सेना के लिये हर वक्त तत्पर रहता है द्रास
श्रीनगर में जहां हर पल सेना को लोगों के गुस्से और उनकी आलोचनाओं का सामना करना पड़ता है तो क्या द्रास में भी यही हालात हैं? लेकिन जब मैं यहां पर आई और लोगों से बात की तो हालात पूरी तरह से अलग नजर आए।
पेट्रोलिंग पर मुस्तैद सेना
कारगिल वॉर के बाद द्रास और उसके आस-पास मौजूद गांवों में हर पल सेना मुसतैदी से तैनात रहती है। एक सेकेंड भी ऐसा नहीं होता है जब कभी सेना के जवानों या अफसरों कभी पेट्रोलिंग में थोड़ी ढील भी दें। इसी का नतीजा है कि आज वह सभी गांव वाले सुकून की जिंदगी जी रहे हैं जो कारगिल वॉर के दौरान अपने घरों को छोड़कर जाने पर मजबूर हो गए थे।
आर्मी की वजह से आती है नींद
गुलाम मोहम्मद की उम्र इस समय 75 वर्ष है। वह तोलोलिंग रेंज के नीचे बसे एक गांव में रहते हैं। गुलाम खान वह व्यक्ति हैं जिन्होंने कारगिल वॉर के दौरान सेना के साथ कुछ दिन पहाड़ी पर बिताए थे। उन्हें आज भी याद है कि कैसे जब युद्ध हो रहा था तो सेना ने उनकी और उनके परिवार की जान बचाई थी।
गुलाम खान कहते हैं कि आज अगर इस गांव के लोग चैन की नींद सो पाते हैं तो उसकी वजह सिर्फ इंडियन आर्मी है। वह यह बताना भी नहीं भूलते हैं कि जिस समय युद्ध के हालात थे उस समय पूरा का पूरा गांव खाली हो गया था। जिस समय कारगिल वॉर जारी था, गुलाम खान सेना के जवानों को खाने-पीने का सामान भी मुहैया कराते थे।
सेना की वजह से द्रास का अस्तित्व
गुलाम खान की ही तरह इस गांव के एक और व्यक्ति हैं जाकिर खान। जाकिर इस समय द्रास में एक छोटी सी दुकान चलाते हैं। जाकिर की उम्र युद्ध के समय करीब 20 वर्ष थी। जाकिर कहते हैं कि आज अगर द्रास में टूरिस्ट आते हैं और वह थोड़ा समय बिता पाते हैं तो इसकी वजह कहीं न कहीं इंडियन आर्मी औरउसके पल-पल मुस्तैद जवान हैं। जाकिर के मुताबिक युद्ध के बाद द्रास को फिर से बसाने और इसे इसके पहले से बेहतर हालात में वापस लाने में बहुत मदद की। वह श्रीनगर के लोगों की राय से भी कोई इत्तेफाक नहीं रखते हैं कि सेना को श्रीनगर यहां पर राज्य के किसी भी हिस्से से हटा देना चाहिए।
लोगों को मिलता रोजगार
द्रास बर्फबारी की वजह से छह महीने तक पूरे देश से कट जाता है। इस दौरान न तो यहां के लोग कही जा सकते हैं और न ही बाहर से लोग यहां पर आ सकते हैं। उस समय सेना यहां के लोगों के लिए बड़ी राहत के तौर पर नजर आती है। जाकिर ने मुझे बताया कि पूरे दिन सेना के जवान गश्त लगाते रहते हैं और उसकी वजह से एक अजीब सी चहल-पहल देखने को मिल जाती है।
बिजनेस ठप्प रहता है और तब सेना यहां के लोगों को रोजगार मुहैया कराती है। बर्फ हटाना, ऊंची पोस्ट पर बैठे जवानों तक रसद पहुंचाना और कुछ और छोटे-मोटे कामों में सेना यहां के लोगों की मदद लेती है। जाकिर के मुताबिक उसकी वजह से यहां के लोग छह महीने तक हर माह 8,000 रुपए तक की कमाई कर लेते हैं।
जाकिर ने आखिरी में मुझसे कहा कि कोई कुछ भी कहे लेकिन यह हकीकत है कि यहां से अगर सेना गई तो फिर उन्हें भी अपने लिए कोई और जगह तलाशनी पड़ जाएगी।
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