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बुंदेलखंड: पानी की तरह बहा पैसा, लेकिन लोगों की प्यास नहीं बुझी

बुंदेलखंड, पानी का संकट
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बुंदेलखंड, पानी का संकट

''पानी की बहुत परेशानी है हमें. चार किलोमीटर दूर से पानी लाते हैं. पानी की परेशानी इतनी है, पूरे गांव भर को परेशानी है. हमें ही नहीं पूरे गांव को है. यहां हमें पानी की सुविधा हो जाए तो क्यों भागे भागे जाएं रोड पार करके. कभी रात को जाएं कभी आधी रात को जाएं, क्या करें दिनभर भरते रहें.''

उत्तर प्रदेश के ललितपुर ज़िले की रहने वाली सुखवती ये कहते हुए भावुक हो जाती हैं. वो बताती हैं कि घर के पास लगा हैंडपंप काम नहीं करता. उसमें काफ़ी मेहनत के बाद पानी आता भी है तो गंदा आता है. इसलिए वो घर से करीब डेढ़ किलोमीटर दूर जाकर पानी लाती हैं. बिजली न आने पर पानी की किल्लत और बढ़ जाती है क्योंकि जिस टंकी से वो पानी लाती हैं वहां बिजली होने पर ही पानी आता है.

इस मुश्किल से जूझने वाली सुखवती इकलौती नहीं हैं. ललितपुर बुंदेलखंड क्षेत्र का एक ज़िला है. उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के कुल 13 ज़िले बुंदेलखंड क्षेत्र में आते हैं. इनमें से उत्तर प्रदेश के सात ज़िले हैं. लगभग इन सभी में पानी का संकट एक गंभीर समस्या है.

बीबीसी ने अक्टूबर महीने की शुरुआत में उत्तर प्रदेश के छह ज़िलों झांसी, ललितपुर, महोबा, हमीरपुर बांदा और चित्रकूट के कुछ गांवों में जाकर ज़मीनी हालात देखे.

सालों साल यहां विकास के नाम पर हज़ारों करोड़ रुपये खर्च किए गए, जिनमें से सबसे अधिक पैसा पानी के संकट को दूर करने में खर्च किया गया. यहां पैसा तो पानी की तरह बहा लेकिन लोगों की प्यास नहीं बुझ पाई. बूंद-बूंद पानी के लिए अब भी लोग जूझ रहे हैं.

करीब 97 लाख की आबादी वाले बुंदेलखंड में बहुत से लोगों के लिए पीने का पानी जुटाना बहुत से लोगों के लिए रोज़ का संघर्ष है.

सुखवती
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सुखवती

ललितपुर के मदनपुर गांव में रहने वाली सुखवती का आधा दिन पानी जुटाने में निकल जाता है. उनके पति की मौत हो चुकी है. दो बेटे हैं जो मज़दूरी करते हैं. इसलिए पानी भरने का काम वही करती हैं. वो कहती हैं कि अगर पैसे होते तो वो घर में नल लगवा लेतीं लेकिन पेट भरने के लिए भी पैसा नहीं रहता.

इसी ज़िले के ही सकरा गांव में रहने वाले आदिवासी परिवार हैंडपंप खराब होने पर कुएं का गंदा पानी पीने को मजबूर हैं. गांव में न तो ढंग की सड़क है और न ही कोई स्वास्थ्य सुविधा. बीमार होने पर लोग 30-40 किलोमीटर दूर इलाज कराने जाते हैं.

ललितपुर से निकलकर हम महोबा ज़िले पहुंचे. यहां की चौका ग्राम पंचायत के रावतपुरा गांव में पीने के पानी की समस्या गंभीर है. एक छोटी सी पानी की टंकी से लोग पानी भरते हैं. लोग वही पानी पीते हैं और उसी से नहाते भी हैं.

राजकुमारी
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राजकुमारी

महोबा में हमारी मुलाक़ात राजकुमारी से हुई. राजकुमारी खेती करती हैं. उनकी दिनचर्या भी सुखवती के जैसी ही है.

वो कहती हैं, ''दो-दो, चार चार दिन के लिए पानी भर लेते हैं. बिजली नहीं आती तो बहुत परेशानी होती है. कभी कभी तो चार दिन, पांच दिन में बिजली आती है, वो भी एक-दो घंटे के लिए, उसमें ही पानी भर लेते हैं. कभी कभी बगल के गांव से साइकिल या बैलगाड़ी में पानी लाते हैं. वो गांव मध्य प्रदेश में पड़ता है. सारी समस्या पानी की है. इस गांव में पानी होगा तो हर चीज़ सही होगी.''

बुंदेलखंड पैकेज और पानी का संकट

लोकसभा में दिए गए एक जवाब के मुताबिक, बुंदेलखंड पैकेज के तहत उत्तर प्रदेश को साल 2009 से 2019 के बीच तीन चरणों में 3107.87 करोड़ रुपये दिए गए. इस पैसे का इस्तेमाल बुंदेलखंड के सात ज़िलों में अलग-अलग विकास योजनाएं शुरू करने, किसानों की हालत सुधारने और पीने के पानी समस्या को दूर करने में होना था.

बुंदेलखंड में पानी की समस्या को लेकर नीति आयोग ने द एनर्जी एंड रिसोर्सेस इंस्टिट्यूट (TERI) के सहयोग से एक रिपोर्ट तैयार की. रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तर प्रदेश को बुंदेलखंड स्पेशल पैकेज के तहत जितना पैसा दिया गया उसका 66% यानी 1445.74 करोड़ रुपये का इस्तेमाल पानी का संकट मिटाने के लिए किया गया लेकिन ज़मीनी हकीक़त नहीं बदली.

बुंदेलखंड, पानी का संकट
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दो किमी दूर के कुएं से पानी पीता है पूरा गांव

हमीरपुर ज़िले के गुसियारी गांव में समस्या थोड़ी अलग है. यहां पूरे गांव में हैंडपंप का पानी खारा आता है. इसलिए लोग गांव के बाहर एक कुएं पर ही निर्भर हैं. करीब दो किलोमीटर दूर स्थित इस कुएं से पूरा गांव पानी पीता है.

इस गांव में पीने के पानी का संकट ऐसा है कि लोग यहां अपनी बेटियों की शादी नहीं करना चाहते.

गुसियारी गांव के ही रहने वाले जलीस कहते हैं, ''पानी की वजह से कई लोगों की शादियां रुक गईं. जो बगल वाले गांव में रिश्तेदारी करने के लिए आते हैं वो कहते हैं कि गुसियारी गांव में शादी नहीं करेंगे. वहां पानी नहीं है. औरतें पानी लेने जाएंगी. बस पानी की वजह से काफ़ी लोग यहां गांव में करीब 40% कुंआरा आदमी है. जिनकी शादी सिर्फ़ पानी के संकट की वजह से नहीं हो रही.''

गांव के लोगों का आरोप है कि चुनाव के समय नेता वोट मांगने आते हैं और वादे करते हैं कि समस्या का समाधान करेंगे लेकिन स्थायी समाधान अब तक नहीं हुआ.

इस गांव से भी बुरा हाल बांदा ज़िले के कालिंजर तरहटी का है. यहां सड़क किनारे लगे एक हैंडपंप से पूरे गांव के लोग पानी पीते हैं. यूपी जल निगम की ओर से इस हैंडपंप पर सोलर सिस्टम से एक मोटर लगाया गया है उसी के जरिए पानी आता है. अगर धूप नहीं निकलती तो पानी मिलना मुश्किल हो जाता है. वहीं इतनी बड़ी आबादी के बीच सिर्फ एक नल होने से भी कई समस्याएं हैं.

बुंदेलखंड, पानी का संकट
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बुंदेलखंड, पानी का संकट

पानी लेने आई गीता बताती हैं कि 24 घंटों में यहां मुश्किल से एक बार पानी मिलता है. पानी के बर्तन खाली होने पर लोग अपना नंबर लगाते हैं और अपनी बारी आने पर पानी भरते हैं.

गीता कहती हैं, ''पानी की इतनी समस्या है कि लोग मार पिटाई और झगड़े पर उतर आते हैं. कई बार थाना-पुलिस तक भी बात पहुंची है. लेकिन यहां कोई सुनने को तैयार नहीं है. नेता विधायक सब वोट लेकर चले जाते हैं. प्रधान भी कुछ समाधान नहीं करते.''

यही हाल चित्रकूट के पाठा क्षेत्र का है. यहां जगह-जगह पानी की टंकिया लगाई गई हैं. लेकिन बिजली न आने के कारण अक्सर लोगों को परेशानी झेलनी पड़ती है. भूजल का स्तर बेहतर करने के उद्देश्य से यहां स्पेशल बुंदेलखंड पैकेज और अन्य सरकारी योजनाओं के जरिए चेकडैम और खेतों में तालाब बनाए गए लेकिन अधिकतर तालाब सूखे हैं. चेकडैम का पानी भी गर्मियों तक नहीं बचता.

पूरे बुंदेलखंड में अप्रैल-मई महीने से पीने के पानी का सबसे बुरा संकट दिखता है. यहां हर साल सूखे के हालात बनते हैं और फिर लोग कई किलोमीटर दूर जाकर पानी लाकर गुज़ारा करते हैं. कुछ जगहों पर टैंकर से भी पानी पहुंचाया जाता है.

बुंदेलखंड, पानी का संकट
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क्या कर रही है सरकार?

उत्तर प्रदेश की मौजूदा योगी आदित्यनाथ सरकार ने जून 2020 में 'हर घर जल' योजना के तहत बुंदेलखंड के हर घर तक पाइपलाइन के ज़रिए पानी पहुंचाने का वादा किया है. इस योजना की समय सीमा जून 2022 तक रखी गई है.

यह योजना केंद्र सरकार के जल जीवन मिशन का हिस्सा है. इसके तहत साल 2024 तक हर घर तक पाइपलाइन से पीने का पानी पहुंचाने की योजना है.

जल जीवन मिशन की वेबसाइट पर दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, 25 नवंबर 2021 तक देशभर के कुल 19,22,41,339 घरों में से 8,55,08,916 यानी करीब 44.48% घरों में पाइपलाइन का कनेक्शन पहुंच गया है.

हालांकि बुंदेलखंड में घोषणा होने के 16 महीने बीतने के बाद भी यह योजना हकीकत में तब्दील नहीं हो पाई. कई जगहों पर रेज़रवॉयर बनाए जा रहे हैं, पाइपलाइन बिछ रही हैं लेकिन फिलहाल पीने के पानी का संकट दूर होता नज़र नहीं आता.

बुंदेलखंड, पानी का संकट
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बुंदेलखंड, पानी का संकट

बुंदेलखंड में जल संकट को लेकर यूपी सरकार के लोक निर्माण विभाग राज्य मंत्री चंद्रिका प्रसाद उपाध्याय कहते हैं कि उनकी सरकार लगातार प्रयास कर रही है लेकिन संकट इतना गंभीर है कि आनन-फानन में हर जगह असर नहीं दिखेगा.

वो कहते हैं, ''बुंदेलखंड में हालात पहले और खराब थे. अभी हमारी सरकार ने हर घर जल योजना शुरू की है और पानी पहुंचाने का काम हो रहा है. धीरे-धीरे बदलाव दिखेगा. दशकों से चली आ रही समस्या को एक दिन में ख़त्म नहीं किया जा सकता. थोड़ा वक़्त लगेगा लेकिन सरकार के प्रयास सफल होंगे. पीने का पानी हो या खेती के लिए पानी, सरकार हर संभव कोशिश कर रही है. हम बांध बना रहे हैं, नहरें बना रहे हैं, तालाब बनवा रहे हैं. धीरे-धीरे समस्या ख़त्म होगी.''

'हर घर जल' योजना की ही तरह चित्रकूट के पाठा इलाके में साल 1973 में पाठा पेयजल परियोजना शुरू की गई थी. जिसके तहत यहां पानी की टंकियां बनावाई गईं और लोगों को पाइपलाइन से घर-घर पानी पहुंचाने का वादा किया गया लेकिन हालात जस के तस ही रहे. कुछ जगहों पर पाइपलाइन पहुंची लेकिन पानी नहीं पहुंचा और जहां पानी पहुंचा भी तो कुछ वक़्त बाद वो भी ठप हो गया.

फिलहाल आने वाले विधानसभा चुनाव में बुंदेलखंड के लोगों के लिए पानी एक अहम चुनावी मुद्दा है. यहां के लोग इस आस में हैं कि आखिर कब ये संकट दूर होगा और पीने के पानी के लिए उनकी जंग ख़त्म होगी.

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