पाकिस्तानी पीएम इमरान खान का सिर्फ मजाक न उड़ाएं, उनसे ये चीजें तो सीख ही सकते हैं भारतीय नेता
नई दिल्ली- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाउडी मोदी प्रोग्राम और उनकी अमेरिका यात्रा को जितनी लोकप्रियता और वाहवाही मिली है, पाकिस्तानी पीएम इमरान खान का उतना ही मजाक उड़ाया जा रहा है। ये सिर्फ भारत में ही नहीं हो रहा है। पाकिस्तान के सोशल मीडिया पर भी इमरान के लो-प्रोफाइल अमेरिकी दौरे और पीएम मोदी के हाई-प्रोफाइल इवेंट को लेकर उनकी किरकिरी हो रही है। खासकर जिस तरह से इमरान को सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस ने अपने निजी विमान से अमेरिका भेजा है, उसे पाकिस्तान की आर्थिक बदहाली से जोड़ा जा रहा है। ये बात भी सही है कि अमेरिका में पीएम मोदी का स्वागत जितना ही भव्य रहा, वहीं इमरान को वह पूछ भी नहीं मिल पाई जिसके वे हकदार माने जा सकते हैं। लेकिन, इतना कुछ होते हुए भी भारतीय नेताओं के लिए कम से कम इमरान खान सिर्फ मजाक के पात्र नहीं होने चाहिए। उन्होंने अबतक चाहे अपनी हरकतों से कितनी बार भी पाकिस्तान की भद क्यों न पिटवाई हो, लेकिन उसके पीछे उनकी मजबूरी भी है और पाकिस्तानियों के लिए उनकी चिंता भी झलकती है।

इमरान का क्यों उड़ रहा है मजाक?
इमरान खान सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा निशाने पर इसलिए हैं, क्योंकि वे अमेरिका जाने के लिए एक विशेष विमान का इंतजाम भी नहीं कर पाए। वे कॉमर्शियल फ्लाइट से पहले सऊदी अरब पहुंचे और वहां से न्यूयॉर्क जाने के लिए भी उनकी कॉमर्शियल फ्लाइट में ही बुकिंग थी। लेकिन, सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान का उन्हें कॉमर्शियल फ्लाइट से अमेरिका जाना नागवार गुजरा सो उन्हें अपना विशेष विमान दे दिया। सोशल मीडिया में इसके लिए इमरान को भिखारी के रूप में पेश किया जा रहा, उन्हें तरह-तरह नामों से दुत्कारा गया है। कारण ये है कि मोदी का ह्यूडसन दौरा यादगार बन चुका है। लेकिन, किसी ने इसपर चर्चा नहीं कि क्या पाकिस्तान की हालत इतनी पतली हो चुकी है कि वह अपने प्रधानमंत्री के लिए एक विमान का इंतजाम भी नहीं कर सकता?

सरकारी खर्च बचाने में जुटे हैं इमरान
दरअसल, किसी ने इसपर ध्यान नहीं दिया कि इमरान पाकिस्तान को बदहाली से उबारने के लिए सत्ता में आने के बाद से ही सरकारी खर्चे कम करने पर जोर दे रहे हैं और उनका यात्री विमान में सफर करना भी उसी मितव्ययिता का हिस्सा है। हकीकत ये है कि इमरान ऐसे सरकार के मुखिया हैं, जिस देश की अर्थव्यस्थता धाराशायी हो चुकी है। उन्होंने जनता का भरोसा हासिल करने के लिए सरकारी खर्चों में कमी करने पर जोर दे रखा है। उन्होंने अपने मंत्रियों को निर्देश दे रखा है कि जनता को ऐसा कतई महसूस नहीं होना चाहिए कि सरकार फिजूलखर्ची कर रही है।

ऐसे पाई-पाई बचा रहे हैं इमरान
सरकारी खर्चों में कटौती की शुरुआत इमरान खान ने सत्ता में आने के बाद अपने सरकारी बंगले से ही शुरू की थी। उनसे पहले की सरकारों ने प्रधानमंत्री के आवास पर 110 करोड़ रुपये आवंटित किए थे। इमरान की सरकार ने इसे घटाकर सिर्फ 75 लाख रुपये कर दिया। पाकिस्तान सरकार के एक प्रवक्ता ने इसी साल जून में बताया था कि इससे सरकार ने पीएम आवास पर खर्च होने वाले 32 फीसदी रुपये बचा लिए। पिछले जुलाई महीने में भी जब वे अमेरिका गए थे तो उन्होंने कॉमर्शियल फ्लाइट का ही इस्तेमाल किया था। जबकि, उनसे पहले के पाकिस्तानी नेता प्रावइवेट जेट में जाते थे। इमरान वहां पाकिस्तान राजदूत के आधिकारिक आवास में ही ठहरे,जबकि वे चाहते तो किसी लग्जरी होटल के महंगे सूट में भी ठहर सकते थे। बाद में पाकिस्तान सरकार की ओर से बताया गया कि इमरान के अमेरिकी दौरे पर जितना खर्च आया, वह 2013 में नवाज शरीफ के अमेरिकी दौर पर आए खर्च का मात्र आठवां हिस्सा है।

दिवालिया होते-होते बचा है पाकिस्तान
ये बात किसी से छिपी नहीं है कि पाकिस्तान सरकार अपने प्रधानमंत्री के लिए कॉमर्शियल फ्लाइट का भी टिकट जुगाड़ कर पा रही हो तो सिर्फ इसलिए कि उसे बहुत मुश्किल से इंटरनेशनल मॉनिटरी फंड (आईएमएफ) से 3 साल के लि 6 करोड़ डॉलर का बेलआउट पैकेज मिला है। अगर आईएमएफ से पाकिस्तान को ये लोन नहीं मिला होता तो वह दिवालिया घोषित हो जाता। यही वजह है कि पिछले अगस्त महीने में इमरान सरकार ने सरकारी दफ्तरों के लिए नई गाड़ियां खरीदने पर पाबंदी लगा दी है। पाकिस्तान सरकार के दफ्तरों को सर्कुलर जारी किया गया है कि वे एक से ज्यादा मैगजीन नहीं मंगवा सकते और किसी भी सरकारी संदेश छापने के लिए और किसी दूसरे काम के लिए पेज के दोनों और छपाई करवाना जरूरी है और कोई भी पेज खाली नहीं जाना चाहिए। इसके अलावा सरकारी दफ्तरों में एलपीजी, टेलीफोन, बिजली और चाय-पानी के भी खर्च कंट्रोल में रखने को कहा गया है।

इमरान से कुछ तो सीख सकते हैं भारतीय नेता
अगर इमरान खान पाकिस्तानी जनता की बदहाली के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने के लिए सरकारी खर्चे में कटौती करने के लिए ऐसे उपाय कर सकते हैं तो इससे भारतीय नेताओं और मंत्रियों को भी सीख लेने की जरूरत है। खासकर ऐसे समय में जब देश में मंदी की बात कही जा रही है, अर्थव्यवस्था की गति धीमी पड़ी है, बेरोजगारी की समस्या बरकरार है और कई सेक्टर में ग्रोथ गिर गया है।












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