तेजस में नहीं लगा सका कावेरी, लेकिन फिर भी उम्मीदें अभी बाकी
अभी आपने पढ़ा (CLICK ON PREVIOUS) कि कैसे देश में बने पहले फाइटर जेट तेजस में देश में ही बना इंजन कावेरी अब नहीं लग पाएगा। अब पढ़िए कि डीआरडीओ के इस अहम फैसले के बाद इस इंजन को डेवलप कर रहे जीटीआरई के मनोबल पर फैसले का क्या प्रभाव पड़ा है।

जीटीआरई के लिए अतिरिक्त फंड
सूत्रों की मानें तो डीआरडीओ ने जीटीआरई के लिए आगामी परियोजनाओं के लिए करीब 300 करोड़ रुपए की अनुमति दी है। एक अधिकारी की ओर से दी गई जानकारी पर अगर यकीन करें तो इस अनुदान के बाद अब जीटीआरई की लैब आने वाले प्रोजेक्ट्स पर ध्यान लगा रही है और उन्हें लेकर काफी एक्साइटेड है।
सूत्रों की ओर से इस बात की पुष्टि की गई है कि जीटीआरई को तेजस जैसे महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट्स के लिए इंजन डेवलप करने के लिए जो 2600 करोड़ रुपए का अनुदान दिया जाने वाला था, अब उस पर फैसला लिया जा सकता है। हालांकि लैब को 700 करोड़ रुपए कार्यक्रम के लिए दिए गए हैं।
बरसों की मेहनत नहीं जाएगी बेकार
जीटीआरई के निदेशक डॉक्टर सीपी रामनारायण ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि डीआरडीओ का यह फैसला हो सकता है अभी अंतिम फैसला न हो।
जीटीआरई में 900 लोगों की एक टीम को लीड कर रहे डॉक्टर रामनारायण की मानें तो उनका एकमात्र मकसद अब अपनी टीम को आने वाली परियोजनाओं के लिए प्ररित करनप है।
उन्होंने कहा, 'यह अंत नहीं है। हमने उन 12 अहम क्षेत्रों की पहचान की है जहां पर तकनीक की सबसे ज्यादा जरूरत है और संगठन की कई टीमें इस लक्ष्य को हासिल करने में भी जुट गई हैं।' उन्होंने कहा कि कावेरी प्रोजेक्ट में कई वर्षों की मेहनत लगी थी और टीम की यह मेहनत बेकार नहीं जाएगी।
उन्होंने कहा कि दुनिया के कई ऐसे देश हैं जिन्हें इंजन बनाने में अभी महारत हासिल करनी है। डॉक्टर रामनारायण की मानें तो जीटीआरई ने अच्छी शुरुआत की है और देरी के बावजूद अपनी क्षमताओं को साबित किया है।
इस प्रोजेक्ट से जीटीआरई ने जो सीखा है वह बर्बाद नहीं जाएगी। भारत को अब एरो इंजन बनाने में खुद को सक्षम बनाना होगा और इसके लिए जीटीआरई की कोशिशें जारी रहेंगी।












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