कांग्रेस की अध्यक्षता के लिए यूथ और सीनियर ब्रिगेड में दंगल, कौन मारेगा बाजी?
नई दिल्ली- कांग्रेस अध्यक्ष पद से राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद पार्टी में युवाओं और वरिष्ठों के बीच जारी लॉबिंग अब खुलकर सामने आ चुकी है। बुजुर्ग कांग्रेसी किसी भी सूरत में संगठन पर से अपनी पकड़ ढीली नहीं होने देना चाहते। वहीं शायद पहलीबार खुलकर गांधी परिवार से अलग किसी दूसरे युवा चेहरे को कमान सौंपने की भी मांग उठी है। यही वजह है कि कांग्रेस इस मुद्दे पर अभी तक किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाई है। कभी लगता है कि फिर से किसी वरिष्ठ नेता को ही मौका मिल सकता है, तो कभी लगता है कि अब कांग्रेस में भी बुजुर्गों के दिन लद चुके हैं। आइए समझने की कोशिश करते हैं कि पार्टी में आखिर चल क्या रहा है और अध्यक्ष के नाम पर सहमति बनाने में अड़चन क्या है?

गांधी परिवार चुनाव प्रक्रिया से दूर?
आजादी के बाद से कांग्रेस में मोटा-मोटी आलाकमान संस्कृति ही हावी रही है। लेकिन, मौजूदा समय में पार्टी की यही संस्कृति किसी सर्वमान्य नेता के चुनाव में बाधक बनती नजर आ रही है। राहुल गांधी ने इस्तीफा देते वक्त ही साफ कर दिया था कि पार्टी उनके परिवार से किसी अलग व्यक्ति को अध्यक्ष बनाने की सोचे। बाद में उन्होंने इस बात का भी संकेत दिया था कि अध्यक्ष तय करने की प्रक्रिया में भी उनके परिवार का कोई रोल नहीं रहेगा और पार्टी आपसी सहमति से किसी नाम पर विचार करे। लेकिन, अब साफ होता जा रहा है कि इसबार गांधी परिवार की यही लाइन अध्यक्ष चुनने की प्रक्रिया में पेंच फंसा रहा है। इकोनॉमिक टाइम्स की एक खबर के मुताबिक एक सीनियर कांग्रेसी ने पार्टी में इसको लेकर जारी असमंजस को कबूल भी किया है। उस नेता के मुताबिक,"समस्या ये है कि तीनों गांधियों ने चुनाव प्रक्रिया से खुद को दूर कर रखा है। इससे ज्यादा कंफ्यूजन पैदा हो रही है।"

युवा को कमान सौंपने के लिए बढ़ा दबाव
पिछले दो दिनों में कांग्रेस के दबदबे वाले खेमे से किसी युआ को ही कमान सौंपने की मांग उठनी शुरू हो गई है। कांग्रेस जैसे संगठन के लिए इसे बहुत बड़े बदलाव के रूप में देखा जा सकता है। लोकसभा चुनाव में करारी शिकस्त के महीने भर बाद जिस तरह से ज्योतिरादित्य सिंधिया और मिलिंद देवड़ा ने हार की जिम्मेदारी लेते हुए अपने पदों से इस्तीफा दिया है, इसको भी उसी चश्मे से देखा जा सकता है। क्योंकि, राहुल के बार-बार इशारे के बावजूद अभी तक किसी सीनियर नेता ने ऐसा सियासी जोखिम लेने का साहस नहीं दिखाया है। उधर पंजाब के मुख्ययमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की ओर से युवा नेता को कमान सौंपने की सलाह के बाद इस मांग की गंभीरता बहुत ज्यादा बढ़ गई है। ऊपर से पंजाब कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और पार्टी सांसद प्रताप सिंह बाजवा ने भी कैप्टन की मांग का समर्थन करके इस मसले को और हवा दे दिया है। बाजवा ने कहा है कि, "हमें ऐसा व्यक्ति चाहिए, जो इस पद पर लंबे समय तक रह सके और मेरी राय में पार्टी को बेहतर परिणाम देने के लिए युवा अध्यक्ष सबसे अच्छा होगा।" पार्टी में इस तरह की मांगें उठने के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया और राजस्थान के उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट के नाम अध्यक्ष पद के लिए तेजी से लिए जाने लगे हैं। उधर मुंबई कांग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने वाले मिलिंद देवड़ा ने भी पार्टी को स्थिर करने के लिए नेशनल लेवल पर योगदान देने की इच्छा जता दी है।

वरिष्ठ नेताओं की जारी है लॉबिंग
जाहिर है कि पंजाब से कांग्रेस के दो वरिष्ठ नेताओं की ओर से किसी युवा चेहरे को अध्यक्ष बनाए जाने की मांग करने के बाद पार्टी के मठाधीशों में खलबली मच गई होगी। खासकर अमरिंदर सिंह ने जिस तरीके से अपनी राय सार्वजनिक की है, उसे सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा के अलावा किसी के लिए सिरे से खारिज करना आसान नहीं है। वरिष्ठों के बीच अभी तक मल्लिकार्जुन खड़गे, सुशील कुमार शिंदे और मुकुल वासनिक जैसे दलित नेताओं के नाम पर सहमति बनाने की कोशिश चल रही थी। लेकिन, कैप्टन ने बुजुर्गों के गुट को भारी दबाव में ला दिया है। हो सकता है कि यह खेमा अब मुकुल वासनिक का नाम आगे बढ़ाने की कोशिश करे, क्योंकि उनकी उम्र ज्यादा नहीं है और चर्चित युवा नामों के मुकाबले उनपर दलित होने का टैग भी लगा हुआ है।

दो गुटों के दंगल में तीसरे को मिल सकता है मौका?
कुल मिलाकर कहा जाय, तो अगर सच में गांधी परिवार ने अध्यक्ष का नाम तय करने के मोह से इसबार अंत-अंत तक खुद को अलग रख लिया, तो कांग्रेस पार्टी के लिए इस टास्क को पूरा करना इतना आसान नहीं रहने वाला है। हो सकता है कि आखिरकार किसी ऐसे नाम पर सहमति बनाने का फैसला लेना पड़े, जिसपर सभी तैयार हो जाएं। ऐसे में कोई ऐसा नाम भी सामने आ सकता है, जो अबतक सीन से पूरी तरह गायब है। मुंबई कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और बड़बोले कांग्रेसी संजय निरुपम ने कहा है कि, "पार्टी अध्यक्ष किसी ऐसे तेजतर्रार नेता को होना चाहिए, जो सत्ताधारी दल के खिलाफ सड़कों पर उतर सके।" हालांकि, उन्होंने अफसोस जताते हुए कहा है कि, "दुख इस बात की है कि अबतक जिन नामों की चर्चा हो रही है, उनमें से ज्यादातर पहले मोदी का सामना करने से भागते रहे हैं। हमें ऐसे नेताओं की जरूरत है, जो राहुल गांधी की तरह संघर्ष की राजनीति कर सकें।" गौरतलब है कि ये वही संजय निरुपम हैं, जो मिलिंद देवड़ा के इस्तीफे पर उसमें त्याग की भावना नहीं होने जैसा तंज कस चुके हैं। क्योंकि, चुनाव से पहले राहुल ने इनकी जगह देवड़ा को मुंबई कांग्रेस की जिम्मेदारी सौंपी थी।
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