Exit Poll History: अमेरिका से शुरू होकर भारत में कैसे बना ‘सुपरस्टार’? एग्जिट पोल का पूरा इतिहास और सफर

Exit Poll History In India: भारत में किसी भी चुनाव के दौरान और उसके बाद सबसे अधिक चर्चा जिस विषय पर होती है, वह है 'एग्जिट पोल'। मतदान खत्म होते ही टीवी चैनलों पर सीटों के आंकड़ों की जो बारिश होती है, उसका एक लंबा और दिलचस्प इतिहास रहा है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा कि ये एग्जिट पोल का कहां से और कैसे शुरू हुआ। इसका इतिहास क्या है।

अमेरिका ने शुरू किया, दुनिया ने अपनाया

एग्जिट पोल की कहानी शुरू होती है 1936 के अमेरिका से। जॉर्ज गैलप और क्लॉड रॉबिंसन नाम के दो शख्स न्यूयॉर्क में मतदान केंद्र के बाहर खड़े हो गए और वोटरों से पूछने लगे - "भाई, किसे वोट दिया?" इसी डेटा के आधार पर फ्रैंकलिन रूजवेल्ट की जीत का अंदाजा लगाया गया और वो सही भी निकला! हालांकि उस वक्त इसे 'एग्जिट पोल' नहीं, बस चुनावी सर्वे कहते थे।

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इसके बाद 1937 में ब्रिटेन और 1938 में फ्रांस ने भी यही तरीका अपनाया। लेकिन 'एग्जिट पोल' को असली पहचान मिली नीदरलैंड में 15 फरवरी 1967 को। वहां के समाजशास्त्री मार्सेल वॉन डैम ने पहली बार व्यवस्थित तरीके से मतदाताओं से डेटा जुटाया, विश्लेषण किया और नतीजा? बिल्कुल सटीक! तभी से एग्जिट पोल को एक भरोसेमंद तरीके के रूप में दुनिया ने गंभीरता से लेना शुरू किया।

पूर्व राजनेता मार्सेल वॉन डैम ने नीदरलैंड में व्यवस्थित तरीके से एग्जिट पोल की शुरुआत की। उन्होंने मतदान के तुरंत बाद मतदाताओं से जानकारी जुटाई और उसका वैज्ञानिक विश्लेषण किया। वॉन डैम की भविष्यवाणी पूरी तरह सटीक रही, जिसने एग्जिट पोल को दुनिया भर में एक भरोसेमंद पद्धति के रूप में स्थापित कर दिया।

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भारत में कब शुरू हुआ एग्जिट पोल

भारत में इसकी शुरुआत हुई 1957 के आम चुनाव में, जब इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ पब्लिक ओपिनियन के एरिक डी कॉस्टा ने पहला चुनावी सर्वे कराया। फिर 1980 और 1984 में डॉ. प्रणय रॉय की निगरानी में ऐसे सर्वे हुए।

लेकिन असली धमाका हुआ 1996 में जब CSDS ने डेटा जुटाया और पत्रकार नलिनी सिंह ने दूरदर्शन पर पहला औपचारिक एग्जिट पोल पेश किया। BJP की जीत का अनुमान था और वो सही साबित हुआ! इसके बाद 1998 में प्राइवेट चैनलों ने इसे अपनी TRP का हथियार बना लिया और फिर तो रुकना ही नहीं हुआ।

भारत में एग्जिट पोल का आगमन और विकास

• शुरुआती दौर (1957): आजादी के बाद दूसरे आम चुनाव के दौरान 'इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक ओपिनियन' के प्रमुख एरिक डी कोस्टा ने पहली बार चुनावी सर्वे कराया। हालांकि, उस समय इसे व्यापक रूप से एग्जिट पोल की संज्ञा नहीं दी गई थी।

• वैज्ञानिक आधार (1980 और 1984): अस्सी के दशक में डॉ. प्रणय रॉय ने चुनावी सर्वे को अधिक वैज्ञानिक और सांख्यिकीय रूप दिया। उनके नेतृत्व में हुए सर्वे ने भारतीय चुनावों में डेटा के महत्व को रेखांकित किया।

• दूरदर्शन और सीएसडीएस (1996): 1996 के चुनावों में 'सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज' (CSDS) ने व्यापक डेटा जुटाया और पत्रकार नलिनी सिंह ने इसे दूरदर्शन पर पेश किया। इस पोल में भाजपा की जीत का अनुमान लगाया गया था, जो सटीक रहा।

• निजी चैनलों का दौर (1998): 1998 के बाद निजी न्यूज़ चैनलों की बाढ़ आ गई और उन्होंने बड़े पैमाने पर एग्जिट पोल का प्रसारण शुरू किया, जिससे यह आम जनता के बीच अत्यंत लोकप्रिय हो गया।

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ओपिनियन पोल क्या है और कब किया जाता है?

ओपिनियन पोल एक तरह का सर्वे होता है जो आमतौर पर चुनाव के समय लोगों की राय जानने के लिए उनसे सवाल पूछा जाता हैं और फिर उनके जवाबों के आधार पर अंदाज़ा लगाया जाता है। इसका उपयोग खासकर चुनाव से पहले यह समझने के लिए किया जाता है कि जनता किसे पसंद कर रही है।

ओपिनियन पोल और एग्जिट पोल दोनों लोगों की राय जानने के तरीके हैं लेकिन इनमें फर्क होता है ओपिनियन पोल चुनाव से पहले किया जाता है जिसमें लोगों से पूछा जाता है कि वे किसे वोट देंगे इसलिए यह सिर्फ उनकी राय होती है और बदल भी सकती है। वहीं एग्जिट पोल वोट डालने के बाद किया जाता है, जिसमें लोगों से पूछा जाता है कि उन्होंने किसे वोट दिया इसलिए यह ज्यादा सही माना जाता है।

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