एनजीओ ने कहा, क्रूरता है गाय का दूध पीना
नई दिल्ली। देश में गौरक्षा से जुड़ी बहसों और विवादों के बीच एक नई बहस ने जन्म लिया है। एक एनजीओ ने कहा है कि गाय का दूध पीना गायों के प्रति क्रूरता है।

यह है दूध को लेकर मान्यता
दूध को भारत में सभी बीमारियों के इलाज के प्रतीक के रूप में माना जाता है। इतना ही नहीं, यहां गाय के दूध या उससे बने उत्पादों के सेवन को भारत की समृद्धता का परिचायक माना जाता है। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि श्वेत क्रांति से पहले तक भारत में दूध काफी महंगा होता था।
'दूध पेय पदार्थ नहीं होना चाहिए'
दिल्ली के फेडरेशन आॅफ इंडियन एनिमल प्रोटेक्शन आॅर्गनाइजेंशंस यानी एफआईएपीओ के मुताबिक, दूध का पेय पदार्थ के रूप में सेवन करना स्वास्थ्य के लिए अनावश्यक है। यह एनजीओ अगले सप्ताह एक आॅनलाइन अभियान 'डोंट गेट मिल्क्ड' लॉन्च करेगा। यह आधुनिक डेयरी उपभोक्ताओं और जानवरों के बीच रिश्ते को शोषक मानता है और इसे बदलना चाहता है।
दूध उत्पादन है शोषण की वजह
एनजीओ का कहना है कि दूध और दूध उत्पादों की मांग काफी बढ़ी है और इसके लिए डेयरी व्यवसायी पशुओं पर क्रूरता करते हैं। इसके बगैर यह संभव नहीं है।
मां से अलग करते हैं बछड़ा
एक अंग्रेजी वेबसाइट को इस एनजीओ ने निदेशक अर्पण शर्मा ने बताया कि,'जैसे ही बछड़ा पैदा होता है, उसे मां से अलग कर दिया जाता है। यह दोनों ही जानवरों के लिए विनाशकारी है। मादा बछड़े को जीने दिया जाता है क्योंकि वे दूध देती हैं जबकि ज्यादातर नर बछड़े सड़क पर छोड़ दिया जाता है या उन्हें बूचड़खानों में बेच दिया जाता है।'
डेयरी वाले करते हैं यह अवैध काम
शर्मा के अनुसार,'बच्चों से दूरी के बाद मां के दूध उत्पादन पर असर पड़ता है और इसे बढ़ाने के लिए हार्मोन आॅक्सीटोन इंजेक्ट किया जाता है। यह अवैध होने के बावजूद सभी डेयरी वाले इस्तेमाल करते हैं।'
कैसे बर्दाश्त करते हैं गाय के प्रति क्रूरता?
उनके मुताबिक, जब मादा बछिया बड़ी हो जाती है तो उसे कृत्रिम तरीके से गर्भवती किया जाता है। वे कहते हैं कि अगर गाय वाकई हमारी माता है और हम लोग ऐसा मानते हैं तो फिर हम गाय के प्रति इन क्रूर प्रक्रियाओं को बर्दाश्त कैसे कर सकते हैं जो कि बलात्कार से कम नहीं?












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