राहुल गांधी की सियासत में बाधक कौन है? क्या सेल्फ गोल कर लेते हैं कांग्रेस नेता?

कांग्रेस पार्टी के नेता भले ही सामने से यह मानने से इनकार कर दें कि जाति जनगणना के मुद्दे पर संसद में पूर्व केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने राहुल गांधी को बैकफुट पर लगा दिया है, लेकिन अंदर ही अंदर पार्टी में खलबली मचने के संकेत जरूर सामने आ रहे हैं।

कथित रूप से कांग्रेस और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष के बेहद करीब माने जाने वाले एक वरिष्ठ पत्रकार का एक वीडियो वायरल है। इस वीडियो में वे जो कुछ कह रहे हैं उससे यह संकेत निकाला जा रहा है कि राहुल गांधी की जाति वाले कार्ड को उनके नजदीकी भी अब हजम करने के लिए तैयार नहीं हैं।

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2019 के लोकसभा चुनाव हारने के बाद बदली राहुल की सोच
2019 में जब राहुल गांधी की अगुवाई में कांग्रेस भाजपा से बुरी तरह से हारी थी, तबसे उन्होंने 'जाति जनगणना', 'जितनी आबादी उतना हक' जैसी बातें कहकर अपनी सियासत को अपने परिवार की विचारधारा के विपरीत ट्रैक पर दौड़ाना शुरू कर दिया था।

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99 सीटों पर ही जगने लगे अरमान
2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस लगातार तीसरे चुनाव में भी 100 का आंकड़ा पार नहीं कर पाई है। लेकिन, विपक्ष का नेता पद मिलने भर से ही कांग्रेस नेता के अरमान आसमान छूने लग गए और राहुल ने जाति वाला दांव को जारी रखा।

अनुराग ठाकुर की वजह से जाति वाले मुद्दे पर बैकफुट पर राहुल!
लेकिन, जब से भाजपा सांसद अनुराग ठाकुर ने लोकसभा में बिना नाम लिए राहुल गांधी से खुद उनकी जाति पूछ ली है, तबसे इस मुद्दे पर वे बैकफुट पर नजर आ रहे हैं। पहले उन्होंने विक्टिम कार्ड चलने की कोशिश की थी। लेकिन, लगता है कि जल्द ही समझ में आ गया कि अब भाजपा ने उनकी दुखती नस पर हाथ रख दिया है।

राहुल की जाति बन गया राजनीतिक मुद्दा
कांग्रेस के आधिकारिक प्रवक्ता राहुल की जाति पर सीधा जवाब न देकर भाजपा का काम आसान कर रहे हैं। जबकि, खुद राहुल गांधी का वह वीडियो भी वायरल है, जिसमें वे एक पत्रकार से उसकी जाति पूछने की कोशिश करते नजर आ रहे हैं। संसद में तो उन्होंने तस्वीर दिखाकर बजट से पहले हलवा सेरेमनी में शामिल अधिकारियों की जाति खोजने की ही कोशिश की थी, जिसका दांव उनपर उलटा पड़ता दिख रहा है।

समर्थक ही उठा रहे हैं राहुल गांधी की राजनीति पर सवाल!
कथित तौर पर गांधी परिवार के करीबी माने जाने वाले वह वरिष्ठ पत्रकार अपने वायरल बयान में यहां तक कहते सुने जा रहे हैं कि बजट बनाने वालों की जाति पूछकर राहुल गांधी 'खतरनाक राजनीति' कर रहे हैं। उन्होंने कहा है कि बजट निर्माताओं की जाति पूछने में 'कोई तत्व नहीं' है और यह 'खाली प्रतीकवाद' है।

जातिगत आंकड़ों पर राहुल 2011 से 2019 तक क्यों सोए रहे?
तथ्य यह है कि 2009 में जब दूसरी बार यूपीए की सरकार बनी थी तो 2011 में हुई जनगणना में लोगों से जुड़े जातिगत आंकड़े भी जुटाए गए थे। तब कांग्रेस पार्टी की कमान भले ही सोनिया गांधी के हाथों में थी, लेकिन दो बार के सांसद राहुल गांधी का दबदबा संगठन से लेकर सरकार तक में दिखने लगा था।

कहते हैं कि जनगणना में जातिगत आंकड़े जुटाने के पक्षधर तत्कालीन केंद्रीय मंत्री वीरप्पा मोइली थे, लेकिन तब जयराम रमेश और पी चिदंबरम जैसे नेता इससे सहमत नहीं थे और इसका भारी विरोध किया था।

आज रमेश राहुल के सबसे करीबियों में शामिल हैं। अगर राहुल गांधी को जाति जनगणना में इतनी ही समझदारी दिख रही थी, तब मनमोहन सरकार को उसके आंकड़े जारी करने से किसने रोका था?

कर्नाटक सरकार को जातिगत सर्वेक्षण के आंकड़े जारी करने से कौन रोक रहा?
इसी तरह से कर्नाटक में जब पिछली बार सिद्दारमैया की अगुवाई में कांग्रेस सरकार बनी थी तो उसने वहां जातिगत सर्वे करवाया था। इस बार कांग्रेस सरकार बने वहां 15 महीने से ज्यादा बीत चुके हैं, लेकिन उसके आंकड़े जारी करने की वह हिम्मत नहीं जुटा सकी है।

सबसे दिलचस्प बात ये है कि जिस कथित कांग्रेस समर्थक पत्रकार का वीडियो वायरल है, उन्होंने राहुल पर यह भी सवाल उठाया है कि उन्होंने भारत जोड़ो यात्रा के दौरान मोहब्बत की दुकान की बात की थी। लेकिन, अगर वह जाति वाले एजेंडे पर यूं ही आगे बढ़ते रहे तो इससे समाज में बहुत बड़े विभाजन पैदा होने की आशंका है, फिर उनकी मोहब्बत की दुकान का क्या होगा?

डेढ़ दशक की राहुल की राजनीति को देखने से यही लगता है कि वह अपनी राजनीति के सबसे बड़े बाधक खुद बने हुए हैं। वह समझ नहीं पाते कि देश की सबसे पुरानी सियासी पार्टी होने का दावा करने वाली कांग्रेस को पहले की तरह मजबूत बनाने के लिए शॉर्ट टर्म गोल नहीं, बल्कि लंबे लक्ष्य तय करके उसपर काम करना होगा।

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