फेसबुक के 73 % यूजर में 13 साल के मासूम बच्चे

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नई दिल्ली। फेसबुक को लेकर हर दिन कुछ नए-नए आंकड़े सामने आ रहे हैं। एक नए खुलासे में सामने आया है कि छोटे बच्चों के सोशल नेटवर्किंग साइट से जुड़ने पर रोक के बावजूद महानगरों एवं बड़े शहरों में 13 साल से छोटे बच्चों के बीच फेसबुक का इस्तेमाल धड़ल्ले से बढ़ता जा रहा है। सवाल है कि इस उम्र सीमा पर प्रत‍िबंध के बावजूद फेसबुक कैसे इन बच्चों को एकाउंट का अप्रूवल दे रहा है।

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सर्वेक्षण में कहा गया है कि आठ से 13 वर्ष के 73 प्रतिशत बच्चों की पहुंच फेसबुक और दूसरी सोशल नेटवर्किंग साइट तक बनी है, यह अभिभावकों के साथ साथ सरकार के लिये भी सचेत होने का समय है।

एसोचैम सर्वे के अनुसार, यह परेशानी का सबब बन सकता है. इसमें एक दूसरे को नुकसान पहुंचाने अथवा ऑनलाइन यौन उत्पीड़न जैसे दुष्परिणाम देखने को मिल सकते हैं. एसोचैम के किशोर फेसबुक पर विषय पर किये गये ताजा सर्वेक्षण में कहा गया है, करीब 73 फीसदी बच्चे फेसबुक और दूसरी सोशल नेटवर्किंग साइट से जुड़े हैं। ये आंकड़े निराशाजनक और चौंकाने वाले हैं।

दिलचस्प बात यह है कि ज्यादातर माता पिता बच्चों को फेसबुक तथा अन्य ऐसी साइटों से जुड़ने में मदद करते हैं। ऐसा भी देखने में आया है कि बच्चों के इन साइट का आदि हो जाने के बाद माता-पिता को इस मामले में मदद करने पर पछतावा भी हुआ है।

एसोचैम के सामाजिक विकास न्यास (एएसडीएफ) ने 8 से 13 वर्ष के बच्चों के 4,200 माता-पिता के बीच यह सर्वे किया है। सर्वेक्षण दिल्ली-राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, मुंबई, बेंगलुरु, चेन्नई, कोलकाता, अहमदाबाद, हैदराबाद, पुणे, लखनऊ, देहरादून जैसे महानगरों और बड़े शहरों में किया गया.

सर्वेक्षण के अनुसार बच्चों के माता-पिता यह मानते हैं कि फेसबुक और सोशल साइट का इस्तेमाल करने के वास्ते न्यूनतम आयु तय होनी चाहिये। लेकिन दूसरी तरफ अभिभावक यह भी मानते हैं कि सोशल नेटवर्किंग साइट बच्चों के लिये स्कूल से जुड़ी गतिविधियों की तरह ही है।

एसोचैम महासचिव डी.एस. रावत ने सर्वेक्षण जारी करते हुये कहा, बच्चों की कम उम्र में ही सोशल नेटवर्किंग साइट तक पहुंच बढ़ रही है इससे उनकी पहुंच उन सामग्रियों तक हो सकती है जो उनकी समझ से बाहर की हैं।

सर्वेक्षण के अनुसार 13 साल के करीब 25 फीसदी, 11 साल के 22 फीसदी, 10 साल के 15 फीसदी और 8 से 9 साल के 11 फीसदी तक बच्चे सोशल नेटवर्किंग साइट पर सक्रिय हैं।

एसोचैम की स्वास्थ्य समिति के चेयरमैन बी.के. राव का कहना है, बच्चों में इस तरह की साइट के इस्तेमाल को लेकर न तो अनुभव होता है और न ही उनके भीतर सही निर्णय क्षमता होती है, ऐसे में बच्चे गलत व्यक्तियों के संपर्क में आ सकते हैं और उन्हें नुकसान पहुंच सकता है अथवा उनके वह यौन उत्पीड़न का शिकार हो सकते हैं।

सर्वेक्षण में एक और महत्वपूर्ण पहलू यह भी सामने आया है कि माता-पिता में से किसी एक के नौकरी पेशा होने वाले अभिभावकों की तुलना में दोनों के कामकाजी रहने वाले अभिभावकों के बच्चों में निगरानी के अभाव में इस तरह की नेटवर्किंग साइट की लत ज्यादा होती है। महानगरों में यह स्थिति ज्यादा है। जानकारों ने सतर्क करते हुए इस आंकड़े को बच्चों के जीवन के लिए खतरा बताया है।

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