प्रणब मुखर्जी से मिली तारीफ के बीच चुनाव आयुक्त अशोक लवासा का बड़ा खुलासा

नई दिल्ली। चुनाव आयोग के भीतर अधिकारियों के बीच के मतभेद अब खुलकर सामने आ रहे हैं। चुनाव आयोग के कमिश्नर अशोक लवासा ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी के बाद ही आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ तय समय सीमा के भीतर चुनाव आयोग ने कार्रवाई करनी शुरू की थी। जिस तरह से आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन हो रहा था और नेता हेट स्पीच दे रहे थे, उसकी वजह से सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा और कोर्ट ने पारदर्शी और समयबद्ध तरीके से आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन करने वाली शिकायतों का निपटारा करने को कहा। लवासा ने कहा कि मैंने कोर्ट की टिप्पणी के आचार संहिता के उल्लंघन की शिकायतों का मजबूत तरीके से निपटारे की बात कही थी।

कई नेताओं पर लगी पाबंदी

कई नेताओं पर लगी पाबंदी

15 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से पूछा था कि आखिर उन लोगों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई जिन्होंने भड़काऊ और नफरत फैलाने वाले भाषण दिए। इसी दिन चुनाव आयोग ने बसपा सुप्रीम मायावती, सपा नेता आजम खान, यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी के खिलाफ कार्रवाई करते हुए उनपर भाषण देने पर पाबंदी लगा दी थी। इन सभी नेताओं को सांप्रदायिक टिप्पणी करने का आऱोप था, जिसकी वजह से चुनाव आयोग ने उनके खिलाफ कार्रवाई की थी।

आयोग को लिखा नोट

आयोग को लिखा नोट

आयोग की इस कार्रवाई के तीन दिन बाद लवासा ने एक नोट चुनाव आयोग को लिखा जिसमे कहा कि आचार संहिता का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कार्रवाई करने की प्रक्रिया को मजबूत किया जाए। 16 मई को लवासा ने एक बार फिर चुनाव आयोग के खिलाफ अपना विरोध दर्ज कराया जब वह आचार संहिता के उल्लंघन को लेकर आयोग की बैठक में शामिल नहीं हुए। जिस तरह से भड़काऊ भाषण के बावजूद चुनाव आयोग ने कार्रवाई नहीं की उसके चलते लवासा ने अपना विरोध दर्ज कराना जारी रखा।

अल्पमत को किया नजरअंदाज

अल्पमत को किया नजरअंदाज

दरअसल चुनाव आयोग में आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन के मामलों में 2-1 से फैसला लिया गया, ऐसे में अल्पमत में होने की वजह से लवासा के रुख को तरजीह नहीं दी गई। लवासा ने कहा कि अगर चुनाव आयोग बहुमत से ही फैसला लेगा और अल्पमत की राय को तरजीह नहीं दी जाएगी तो ऐसे में अल्पमत वाले की राय क्या मायने रखती है। उन्होंने कहा कि सभी संस्थाओं में काम करने की विशेष प्रक्रिया होती है। चुनाव आयोग संवैधानिक संस्था है और उसे अपनी प्रक्रिया का पालन करना चाहिए। बता दें कि लवासा ने कुल पांच बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह को क्लीन चिट दिए जाने पर अपना विरोध दर्ज किया था।

इस वजह से अलग हुए पैनल से

इस वजह से अलग हुए पैनल से

लवासा ने कहा कि मैंने 16 मई को एक महीने के संवाद के बाद पत्र लिखा था। यह सब कुछ तकरीबन एक महीने पहले 18 अप्रैल को शुरू हुआ, इसकी मुख्य उद्देश्य यह था कि आचार संहिता के उल्लंघन के मामलों को मजबूती से निपटाना। मैंने अपनी राय रखी थी, लेकिन इसपर कोई विचार या चर्चा नहीं की गई। इसके बाद 2 मई को बैठक हुई, जिसमे यह फैसला लिया गया कि हम सभी को अपनी राय फाइल में दर्ज करानी है। मैंने 4 मई को अपनी राय भेजी,र इसके बाद 10 और 14 मई को इस बारे में याद भी दिलाया, लेकिन जब इसपर कोई कार्रवाई नहीं हुई मैंने आदर्श आचार संहिता की कार्रवाई से खुद को अलग कर लिया।

समयबद्ध तरीके से हो निपटारा

समयबद्ध तरीके से हो निपटारा

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बााद लवासा ने कहा कि 15 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की थी और तमाम आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन की शिकायतों के निपटारे की बात कही थी। मैंने उस वक्त नोट लिखा था क्योंकि मुझे लगता था कि सही तरीके इन शिकायतों को समयबद्ध तरीके से निपटारा किया जाना चाहिए। लवासा से जब यह पूछा गया कि क्या आपकी आपत्ति गलत समय पर नहीं थी. तो इसपर उन्होंने कहा कि अगर सही समय पर कार्रवाई की गई होती तो यह अपने आप सही हो जाती।

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