मत करो राहुल की इंदिरा गांधी-राजीव गांधी से बराबरी
नई दिल्ली(विवेक शुक्ला)कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी 2 महीने के राजनीतिक वनवास के बाद राजनीति में अपनी जोरदार वापसी से काफी चर्चा में हैं। लेकिन जब कुछ मीडिया वाले राहुल की बराबरी उनके पिता स्वर्गीय राजीव गाँधी या फिर उनकी नानी श्रीमती इंदिरा गाँधी से करने की कोशिश करते हैं तो इन मीडिया कर्मियों के इतिहास ज्ञान और राजनीतिक विश्लेषण की क्षमता पर हंसी आती है।

मत करो तुलना
राहुल गाँधी के प्रति पूरे सम्मान और मीडिया कर्मियों के ज्ञान पर क्षोभ प्रकट करते हुए इतना करना चाहूँगा की राहुल गाँधी कभी भी राजीव गाँधी और इंदिरा गाँधी की बराबरी नहीं कर सकते।
पराजय से मुक्त
सबसे बड़ी बात यह है की राहुल और सोनिया अब जाकर 2014 के लोकसभा चुनाव की शर्मनाक पराजय से मुक्त हो पाए हैं और विपक्षी नेता के अंदाज़ में काम करने लगे हैं, लेकिन इंदिरा गाँधी और राजीव गाँधी ने 1977 और 1989 में चुनाव हारने के 2-3 महीने के अन्दर ही जोरदार विपक्षी नेता के अंदाज़ में काम करना शुरू कर दिया था। इसी आक्रामकता के चलते ही दोनों बार कांग्रेस जल्दी ही 1980 और 1991 में दुबारा सत्ता में वापस आ गयी। अभी तो कांग्रेस को माहौल बनाने में काफी वक़्त लगेगा।
केदारनाथ तक
पहले दिल्ली के रामलीला मैदान में किसान रैली, फिर केदारनाथ की पैदल यात्रा और अब साधारण रेल से पंजाब का सफ़र सब कुछ संसद से लेकर सड़क तक चर्चा का मुद्दा बन गया है। मीडिया भी खूब पब्लिसिटी दे रहा है राहुल के दौरों को।
जनता के सवाल
यह बात अलग है की अपने ताज़ा भारत भ्रमण में राहुल जनता के जो मुद्दे उठा रहें हैं ,उनको मीडिया में उतनी जगह नहीं मिल रही है जितनी मिलनी चाहिए। मुद्दों के स्थान पर राहुल को मीडिया ज्यादा जगह दे रहा है।राहुल को मिलने वाली मीडिया पब्लिसिटी से किसी को परेशानी नहीं होनी चाहिए लिहाजा हमको भी कोई परहेज नहीं है।
वरिष्ठ चिंतक अवधेश कुमार कहते हैं जब जब से छुट्टी से लौटे तब से किसानों के प्रतिनिधि नेता के तौर पर आए लोगों से बातचीत की। उसके बाद किसान खेत मजदूर रैली में भाषण दिया, फिर लोकसभा में किसानों की समस्याओं विशेषकर भूमि अधिग्रहण विधेयक पर बोला।
नौटंकी बताया
हालांकि शिरोमिणी अकाल दल की नेता हरसिमरन कौर बादल ने उन्हें नौटंकी करता बताया।












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