बेंगलुरु के कॉलेज बांटे गए दहेज के फायदे बताने वाले नोट्स, लिखा है- 'दहेज से बदसूरत लड़कियों को शादी में मिलती है मदद'
बेंगलुरु। एक ओर पूरे देश में दहेज सरीखी दकियानूसी प्रथा को बंद करने और इसके खिलाफ आवाज उठ रही है वहीं कॉलेजों में इसका उल्टा पढ़ाया जा रहा है। ताजा मामला कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु स्थित एक कॉलेज का है। यहां बच्चों को बांटे गए नोट्स में दहेज के फायदे गिनाए गए हैं। बेंगलुरु के टॉप कॉलेज में बच्चों को नोट्स के रूप में जो फोटो कॉपी में बांटी गई है उसमें लिखा गया है कि 'बदसूरत लड़कियों का विवाह, जिनकी शादी नहीं हो सकती , उनकी शादी में भारी दहेज देकर उन्हें विवाह योग्य बनाया जा सकता है।' दहेज के समर्थकों का मानना है कि इससे फायदा होता है। दहेज साल 1916 के बाद से भारत में अवैध है। बांटे गए नोट्स में सुझाव दिया गया है कि इससे बदसूरत लड़कियों को विवाह करने में सहायता मिलती है।

बांटे गए नोट्स में यह भी लिखा है कि शादी के लिए अच्छे, सुंदर, और कभी-कभी अनिच्छुक लड़कों को आकर्षित करने के लिए यह एक उपयोगी और प्रभावी तरीका है और 'स्व-रोजगार प्रदान कर सकता है।' नोट्स में लिखा गया है कि दहेज से 'परिवार में महिला का स्तर बढ़ता है।' लिखा गया है कि इससे गरीब वर्ग के मेधावी लड़कों के लिए उच्च शिक्षा और उनका भविष्य के लिए दहेज एक अवसर के रूप में है। सेंट जोसेफ कॉलेज के जनसंपर्क अधिकारी प्रोफेसर किरण जीवन ने कहा कि इस मामले में जांच चल रही है। उनकी ओर से जारी बयान में कहा गया है कि 'इस तरह के विचार कॉलेज के पाठ्यक्रम का हिस्सा कभी नहीं रहे हैं। वास्तव में विभाग और कॉलेज इस तरह के अस्पष्ट और दमनकारी पितृसत्तात्मक विचारों का विरोध करते हैं।'
गौरतलब है कि इस साल की शुरुआत में, महाराष्ट्र सरकार ने एक जांच का आदेश दिया, जब यह पता चला कि कक्षा बारहवीं की समाजशास्त्र पाठ्यपुस्तक में लिखा गया है कि - 'यदि एक लड़की बदसूरत और विकलांग है, तो उसके लिए शादी करना बहुत कठिन हो जाता है। ऐसी लड़कियों से शादी करने के लिए, दूल्हे और उसके परिवार की दहेज की मांग होती है। ऐसी लड़कियों के माता-पिता असहाय हो जाते हैं और दुल्हन की मांगों के अनुसार दहेज अदा करते हैं'।












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