क्या आप फ़ातिमा शेख़ को जानते हैं?

भारत में पहला कन्या स्कूल खोलने वाली समाजसुधारक सावित्रीबाई फुले का 3 जनवरी 1831 को जन्म हुआ.

सावित्रीबाई फुले आज अपने जन्मदिन की वजह से ट्विटर पर टॉप ट्रेंड्स में शामिल हैं.

सावित्रीबाई का निधन 10 मार्च 1897 को प्लेग बीमारी की वजह से हुआ था. पर क्या आपको पता है भारत का पहला कन्या स्कूल खोलने में फ़ातिमा शेख़ ने सावित्रीबाई फुले की मदद की थी.

लेकिन फ़ातिमा शेख़ आज गुमनाम हैं और उनके नाम का उल्लेख कम ही मिलता है.

आइए आपको फ़ातिमा शेख के बारे में बताते हैं

कैफ़ के सूर्य नमस्कार पर क्यों मचा बवाल?

सोशल- 'जवाब देने के लिए नंगी तस्वीरें, शर्म आती है'

फ़ातिमा शेख़ के बारे में लेखक सुभाष गताडे से बात की बीबीसी संवाददाता इक़बाल अहमद ने.

फ़ातिमा शेख़ सावित्रीबाई फुले की सहयोगी थीं. जब ज्योतिबा और सावित्री फुले ने लड़कियों के लिए स्कूल खोलने का बीड़ा उठाया, तब फ़ातिमा शेख़ ने भी इस मुहिम में उनका साथ दिया.

उस ज़माने में अध्यापक मिलने मुश्किल थे. फ़ातिमा शेख़ ने सावित्रीबाई के स्कूल में पढ़ाने की ज़िम्मेदारी भी संभाली. इसके लिए उन्हें समाज के विरोध का भी सामना करना पड़ा.

फुले के पिता ने जब दलितों और महिलाओं के उत्थान के लिए किए जा रहे उनके कामों की वजह से उनके परिवार को घर से निकाल दिया था, तब फ़ातिमा शेख़ के बड़े भाई उस्मान शेख़ ने ही उन्हें अपने घर में जगह दी.

फ़ातिमा शेख़ और उस्मान शेख़ ने ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई को उस मुश्किल समय में बेहद अहम सहयोग दिया था.

लेकिन अब बहुत कम ही लोग उस्मान शेख़ और फ़ातिमा शेख़ के बारे में जानते हैं.

सावित्रीबाई फुले
BBC
सावित्रीबाई फुले

हमने बचपन में फ़ातिमा शेख़ के बारे में स्कूली किताबों में पढ़ा है लेकिन इससे ज़्यादा जानकारी उनके बारे में नहीं है.

कुछ समूहों ने उनके बारे में जानकारी जुटाने की कोशिश की है. फ़ातिमा शेख़ का क्या हुआ और उन्होंने कैसे ज़िंदगी बिताई इसके बारे में बहुत जानकारियां अभी नहीं मिली हैं, लेकिन अधिक जानकारियां जुटाने की कोशिशें जारी हैं.

एक ऐसे समय में जब देश में सांप्रदायिक ताक़तें हिंदुओं-मुसलमानों को बांटने में सक्रिय हों, फ़ातिमा शेख़ के काम का उल्लेख ज़रूरी हो जाता है.

उस समय फ़ातिमा शेख़ के काम को मुस्लिम समाज में कितना समर्थन मिला, ये कहना मुश्किल है लेकिन हालात के मद्देनज़र ये कहा जा सकता है कि उन्हें भी विरोध का ही सामना करना पड़ा होगा.

डॉक्टर भीमराव अंबेडकर महात्मा बुद्ध, कबीर और ज्योतिराव फूले को अपने तीन गुरु कहते हैं.

ज्योतिराव और सावित्रीबाई फूले के योगदान को तो इतिहास ने दर्ज किया है लेकिन शुरुआती लड़ाई में उनकी सहयोगी रहीं फ़ातिमा शेख़ और उस्मान शेख़ का उल्लेख न हो पाना दुखद है.

नारी शिक्षा और धर्मनिरपेक्षता के सवाल पर सरोकार रखने वाले लोगों के लिए ये बहुत बड़ी चुनौती है कि वे फ़ातिमा शेख़ और उस्मान शेख़ के योगदान की खोजबीन करें.

स्त्रीमुक्ति आंदोलन की अहम किरदार रहीं फ़ातिमा पर शोध की ज़रूरत है. इतिहास के ऐसे मौन बहुत कुछ कहते हैं.

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+