हैदराबाद की जीत से उत्साहित BJP ने केरल के लिए बनाई कैसी रणनीति
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भाजपा के बड़े नेता नहीं कर रहे यहां प्रचार
केरल में पंचायतों, नगरपालिकाओं और 6 नगर निगमों के लिए 8 (मंगलवार को), 10 और 14 दिसंबर को वोटिंग है। इस चुनाव में हैदराबाद निगम चुनाव से उलट भाजपा ने सिर्फ अपने प्रदेश के नेताओं को ही चुनाव प्रचार में लगाया है। हैदराबाद में अमित शाह, जेपी नड्डा और योगी आदित्यनाथ जैसे नेताओं ने धुआंधार प्रचार किया था तो केरल में पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष के सुंदरन और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष कुम्मनम राजशेखरण ने ही पूरे राज्य का दौरा किया है। इनके अलावा अभिनेता से राजनेता बने सुरेश गोपी ने भी पार्टी के उम्मीदवारों के लिए वोट मांगे हैं। भाजपा ही नहीं, कांग्रेस ने भी केरल चुनाव में अपने किसी केंद्रीय नेताओं को चुनाव प्रचार के लिए नहीं बुलाया है। जबकि, कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी केरल की वायनाड सीट से ही सांसद हैं, लेकिन उन्होंने भी खुद को स्थानीय चुनावी मुहिम से खुद को अलग ही रखा है। वही नहीं, अपनी सरकार पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे सीएम विजयन ने भी अभी तक इस चुनाव के लिए कोई कार्यक्रम नहीं किया है।

मुस्लिम-क्रिश्चियनों को भी बनाया उम्मीदवार
बीजेपी के लिए हैदराबाद से एक बात केरल में और अलग ये है कि यहां कई मुसलमानों और क्रिश्यिचनों को भी पार्टी ने अपना उम्मीदवार बनाया है। इनकी तादाद 600से ज्यादा है, जिसमें कई मुस्लिम महिलाएं भी शामिल हैं और पार्टी को उम्मीद है कि ये मुस्लिम महिला उम्मीदवार पार्टी के हक में बढ़िया वोट जुटा सकती हैं। भाजपा के एक नेता ने कहा, 'हमें उम्मीद है कि मुस्लिम महिलाएं बाहर निकलेंगी और ट्रिपल तलाक कानून की वजह से हमारे लिए वोट करेंगी......महिलाओं की शादी की उम्र 18 से 21 साल किए जाने की योजना का भी कई मुस्लिम लड़कियों ने स्वागत किया है।'

भाजपा को वोट शेयर बढ़ाने पर फोकस
अगर बीजेपी ने मौजूदा चुनाव में केरल में अपना वोट शेयर बढ़ाने की रणनीति बनाई है तो यहां पर पिछले दो चुनावों में उसके प्रदर्शनों पर नजर डाल लेना जरूरी है। पिछले लोकसभा चुनाव में पार्टी को वहां 13 फीसदी वोट मिले थे और एक भी उम्मीदवार नहीं जीता था। जबकि, 2016 के विधानसभा चुनाव में उसने 98 सीटों पर अपने प्रत्याशी खड़े किए थे, जिनमें से एक सीट वह जीती थी और उसे 10.53 फीसदी वोट मिले थे। यानि तीन वर्षों में उसका वोट शेयर 2.47 फीसदी बढ़ गया। अब देखने वाली बात है कि निकाय चुनाव में वह इस आंकड़े में कितना सुधार कर पाती है।












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