जानिए, क्या अमेठी में हार के डर से इस बार केरल के वायनाड से भी चुनाव लड़ रहे हैं राहुल गांधी?
नई दिल्ली- राहुल गांधी के दो सीटों से चुनाव लड़ने की अटकलबाजियों पर विराम लग गया है। उन्होंने उसी दूसरी सीट से चुनाव लड़ने का आखिरकार ऐलान कर दिया है, जिसको लेकर हफ्ते भर से कयासबाजियों का दौर जारी था। अब इस बात की आधिकारिक तौर पर पुष्टि कर दी गई है कि कांग्रेस अध्यक्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की अमेठी के साथ-साथ केरल के वायनाड लोकसभा क्षेत्र से भी पार्टी के उम्मीदवार होंगे। सवाल उठता है कि इस बार राहुल ने दो सीटों से चुनाव लड़ने का फैसला क्यों किया है? क्या इसमें पार्टी की कोई सोची-समझी रणनीति है या फिर अमेठी में स्मृति ईरानी के बढ़ते प्रभाव का डर?

कांग्रेस का गेमप्लान
कांग्रेस के नजरिए से देखें तो राहुल गांधी ने यह फैसला तमिलनाडु, कर्नाटक और केरल प्रदेश कांग्रेस कमेटियों की बार-बार की मांग को ध्यान में रखकर किया है। पार्टी को उम्मीद है कि अगर राहुल उत्तर भारत के साथ-साथ दक्षिण भारत से भी चुनाव लड़ेंगे, तो उनके चेहरे को अखिल भारतीय नेता के रूप में स्थापित करना बहुत आसान हो जाएगा। कांग्रेस की फर्स्ट फैमिली के इतिहास को देखें, तो उनके लिए यह कोई नई परंपरा भी नहीं है। राहुल की दादी इंदिरा गांधी और मां सोनिया गांधी दोनों वक्त-वक्त पर दक्षिणी राज्यों में भी अपनी चुनावी किस्मत आजमा चुकी हैं और उन्हें सफलता भी मिली है। पार्टी को लगता है कि अगर राहुल दक्षिण भारत से भी चुनाव लड़ेंगे तो तमिलनाडु, कर्नाटक और केरल जैसे राज्यों में भी पार्टी के कार्यकर्ताओं और मतदाताओं में ज्यादा जोश भर सकेंगे। जबकि, अमेठी और रायबरेली समेत बाकी पूर्वी यूपी की जिम्मेदारी तो प्रियंका गांधी अच्छी तरह संभाल ही रही हैं।

लेकिन, वायनाड ही क्यों?
अगर केरल की वायनाड सीट की भौगोलिक स्थिति को देखें तो यह राज्य का एकमात्र जिला है, जो कर्नाटक और तमिलनाडु की सीमाओं से भी लगता है। यानी राहुल वायनाड से लड़ेंगे तो उसका असर केरल समेत कर्नाटक और तमिलनाडु की सीटों पर भी उसका असर पड़ेगा। इसका मतलब ये हुआ कि राहुल के यहां पर मौजूदगी की वजह से कांग्रेस, कर्नाटक में बीजेपी को भी कड़ी टक्कर दे सकती है, तमिलनाडु में सत्ताधारी एआईएडीएमके का जमकर सामना कर सकती है और केरल की बाकी सीटों पर भी लेफ्ट के खिलाफ माहौल खड़ा कर सकती है।
वैसे भी पिछले दो चुनावों से इस सीट पर कांग्रेस के एमआई शनवास, सीपीआई के उम्मीदवारों को हरारकर जीतते रहे हैं। इसलिए आज की तारीख में कांग्रेसी इसे राहुल के लिए बेहद सुरक्षित सीट मान रहे हैं। गौरतलब है कि यह लोकसभा क्षेत्र 2008 के परिसीमन के बाद ही अस्तित्व में आया है। अगर दोनों चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन देखें तो 2014 में उसे यहां पर 41.21% वोट मिले थे, जबकि 2009 में वह 39% वोट शेयर प्राप्त करने में सफल हुई थी। कांग्रेसियों को यह भी पूरा यकीन है कि इस सीट पर उसे बीजेपी का भी कोई डर नहीं है और लेफ्ट सरकार से जनता का मोहभंग होने के कारण सीपीआई भी कड़ी चुनौती देने की स्थिति में नहीं है। यानी राहुल की पक्की जीत के लिए इससे सुरक्षित सीट ढूंढना नामुमकिन है।

राहुल की असली चुनौती
हालांकि, राहुल के लिए यह फैसला आने वाले दिनों में मुश्किलें भी खड़ी कर सकता है। राहुल लगातार तीन बार से अमेठी में जीतते रहे हैं। लेकिन, इस बात में कोई दो राय नहीं कि पिछले चुनाव में बीजेपी की स्मृति ईरानी ने अमेठी में अपनी मजबूत दावेदारी पेश की थी। उनका दावा है कि पिछले 5 वर्षों में वह अनेकों बार अमेठी का दौरा कर चुकी हैं। उन्होंने अमेठी के लिए कई विकास योजनाएं भी शुरू करवाई हैं। इस नाते उन्होंने वहां अपनी एक मजबूत पकड़ जरूर कायम की है। इसके अलावा राहुल की चाची मेनका गांधी भी इस बार पड़ोस की सुल्तानपुर सीट से चुनाव लड़ रही हैं और अटकलें तो यहां तक लगाई जा रही हैं कि वो अमेठी में स्मृति ईरानी के लिए प्रचार भी कर सकती हैं। ऐसे में कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का भी मानना है कि राहुल के लिए अबकी बार अमेठी पूरी तरह सेफ नहीं रह गई है और शायद इसलिए उन्होंने अपने लिए फिलहाल सबसे सुरक्षित वायनाड को भी चुना है।
जहां तक बीजेपी की बात है तो वह वायनाड की चर्चा शुरू होने के पहले दिन से ही इसको लेकर राहुल पर बहुत हमलावर है। खबरों के मुताबिक स्मृति 'भाग राहुल भाग' के तंज से उनपर कटाक्ष कर चुकी हैं, तो बीजेपी अध्यक्ष भी हार की डर से वायनाड जाने का आरोप लगा रहे हैं। वो तो यहां तक कह रहे हैं कि राहुल वायनाड में ध्रुवीकरण के जरिए जीत हासिल करना चाहते हैं। एक दूसरे बीजेपी नेता और केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद भी यही इल्जाम लगा रहे हैं कि वहां हिंदुओं की आबादी अल्पसंख्यकों की तुलना में कम है, इसलिए राहुल ने वहां से भी लड़ने का फैसला किया है।
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