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कुंभ में धर्म और अध्यात्म के बहाने होता चुनावी प्रचार: ग्राउंड रिपोर्ट

कुंभ
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कुंभ क्षेत्र में जगह-जगह धार्मिक प्रवचन, कीर्तन, आरती और भक्ति में सराबोर श्रद्धालुओं का आवागमन ये बता देता है कि रेत की धरती पर तंबुओं का बसा ये यह शहर एक आध्यात्मिक नगरी है.

डेढ़ महीने तक चलने वाले इस कुंभ में आने वाला हर व्यक्ति इसी अध्यात्म का ही सुख लेने आता है. लेकिन जगह-जगह राजनीतिक दलों से जुड़े संगठनों के शिविर और नेताओं के होर्डिंग्स कई बार अचरज में डालते हैं कि आख़िर इनका यहां क्या काम है?

कुंभ मेले के सेक्टर 14 में विश्व हिन्दू परिषद के शिविर से लौट रहे झारखंड के रहने वाले मुदित पोद्दार से जहां हमारी मुलाक़ात हुई, ठीक उसके पीछे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बड़ा कट आउट और उसके सामने एक महात्मा जी के साथ मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी की तस्वीर लगा हुआ बैनर टँगा था.

मुदित पोद्दार का कहना था कि जब सारा आयोजन सरकार ही करा रही है तो सरकार के पोस्टर-बैनर लगने ही चाहिए. हालांकि आगे उन्होंने ये भी कहा, "मुझे नहीं लगता है कि ये किसी राजनीतिक उद्देश्य के लिए होगा. यहां दूर-दूर से आदमी आस्था के कारण आता है, राजनीति और दूसरी चीजों को अपने घर पर रखकर आता है."

विश्व हिन्दू परिषद के कार्यालय में जाने की वजह बताते हुए उन्होंने कहा वो ख़ुद भी परिषद से जुड़े हुए हैं. वीएचपी के विशालकाय परिसर से लगा हुआ मुख्य सड़क पर ही एक छोटा सा शिविर भी था जिसमें अयोध्या में प्रस्तावित राम मंदिर का डिज़ाइन रखा हुआ था. कुछ लोग उसे भी देख रहे थे और देखकर वापस आ रहे थे.

उन्हीं में से एक कौशांबी के रहने वाले राम सुमेर अपने परिवार के साथ आए थे. कहने लगे, "लग रहा है यही ढांचा देखते ही जीवन बीत जाएगा, असली मंदिर नहीं देखने को मिलेगा." राम सुमेर ने बताया कि उनकी उम्र क़रीब अस्सी साल है, सरकारी नौकरी से रिटायर्ड हैं और रिटायरमेंट के बाद लगभग हर साल दीपावली के आस-पास अयोध्या जाते हैं. उन्हें इस बात की उम्मीद थी कि मौजूदा राजनीतिक हालात में राम मंदिर का निर्माण हो जाएगा, लेकिन अब वो नाउम्मीद हैं.

चर्चा के दौरान उन्होंने बताया कि लगभग हर राजनीतिक दल के यहां हर साल शिविर लगते हैं. ये पूछने पर कि ऐसा क्यों होता है, वो झल्लाहट के साथ बोले, "पता नहीं क्या होता है, हम तो आज तक कभी वहां गए नहीं. लेकिन इतना ज़रूर है कि नेताओं के शिविर में रामायण और गीता का पाठ तो होता नहीं होगा, राजनीति ही बतियाई जाती होगी."

राम सुमेर के साथ चल रहे उनके भतीजे दिनेश कुमार बेहद दार्शनिक अंदाज़ में कहने लगे, "कई शिविर ऐसे भी हैं जो हैं तो महात्मा जी लोगों के नाम के, लेकिन वहां प्रवचन के दौरान भी कुछ ऐसी बातें की जाती हैं जिससे आप को ये पता चल जाए कि उनके हिसाब से चुनाव में वोट किसे देना है, या फिर कौन सी पार्टी ऐसी है जो हिन्दू हितों की बात करती है ?"

दिनेश ने न तो महात्मा जी का नाम बताया और न ही ये बताया कि महात्मा जी जिस पार्टी के लिए परोक्ष रूप से प्रचार कर रहे हैं, उनके हिसाब से वो पार्टी कौन सी है. उन्होंने मुस्कराते हुए कहा, "आप पत्रकार हैं, सब समझ रहे हैं."

वहीं सेक्टर 11 में कांग्रेस सेवा दल के शिविर के बाहर कुछ लोग आपस में बातचीत में कर रहे थे. कांग्रेस सेवादल से पहले जुड़े रहे दुर्गेश दुबे बताते हैं, "ये सब प्रचार प्रसार के लिए है, कुछ लोग सेवा भाव के नाम पर भी शिविर लगाते हैं और यहां आए श्रद्धालुओं की सेवा करते भी हैं लेकिन इसका राजनीति से कोई मतलब नहीं है. यहां कोई राजनीतिक कार्यक्रम इत्यादि तो होते नहीं है. ऐसे में कोई क्या फ़ायदा लेगा."

लेकिन दुर्गेश दुबे की बात को काटते हुए विवेक पांडेय कहने लगे, "राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश तो अपने ढंग से नेता लोग करते ही हैं. उनके शिविरों में कोई पहुंच भर जाए, अपने ढंग से उसे समझाने की कोशिश करते हैं. लेकिन कोई राजनीतिक लाभ नहीं होता होगा, ऐसा लगता नहीं है."

दरअसल, कुंभ मेला परिसर में लगभग सभी राजनीतिक पार्टियों से जुड़े शिविर दिख जाते हैं. सेक्टर 8, 11, 12 इत्यादि में कहीं भारतीय जनता पार्टी का, कहीं समाजवादी पार्टी का, कहीं कांग्रेस सेवादल का तो आम आदमी पार्टी का शिविर भी यहां देखा जा सकता है. कुंभ में राहुल गांधी की प्रस्तावित यात्रा को देखते हुए सेवादल और दूसरे फ्रंटल संगठन पूरे ज़ोर-शोर से इस कोशिश में लगे हैं कि राहुल गांधी के 'सॉफ़्ट हिन्दुत्व' की जमकर ब्रांडिंग कर सकें.

हालांकि इन कैंपों में लोग श्रद्धालुओं के लिए प्राथमिक चिकित्सा, खोए हुए लोगों को परिवार से मिलाना, कल्पवासियों की मदद जैसे कार्य करते हैं. मसलन, राशन वितरण में कोई समस्या हो तो या फिर उन्हें किसी अन्य परियोजना से लाभ दिलाने में उनकी मदद करना, भटकने वाले लोगों को सही गंतत्व्य तक पहुंचाना, कुंभ में भीड़ मैनेजमेंट में सहयोग देना आदि भी शामिल हैं.

यही नहीं, कुंभ के पहले शाही स्नान के दौरान तीन केंद्रीय मंत्रियों के संगम स्नान की ख़बरें भी चर्चा में रहीं. इसके अलावा अन्य दलों के लोग भी यहां आते हैं. ये अलग बात है कि मेला परिसर में कोई राजनीतिक कार्यक्रम नहीं होता है लेकिन राजनीतिक दलों की कोशिश होती है कि वो अपने प्रचार-प्रसार में कोई कमी न छोड़ें.

यूपी जर्नलिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष, वरिष्ठ पत्रकार और इस समय भारतीय जनता पार्टी से निगम पार्षद रतन दीक्षित कहते हैं, "ये इतना बड़ा प्लेटफ़ॉर्म है कि राजनीतिक दल इसे अपने लिए इस्तेमाल करने से चूक कैसे सकते हैं. दूसरी ओर, साल 2019 भी है, लोकसभा चुनाव मेला ख़त्म होते ही शुरू होने वाले हैं. राज्य सरकार ने इतनी ब्रांडिंग की है तो श्रेय लेने में पीछे कैसे हटेगी. सिर्फ़ बीजेपी ही नहीं, ये सभी दलों की कोशिश होती है. बीजेपी चूंकि केंद्र और राज्य दोनों जगह सरकार में है तो उसके पोस्टर-बैनर ज़्यादा दिख रहे हैं."

इलाहाबाद में वरिष्ठ पत्रकार अखिलेश मिश्र कहते हैं, "जिस तरह से आज मोदी और योगी की तस्वीरें दिख रही हैं, बीजेपी के नेताओं की दिख रही हैं, उसी तरह से पिछले कुंभ में समाजवादी पार्टी के नेताओं और तत्कालीन सरकार से जुड़े मंत्रियों के होर्डिंग्स से जगहें पटी हुई थीं. सरकार में रहने वाली पार्टी यह फ़ायदा तो उठाती ही है. लेकिन इससे यहां आने वाले लाखों-करोड़ों लोग उससे प्रभावित होकर उन्हें वोट दे देंगे, ऐसा शायद ही होता हो."

पहले शाही स्नान के दौरान संगम नोज़ पर जहां शाही स्नान होता है और अखाड़ों के संत जिस रास्ते से आते हैं, उसके दोनों ओर प्रधानमंत्री के कटआउट और मुख्यमंत्री योगी, उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य, अन्य कैबिनेट मंत्रियों और दूसरे नेताओं के बैनर लगे हुए थे. तमाम अभी भी हैं और कुछ नए भी लग रहे हैं. तमाम साधु-संतों ने अपनी तस्वीरों के साथ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की भी तस्वीर छाप रखी है.

हालांकि राजनीतिक दलों के लोगों का कहना है कि वो लोग शिविर इसलिए भी लगाते हैं ताकि उनकी पार्टी से जुड़े बाहर के जो लोग आ रहे हैं, वो स्थानीय स्तर पर किसी परेशानी की स्थिति में उनसे संपर्क कर सकते हैं. हालांकि समाजवादी पार्टी के एक पदाधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, "कोई राजनीतिक कार्यक्रम तो यहां नहीं होता लेकिन अक़्सर भंडारा करना, पैंफ़लेट बांटना और लोगों की मदद करने जैसे काम सीधे तौर पर राजनीतिक लाभ के मक़सद से ही किए जाते हैं. हां, मिलता कितना है, ये देखने वाली बात है."

बहरहाल, राजनीतिक दलों को लाभ हो या न हो लेकिन चुनावी साल में लाखों-करोड़ों की भीड़ में प्रचार प्रसार का मौक़ा छोड़ना भला कौन चाहेगा.

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