पीएफ़आई पर बैन के बाद अब एसडीपीआई की चर्चा, कौन ले सकता है फ़ैसला?
एसडीपीआई चर्चा में क्यों
- केंद्रीय गृह मंत्रालय ने पीएफ़आई पर पाँच साल का बैन लगाने की अधिसूचना जारी की है.
- पीएफ़आई पर 'गुप्त एजेंडा चलाकर एक वर्ग विशेष को कट्टर बनाने' और 'आतंकवादी संगठनों से जुड़े होने' की बात कही गई है.
- एसडीपीआई पीएफ़आई की राजनीतिक शाखा है.
- एसडीपीआई का कहना है कि उस पर ताज़ा प्रतिबंध का कोई असर नहीं पड़ेगा. वो एक स्वतंत्र संस्था है.
- लेकिन, पीएफ़आई से जुड़े होने के बावजूद भी एसडीपीआई पर प्रतिबंध ना लगने पर हो रही है चर्चा.
पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया पर पाँच साल का प्रतिबंध लगने के बाद ये चर्चा चल रही है कि उसकी राजनीतिक शाखा एसडीपीआई पर प्रतिबंध क्यों नहीं लगाया गया है.
पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफ़आई) और उसकी आठ सहयोगी संस्थाओं पर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद 'सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ़ इंडिया' (एसडीपीआई) ने कहा था कि उस पर ताज़ा प्रतिबंध का कोई असर नहीं पड़ेगा.
एसडीपीआई ने यह भी दावा किया है कि वह एक स्वतंत्र संस्था है और पीएफ़आई से उसका कोई लेना-देना नहीं है.
अब चर्चा इस बात पर भी है कि राजनीतिक पार्टी होने के कारण क्या भारतीय चुनाव आयोग (ईसीआई) एसडीपीआई पर प्रतिबंध लगाने के लिए क़दम उठाएगा?
लेकिन, तथ्य ये है कि चुनाव आयोग के पास किसी राजनीतिक पार्टी का पंजीकरण रद्द करने या उसे अमान्य करार देने का अधिकार नहीं है.
चुनाव आयोग राजनीतिक पार्टी को सिर्फ़ पंजीकृत कर सकता है और जब भी कोई पार्टी विधानसभा चुनाव में छह प्रतिशत वोट हासिल करती है और वो कम से कम तीन विधानसभा सीटें जीतती है तभी उसे राजनीतिक पार्टी की मान्यता मिलती है.
पार्टी को मान्यता मिलने के बाद उसे विशेष चुनाव चिन्ह दिया जाता है, जो सिर्फ़ वही पार्टी इस्तेमाल करती है. अगर मान्यता नहीं मिलती है, तो एक फ्री चुनाव चिन्ह दिया जाता है.
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टीएस कृष्णमूर्ति बताते हैं, ''ईसीआई के पास किसी राजनीतिक पार्टी का पंजीकरण रद्द करने या अमान्य करार देने का अधिकार नहीं है. एक संघ बनाना बुनियादी अधिकार है. इसे लेकर कोई विशेष शक्तियां नहीं हैं कि किन परिस्थितियों में इसे ख़ारिज किया जा सकता है. इसलिए ईसीआई राजनीतिक पार्टी को अमान्य नहीं कर सकती.''
अगर कोई राजनीतिक पार्टी अपने संविधान का पालन नहीं करती है या उदाहरण के तौर पर ऑडिट किए गए अकाउंट्स जमा नहीं करती है तो कार्रवाई से पहले उसे ईसीआई के सामने अपना पक्ष रखने का मौक़ा दिया जाता है.
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पीएफ़आई के ही सदस्य एसडीपीआई में
एसडीपीआई के एक पूर्व अधिकारी के मुताबिक़, एसडीपाई के मामले में स्थिति अलग है. एसडीपीआई के पूर्व राष्ट्रीय सचिव तसलीम अहमद रहमानी ने बीबीसी से कहा, ''प्रक्रियाओं और नियमों के अनुपालन के मामले में ये बिल्कुल सही है.'' लेकिन, वो बताते हैं कि एसडीपीआई के साथ एक अन्य मसला है.
रहमानी कहते हैं, ''पार्टी के लगभग 60 प्रतिशत लोग पीएफ़आई से जुड़े हुए हैं. इसमें नेशनल वर्किंग कमेटी और राष्ट्रीय सचिवालय भी शामिल हैं. अध्यक्ष, राष्ट्रीय महासचिव, कोषाध्यक्ष सभी पीएफ़आई के सदस्य हैं. बल्कि वो सभी पीएफ़आई के काडर हैं.''
रहमानी का ये भी कहना है कि एसडीपीआई जो भी करती है, उस पर पीएफ़आई की मुहर ज़रूर होती है. ''किसी सम्मेलन या बैठक में पूरे बहुमत से कोई प्रस्ताव पास हो भी जाए तो आगे पीएफ़आई इसे खारिज कर देती है. पार्टी का ऐसा कोई अध्यक्ष नहीं रहा जो पीएफ़आई से ना जुड़ा हो.''
हालांकि, एसडीपाई के राष्ट्रीय महासचिव इलियास थंबे इससे विपरीत दावा करते हैं. वह कहते हैं, ''पीएफ़आई, एसडीपीआई को नियंत्रित नहीं करती है. एसडीपीआई में समाज के सभी वर्ग शामिल हैं. कोई पीएफ़आई से है, तो कोई जमात-ए-इस्लामी, सुन्नी समूह, देवबंद और सलाफ़ी से है. हम ये नहीं कह सकते कि ये पीएफ़आई का ही एक संगठन है.''
एसडीपीआई को अप्रैल 2020 में एक राजनीतिक पार्टी के तौर पर पंजीकृत किया गया था. ये दक्षिण भारतीय राज्यों के साथ-साथ राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में भी चुनाव लड़ती है. लेकिन उसे विधानसभा या लोकसभा में ज़रूरी वोट प्रतिशत या सीटें नहीं मिली हैं.
पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष एमके फै़ज़ी कहते हैं, ''हमें अभी उतने वोट नहीं मिले हैं कि हमें मान्यता प्राप्त पार्टी का दर्जा मिल सके. हम सभी विधानसभा सीटों पर चुनाव नहीं लड़ते हैं. हम भविष्य में अलग-अलग राज्यों में ज़्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने की योजना बना रहे हैं.''
पर सवाल अब भी क़ायम है कि अगर चुनाव आयोग नहीं, तो फिर एक राजनीतिक दल को अमान्य घोषित करने का अधिकार किसके पास है.
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राजनीतिक दलों पर फ़ैसला कौन लेता है?
किसी संवैधानिक या क़ानूनी शक्तियों के अभाव में चुनाव आयोग सिर्फ़ किसी राजनीतिक पार्टी को चुनाव चिन्ह देने से इनकार कर सकता है.
हाल के समय में आयोग ने ऐसी पार्टियाँ जो अस्तित्व में ही नहीं हैं और ऐसी पार्टियाँ जो पंजीकृत तो हैं, लेकिन उन्हें मान्यता नहीं मिली है, उन्हें अपनी सूची से हटाया है.
दो हफ़्ते पहले चुनाव आयोग ने 86 राजनीतिक दलों को अपनी सूची से हटाया है. इसके अलावा आयोग ने ऐसी 253 पार्टियों को निष्क्रिय घोषित किया है जो पंजीकृत तो हैं, लेकिन मान्यता प्राप्त नहीं हैं. इन दलों ने छह सालों से लगातार कोई चुनाव नहीं लड़ा था.
चुनाव आयोग ने साल 2004 में केंद्र सरकार को चुनाव सुधार से जुड़ा प्रस्ताव दिया था.
इसने सुझाव दिया गया था कि लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29ए के तहत एक और धारा जोड़ी जा सकती है जिसके तहत चुनाव आयोग को राजनीतिक दलों के पंजीकरण और उनका पंजीकरण रद्द करने के लिए ज़रूरी आदेश देने का अधिकार मिल सके.'
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ये 26 पन्नों का प्रस्ताव साल 2004-2005 में दिया गया था जब कृष्णमूर्ति मुख्य चुनाव आयुक्त थे. सरकार के इस संबंध में कोई फ़ैसला ना लेने पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद ही कोई बदलाव हो सकता है. चुनाव आयोग लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951, संविधान और सुप्रीम कोर्ट के तहत काम करता है.
कृष्णमूर्ति कहते हैं, ''मैं अब भी मानता हूँ कि राजनीतिक दलों के गठन, कामकाज और नियमन को नियंत्रित करने के लिए एक अलग क़ानून हो सकता है. ऐसा क़ानून कई यूरोपीय देशों के साथ-साथ अफ्ऱीकी देशों में भी मौजूद है.''
एसडीपीआई पर प्रतिबंध लगना चाहिए या नहीं इस पर फ़ैसला लेने का अधिकार सरकार के पास है. इसका संकेत कर्नाटक के मुख्यमंत्री बासवराज बोम्मई दे चुके हैं.
उन्होंने कहा था- एसडीपीआई चुनाव आयोग में पंजीकृत पार्टी है और अभी तक केंद्र सरकार ने इस पर कोई फ़ैसला नहीं लिया है. आगे जो होगा उसके आधार पर कार्रवाई की जाएगी.
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