबिक उनको रिस्पॉन्स नहीं मिला।

कई समर्थकों तक ने कर दी पीएम की आलोचना

कई समर्थकों तक ने कर दी पीएम की आलोचना

इस फैसले को लेकर किसानों की ओर से तो कोई खास शाबासी पीएम को मिली नहीं उल्टा कई समर्थक जरूर उनसे खफा हो गए। पीएम के ऐलान के बाद ट्विटर और फेसबुक पर ऐसे लोगों के हजारों कमेंट हैं, जो लगातार भाजपा के समर्थन में लिखते रहे हैं। इस फैसले के बाद इन लोगों ने सवाल उठाया है कि उनकी निगाह में नरेंद्र मोदी की जो मजबूत छवि बनी हुई थी, वो इससे दरकी है।

इसलिए भी नहीं किसी फायदे की उम्मीद

इसलिए भी नहीं किसी फायदे की उम्मीद

नरेंद्र मोदी के फैसला का स्वागत भी किसानों ने किया और जश्न भी मनाया लेकिन सरकार को लेकर खटास भी दिखी। कानूनों के आने के बाद बीजेपी नेताओं की भाषा, हरियाणा में आंदोलनकारी किसानों पर पुलिसिया कार्रवाई, लखीमपुर खीरी का मामला, केंद्र में मंत्री अजय मिश्रा टेनी को ना हटाए जाने जैसी बातें अभी भी किसानों और सरकार के बीच खाई की तरह हैं। ऐसे में इस फैसले का पीएम को खास फायदा अभी मिलता नहीं दिख रहा है।

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