चुनाव आयोग ने एक साथ चुनाव कराने के लिए ईवीएम के भंडारण की आवश्यकता जताई, 800 गोदामों की पड़ेगी जरूरत
भारत के चुनाव आयोग ने एक साथ लोकसभा और विधानसभा चुनाव कराने की तैयारियों के तहत 800 अतिरिक्त गोदामों की आवश्यकता को चिह्नित किया है। यह गोदाम इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन और वोटर वेरिफाइड पेपर ऑडिट ट्रेल के सुरक्षित भंडारण के लिए उपयोग किए जाएंगे। ईसी के मुताबिक इन गोदामों का निर्माण एक श्रम-गहन और महंगी प्रक्रिया है। जिसका खर्च राज्य सरकारों को वहन करना होगा।
मार्च 2023 में ईसी ने कानून आयोग और केंद्रीय कानून मंत्रालय के साथ एक साथ चुनावों पर अपनी सिफारिशें साझा की थी। ये सिफारिशें अब एक संयुक्त संसदीय समिति द्वारा जांच किए जा रहे प्रस्तावित विधेयकों का हिस्सा हैं।

गोदाम निर्माण की मौजूदा स्थिति
मार्च 2023 तक 194 गोदाम पूरी तरह तैयार हो चुके हैं। 106 गोदाम निर्माणाधीन है। 13 गोदामों के लिए भूमि की पहचान हो चुकी है। लेकिन विकास कार्य अभी शुरू नहीं हुआ। 13 अन्य गोदामों के लिए भूमि आवंटन लंबित है।
ईसी ने हर जिले में समर्पित गोदाम निर्माण की प्रक्रिया जुलाई 2012 में शुरू की थी। भारत के 772 जिलों में भंडारण की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए यह कार्य अभी भी जारी है।
भंडारण और सुरक्षा पर विशेष ध्यान
ईसी ने कहा कि EVM और VVPAT मशीनों के भंडारण के लिए सुरक्षा और सुविधाएं अनिवार्य हैं। जिनमें सुरक्षा कर्मी, नियमित निरीक्षण, अग्निशमन अलार्म, CCTV कैमरे शामिल हैं।
चुनाव आयोग ने यह भी स्वीकार किया कि इस प्रक्रिया में अतिरिक्त वित्तीय संसाधनों और प्रशासनिक चुनौतियों की आवश्यकता होगी। हालांकि ईसी का मानना है कि राज्य सरकारों की प्राथमिकता और अग्रिम योजना के साथ इन जरूरतों को पूरा किया जा सकता है।
एक साथ चुनाव, रसद चुनौतियां और समाधान
एक साथ चुनाव कराने के लिए अतिरिक्त गोदामों की मांग भारत में कुशल चुनावी प्रक्रिया सुनिश्चित करने की ईसी की व्यापक रणनीति का हिस्सा है। ईसी का तर्क है कि यदि समय पर तैयारी और संसाधनों का सही तरीके से आवंटन किया जाए तो ये रसद चुनौतियां प्रबंधनीय हैं।
800 नए गोदामों की आवश्यकता और भंडारण से जुड़ी प्रशासनिक चुनौतियां एक साथ चुनाव की दिशा में एक बड़ा कदम हैं। भारत में चुनाव आयोग के इस प्रयास से चुनावी प्रक्रिया को अधिक कुशल, पारदर्शी और सुरक्षित बनाने का रास्ता खुलता है। आगे की प्रगति इस बात पर निर्भर करेगी कि राज्य सरकारें इन जरूरतों को कितनी प्राथमिकता देती हैं।












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