गधी का दूध भारत में 7,000 रुपये प्रति लीटर बिक रहा है- जानें हक़ीक़त: फ़ैक्ट चेक

गधी का दूध
Tim Graham/Getty Images
गधी का दूध

किसी को गधा कहना एक तरह से मूर्ख कहा जाना समझा जाता है. इसके अलावा कई लोग आम बोलचाल में लगातार काम करने वालों को 'गधे की तरह काम करने वाला' भी कहते हैं.

भारत में गधों का इस्तेमाल बोझा ढोने में होता रहा है लेकिन मोटर वाहन के आने के बाद बीते कुछ सालों में गधों की संख्या में काफ़ी कमी आई है. लेकिन अब गधों के बारे में ऐसी बातें सामने आ रही हैं जिससे शायद इनकी तादाद बढ़ाने में लोगों की दिलचस्पी जागे.

टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने मंगलवार को एक ख़बर प्रकाशित की जिसमें बताया गया कि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का हिसार (हरियाणा) में मौजूद राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केंद्र (NRCE) जल्द ही गधी के दूध की डेयरी स्थापित करने जा रहा है.

अख़बार लिखता है कि इस डेयरी में हलारी नस्ल के गधों को रखा जाएगा और उनका दूध निकाला जाएगा.

इसके अलावा एबीपी न्यूज़, नवभारत टाइम्स, नैशनल हेराल्ड जैसे मीडिया संस्थानों ने इस ख़बर को अपने यहां जगह दी और यह दावा किया कि गधी का दूध 7,000 रुपये प्रति लीटर तक बिक सकता है.

इन ख़बरों में गधी के दूध के फ़ायदों के बारे में भी काफ़ी कुछ कहा गया था. आइये हम बीबीसी हिंदी के फ़ैक्ट चेक में जानते हैं कि गधी के दूध के क्या लाभ हैं और क्या इसकी क़ीमत 7,000 रुपये प्रति लीटर तक कैसे हो सकती है.

गधी का दूध भारत में 7,000 रुपये प्रति लीटर बिक रहा है- जानें हक़ीक़त: फ़ैक्ट चेक

गधी के दूध के लाभ

संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन ने अपने शोध में पाया है कि बहुत से जानवरों के दूध को कम करके आंका जाता है, इनमें गधी और घोड़ी का दूध भी शामिल है.

संगठन का कहना है कि गधी और घोड़ी के दूध में प्रोटीन इस तरह का है कि जिन लोगों को गाय के दूध से एलर्जी है, यह उनके लिए बहुत बेहतर है. साथ ही संगठन लिखता है कि यह दूध एक इंसानी दूध की तरह है, जिसमें प्रोटीन और वसा की मात्रा कम होती है लेकिन लैक्टॉस अधिक होता है.

इसमें आगे कहा गया है कि यह जल्द ही फ़ट जाता है लेकिन इसका पनीर नहीं बनाया जा सकता है.

संयुक्त राष्ट्र का खाद्य एवं कृषि संगठन यह भी कहता है कि इसका उपयोग कॉस्मेटिक्स और फ़ार्मास्युटिकल उद्योग में भी होता है क्योंकि कोशिकाओं को ठीक करने और प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने के भी इसमें गुण हैं.

ऐसा कहा जाता है कि प्राचीन मिस्र की महिला शासक क्लियोपैट्रा अपनी ख़ूबसूरती बरक़रार रखने के लिए गधी के दूध में नहाया करती थीं.

NRCE के पूर्व निदेशक डॉक्टर मुक्ति साधन बसु कहते हैं कि गधी के दूध के दो प्रमुख लाभ पाए जाते हैं, पहला यह महिला के दूध जैसा होता है, वहीं दूसरा इसमें एंटी-एजिंग, एंटि-ऑक्सिडेंट और रीजेनेरेटिंग कंपाउंड्स होते हैं जो त्वचा को पोषण देने के अलावा उसे मुलायम बनाने में काम आते हैं.

डॉक्टर बसु कहते हैं, "भारत में गधी के दूध पर अभी बहुत अधिक रिसर्च की जानी बाकी है क्योंकि लोगों को इसके फ़ायदों को लेकर जानकारी नहीं है जबकि यूरोप में इसके बारे में लोग काफ़ी जानते हैं, कामकाजी महिलाएं अपने नवजात बच्चों के लिए गधी के पाश्चुरिकृत दूध का इस्तेमाल कर रही हैं और अब तो अमरीका ने भी इसकी अनुमति दे दी है."

वो कहते हैं, "इसमें लैक्टॉज़, विटामिन ए, बी-1, बी-2, बी-6, विटामिन डी और विटामिन ई भी होता है. गधी के दूध से बने साबुन, क्रीम, मॉश्चराइज़र की बाज़ार में मांग है और आज भारत में कई महिलाएं गधी के दूध के बने इन उत्पादों का इस्तेमाल कर रही हैं."

डॉक्टर बसु कहते हैं कि भारत में अभी गधी के दूध से कम उत्पाद बन रहे हैं लेकिन इसमें जब बढ़ोतरी होगी तो गधी के दूध की कमी होगी क्योंकि भारत में गधों की संख्या लगातार कम हो रही है.

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कितना दूध देती है गधी

एनआरसीई गधी के दूध की डेयरी के लिए गुजरात से हलारी नस्ल के गधे ला रहा है. आणंद कृषि विश्वविद्यालय के पशु आनुवंशिकी और प्रजनन विभाग के अध्यक्ष प्रोफ़ेसर डी.एन. रांक कहते हैं कि भारत में गधों की नस्लों के बारे में पहली बार इस तरह का काम हुआ है.

वो कहते हैं, "भारत में गधों की सिर्फ़ स्पीति नस्ल को मान्यता थी अब गुजरात के जामनगर और द्वारका में पाए जाने वाली हराली नस्ल के गधों को भी मान्यता दी गई है. यह गधे आम गधों से थोड़े ऊंचे और घोड़ों से थोड़े छोटे और सफ़ेद होते हैं. अब तक भारत में सड़कों पर घूमने वाले गधों की नस्ल की पहचान नहीं थी लेकिन अब दो नस्लों को पहचान मिल गई है जो अच्छी बात है."

प्रोफ़ेसर रांक कहते हैं कि गधों का ध्यान न रखना और उनसे बेतरतीब काम कराने से दूध नहीं मिल सकता है. वो कहते हैं कि एक गधी दिन में अधिकतम आधा लीटर दूध देती है और हर गधी का दूध उसके रख-रखाव के तरीक़े से घट बढ़ सकता है.

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7,000 रुपये लीटर है गधी का दूध?

गधी के दूध का कारोबार भारत में उस तरह से नहीं है जिस तरह से यह यूरोप और अमरीका में शुरू हो चुका है. प्रोफ़ेसर रांक कहते हैं कि भारत में अभी शुरुआत है, गधी का दूध महंगा ज़रूर है लेकिन यह अभी 7,000 रुपये प्रति लीटर तक नहीं बिक रहा है.

वो कहते हैं कि विभिन्न मीडिया संस्थानों ने भी 7,000 रुपये प्रति लीटर का आंकड़ा विदेशों के हवाले से दिया है.

वहीं, डॉक्टर बसु कहते हैं कि यह अभी शुरुआत है लेकिन फ़ार्म में रखकर गधे पालने का चलन तमिलनाडु, केरल या गुजरात में कुछ ही लोगों ने किया है और इसकी ख़रीद-फ़रोख़्त अधिकतर ऑनलाइन है.

सलीम अब्दुल लतीफ़ दादन मुंबई से वेरी रेयर ऑनलाइन डॉट कॉम नामक एक वेबसाइट चलाते हैं जो ऊंट, भेड़, गाय और गधी के दूध के साथ-साथ उससे बना घी और मिल्क पाउडर भी ऑनलाइन बेचती है.

वो कहते हैं, "गधे के दूध का दाम कोई तय नहीं है और यह कोई फ़ार्म के ज़रिए नहीं आता है. हम अपने लोगों से गांव से इस दूध को मंगवाते हैं. इस दूध को अधिकतर दवाई और कॉस्मेटिक्स के इस्तेमाल के लिए ही लोग लेते हैं."

सलीम कहते हैं कि 7,000 रुपये प्रति लीटर इसका दाम तब हो सकता है जब इसे आप किसी के पास कहीं दूर भेज रहे हों क्योंकि यह जल्दी ख़राब हो जाता है, अगर आप इसे मुंबई में ही हाथों हाथ लें तो 5,000 रुपये प्रति लीटर में मिल जाएगा.

वो कहते हैं कि सिर्फ़ साबुन और कॉस्मेटिक्स के उत्पाद से अलग यह पेट के बैक्टीरियल इन्फ़ेक्शन में भी बहुत काम आता है.

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गधी के दूध के प्रॉडक्ट का स्टार्टअप

टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंस से एमए करने के बाद दिल्ली की पूजा कौल ने तय किया कि वो गधों के ज़रिए मज़दूरी करने वाले लोगों के लिए कुछ बेहतर करना चाहती हैं. इसके बाद उन्होंने महाराष्ट्र के कोल्हापुर में ऐसे मज़दूरों और किसानों को इकट्ठा किया जिनके पास गधे थे.

उन्होंने गधी का दूध आम लोगों को बेचने के लिए एक मॉडल तैयार किया लेकिन यह उस वक़्त नाकाम रहा लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और अपने कुछ साथियों के साथ 'ऑर्गेनिको' नाम का एक स्टार्टअप शुरू किया जो गधी के दूध से स्किन केयर उत्पाद बनाकर बेचता है.

पूजा कहती हैं, "दिल्ली में इस स्टार्टअप की शुरुआत 2018 में हुई. हमने ग़ाज़ियाबाद और उसके आसपास के उन मज़दूरों को चिन्हित किया जो गधे रखते थे. वे इनके ज़रिए दिन में 300 रुपये कमाते थे लेकिन हमने उन्हें दूध बेचने के लिए राज़ी किया. शुरुआत में उनके घर की औरतों ने इस पर आपत्ति भी दर्ज की. उनको लगता था कि हम कोई जादू-टोने के लिए ये ले रहे हैं और उनकी गधी मर जाएगी लेकिन फिर वे दूध देने लगे. आज जब बाकी लोगों को पता चलता है कि हम गधी का दूध ख़रीदते हैं तो कई लोगों के फ़ोन आते रहते हैं."

पूजा कहती हैं कि वो 2,000 से 3,000 रुपये प्रति लीटर के दाम में दूध ख़रीदती हैं और फ़िलहाल 7,000 रुपये प्रति लीटर दूध कहीं नहीं बिक रहा है क्योंकि इसका दूध किसी फ़ार्म के ज़रिए नहीं बिकता है.

गधी के दूध के बने साबुन, मॉश्चराइज़र और क्रीम अच्छी ख़ासी तादाद में आपको अमेज़न और फ़्लिपकार्ट जैसे ऑनलाइनट स्टोर पर मिल जाएंगे लेकिन आप शायद उनकी क़ीमत देखकर दांतों तले उंगलियां दबा लें.

पूजा ख़ुद बताती हैं कि उनके 100 ग्राम साबुन की क़ीमत 500 रुपये है और इन्हें ख़रीदने वाला एक ख़ास वर्ग है.

भारत में गधों की स्थिति

गधी के दूध के दाम जहां हज़ार रुपये प्रति लीटर से ऊपर हैं वहीं गधों की तादाद सिर्फ़ एक लाख में सिमट चुकी है.

गधों की संख्या में 2012 के मुक़ाबले 61 फ़ीसदी की गिरावट दर्ज की गई है. 2012 में पशुओं की गणना में जहां गधों की संख्या 3.2 लाख थी वो 2019 की गणना में 1.2 लाख हो चुकी है.

गधों की कम होती संख्या में अगर गधी के दूध की मांग बढ़ी तो उसकी क़ीमत भी बहुत ऊपर जाएगी लेकिन फ़िलहाल बीबीसी हिंदी के फ़ैक्ट चेक की पड़ताल में यह पता लग रहा है कि गधी के दूध की क़ीमत अभी 7,000 रुपये प्रति लीटर नहीं हुई है.

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