पीएम मोदी पर बिलावल भुट्टो की विवादित टिप्पणी क्या पाकिस्तान के लिए बनी मुश्किल

बिलावल भुट्टो
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर पाकिस्तानी विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो ज़रदारी की विवादित टिप्पणी की चर्चा अब भी दोनों देशों में हो रही है. सोमवार को भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा है कि पाकिस्तान से इससे ज़्यादा उम्मीद भी नहीं की जा सकती है.

इंडिया टुडे के कार्यक्रम में जयशंकर से सवाल पूछा गया कि पड़ोसी मुल्क के विदेश मंत्री की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर जो कहा गया है, उसे वह कैसे देखते हैं?

इसके जवाब में उन्होंने कहा, "हमें जो कहना है वो हम पहले ही कह चुके हैं. हमारा बयान सबके सामने है. इसे ऐसे समझ लिजिए कि पाकिस्तान से हमारी उम्मीदें कभी बहुत ज़्यादा नहीं रही हैं."

बीते सप्ताह भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर के संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में पाकिस्तान को आतंकवाद का 'एपिसेंटर' और 'ओसामा बिन लादेन को पनाह देने वाला' देश बताया था.

उसके बाद पाकिस्तानी विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो ज़रदारी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर एक विवादित बयान दिया. उन्होंने गुजरात दंगों का हवाला देकर उन पर टिप्पणी की.

भुट्टो के इस बयान को भारतीय विदेश मंत्रालय ने असभ्य बताया था.

भारत ने अपने बयान में कहा था, "यह बयान बहुत ही निचले दर्जे का है. पाकिस्तान के विदेश मंत्री साल 1971 भूल चुके हैं जब पाकिस्तान के शासकों ने बंगाली और हिंदुओं के खिलाफ़ जनसंहार शुरू किया था. दुर्भाग्य से पाकिस्तान का अल्पसंख्यकों के प्रति रवैया ज़्यादा नहीं बदला है. भारत पर आरोप लगाने की हैसियत में पाकिस्तान नहीं है. "

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बिलावल भुट्टो ने अपना ही नुक़सान किया है?

भारत के अंग्रेज़ी अख़बार द इंडियन एक्सप्रेस ने दोनों देशों के बीच चल रही इस बयानबाज़ी पर संपादकीय लिखा है.

अख़बार ने लिखा है, ''पाकिस्तानी विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो ज़रदारी की ओर से प्रधानमंत्री मोदी पर दिए गए बयान से भारत का कुछ नहीं बिगड़ेगा लेकिन इससे ये ज़रूर दिख गया कि पाकिस्तान पीपल्स पार्टी के नेता कूटनीति को लेकर कितनी कम समझ रखते हैं. एक सरकार दूसरी सरकार पर हमले करती है और ये होता है, लेकिन किसी पर व्यक्तिगत हमले करना कूटनीति में बेहद दुर्लभ वाक़या है. यह तब होता है, जब दो देशों ने ये ठान लिया हो कि उन्हें रिश्ते पूरी तरह ख़त्म कर देना है.''

अख़बार ने लिखा है, ''लेकिन पाकिस्तान के मामले में ये साफ़ नहीं है. भुट्टो शहबाज़ शरीफ़ की गठबंधन की सरकार के मंत्री हैं, जिनकी पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज़) सरकार में रहे या ना रहे लेकिन भारत के साथ सामान्य रिश्ते बयाए रखने के लिए जानी जाती है. जब इमरान ख़ान को हटाकर पाकिस्तान में नई सत्ता आई तो लगा कि भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्ते में तब्दीली आएगी लेकिन बिलावल भुट्टो के बयान ने ज़ाहिर तौर पर उसे और बिगाड़ा ही है.''

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इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा है, ''ये समझ पाना मुश्किल है कि नौजवान विदेश मंत्री भुट्टो भारत को लेकर पारंपरिक हार्डलाइनर रवैया अपनी समझ के कराण अपना रहे हैं या ये सिर्फ़ 'सेना की समर्थित सरकार' का नतीजा है.

अख़बार ने दोनों देशों की कूटनीतिक गतिविधियों की तुलना की है. अख़बार लिखता है कि भारत अपनी कूटनीति सूझबूझ से सऊदी अरब और यूएई दो देश जिसे पाकिस्तान अपना 'बिरादर' बताता है, उससे बेहद क़रीबी रिश्ते बना चुका है. जल्द ही भारत मुस्लिम आबादी वाले देश इंडोनेशिया को ब्रह्मोस मिसाइल भी बेचने वाला है. यहाँ तक कि तुर्की के राष्ट्रपति रेचैप तैय्यब अर्दोआन, जो भारत-विरोधी माने जाते रहे हैं, उन्होंने शंघाई को-ऑपरेशन ऑर्गेनाइज़ेशन में पीएम मोदी के साथ हुई बैठक के बाद भारत के लिए नरम पड़ते दिख रहे हैं.''

अख़बार ने लिखा है, ''ऐसे में भुट्टो को देखना चाहिए कि अपनी कूटनीतिक समझ की कमी के कारण कहीं पाकिस्तान को अलग-थलग ना कर दें. पाकिस्तान अपनी धरती पर आर्मी समर्थित चरमपंथी समूह को बयानबाज़ी से शायद ढँक लेने की कोशिश करे लेकिन इसका असर वहाँ जगज़ाहिर है और उनका लागातार अर्थव्यवस्था को लेकर और अन्य तरह के संघर्ष भी दुनिया के सामने हैं.''

जयशंकर
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पाकिस्तानी मीडिया क्या कह रहा है?

पाकिस्तानी के अंग्रेज़ी अख़बार डॉन ने भी हालिया घटनाक्रम पर एक संपादकीय लिखा है.

अख़बार कहता है कि बीते दिनों में हो रही बयानबाज़ी से दोनों देशों के रिश्ते तेज़ी से बिगड़ रहे हैं. हाल ही में पाकिस्तान के गृहमंत्री राणा सनाउल्लाह ने कहा कि भारत पाकिस्तानी ज़मीन पर आतंकवादी गतिविधियों में शामिल है और उन्होंने बीते साल लाहौर के जोहार शहर में हुए ब्लास्ट के पीछे भारत का हाथ होने की बात कही. इसके एक दिन बाद विदेश राज्य मंत्री हिना रब्बानी खर ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि 'भारत से ज़्यादा आतंकवाद का बेहतर इस्तेमाल किसी देश ने नहीं किया.'''

इसके बाद संयुक्त राष्ट्र में विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो ज़रदारी और भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर के बीच सीधे एक दूसरे पर तीखे बयान दिए जा रहे हैं.

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डॉन ने लिखा है, ''अब पाकिस्तान को ज़रूरत है कि वो इस कूटनीतिक तल्खी को बेहद ध्यान से संभालते हुए साझे और दूरदर्शी दृष्टिकोण की ओर बढ़े. साथ ही पाकिस्तान को ये ज़ाहिर कर देना चाहिए कि पाकिस्तान की सीमा को किसी भी तरह की धमकी बर्दाश्त नहीं कि जाएगी लेकिन इन सभी बातों को सामने रखते हुए अब दोनों देशों को शांति कायम करने की ओर क़दम बढ़ाना चाहिए ना कि युद्ध के नगाड़े बजाने चाहिए.''

पाकिस्तानी न्यूज़ चैनल नया दौर टीवी के एक कार्यक्रम में रक्षा विशेषज्ञ आयशा सिद्दीक़ा से बात करते हुए पाकिस्तानी की ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई के पूर्व प्रमुख जनरल असद दुर्रानी ने कहते हैं कि ये बैठकें एक सर्कस की तरह होती हैं, जहाँ दो नेता सोचते हैं कि वो एक बात के बदले दो बाते किसी के बारे में कह दें, ये इसलिए होता है कि मीडिया मे कवरेज मिल जाए और अपने वतन में लोग इस पर बातें कर लें.

''लेकिन इस तरह की बयानबाज़ी का ज़मीन पर कोई असर नहीं होता. जहाँ तक भारत-पाकिस्तान के रिश्तों की बात है वह पहले से ही एक जगह पर आ कर ठहर चुका है.''

दुर्रानी ने कहा, ''पहले कुछ कोशिशें बेहतरी की हुईं. जैसे मुशर्रफ़ ने कंपोज़िट डॉलयाग शुरू किया. भारत में भी देसाई सरकार, आईके गुजराल सरकार, चंद्रशेखर सरकार ने दोनों देशों के बीच रिश्ते बेहतर करने की कोशिश की लेकिन रिश्ते ठीक नहीं हुए. इस समय भारत नहीं चाहता कि पाकिस्तान के साथ उसकी यथास्थिति में कोई बदलाव हो क्योंकि ये उसके नरैटिक के लिए मुफ़ीद है.''

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हालिया बयानबाज़ियां जिससे तनाव और बढ़ा

बीते सप्ताह बुधवार को भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कहा है कि 'जो मुल्क पड़ोसी देश की संसद पर हमला करता हो और लादेन की मेज़बानी करता हो, उसे यहाँ ज्ञान नहीं देना चाहिए.'

भारत दिसंबर महीने में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अध्यक्षता कर रहा है.

रब्बानी के बयान पर पलटवार करते हुए जयशंकर ने कहा था, ''मुझे पता है कि हम बीते ढाई साल कोविड से जूझे हैं. इसकी वजह से हममें से ज़्यादातर लोग ब्रेन फ़ॉग से जूझ रहे हैं. लेकिन मैं आपको आश्वस्त करना चाहता हूं कि दुनिया ये नहीं भूली है कि आतंकवाद कहाँ जन्म लेता है. इस क्षेत्र (दक्षिण एशिया) और इससे परे सामने आने वाली आंतकी गतिविधियों पर किसकी उंगलियों के निशान हैं. मैं ये कहूंगा कि उन्हें आदतन इस तरह की फंतासी भरी कहानियों में उलझने से पहले ख़ुद को इस बात का इल्म कराना चाहिए."

इसके बाद पाकिस्तानी विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो ज़रदारी ने पीएम मोदी पर विवादित बयान दिया था.

भुट्टो के अफ़ग़ानिस्तान पर दिए बयान पर भी आलोचना

पाकिस्तान के विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो का एक और बयान चर्चा में है. इसमें उन्होंने चेताने वाले रवैये में कहा है कि तालिबान सरकार तहरीक-ए-तालिबान को सीमा-पार आतंकवाद से रोके वरना पाकिस्तान 'सीधी कार्रवाई' करेगा.

आर्मी पब्लिक स्कूल नरसंहार की आठवीं बरसी पर संयुक्त राष्ट्र के मुख्यालय में आयोजित एक कार्यक्रम में भुट्टो ने कहा तहरीक-ए-तालिबान को संयुक्त राष्ट्र ने आंतकवादी संगठन घोषित किया है.

उन्होंने कहा, "ऐसा लगता है कि टीटीपी ने पाकिस्तान के ख़िलाफ़ जंग का ऐलान कर दिया है. इसके हमले तेज़ हो गए हैं. पाकिस्तान टीटीपी या बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी जैसे अन्य आतंकवादी समूहों के सीमा पार आतंकवाद को बर्दाश्त नहीं करेगा, इन्हें हमारे दुश्मन वित्तीय सहायता भी करते हैं."

"हम उनके ख़िलाफ़ सीधी कार्रवाई करने का अधिकार रखते हैं."

https://twitter.com/abasitpak1/status/1604157684550619136

बिलावल के इस बयान को कूटनीति के जानकार ग़ैर-ज़रूरी तो कुछ इसकी तारीफ़ कर रहे हैं.

भारत में पाकिस्तान के उच्चायुक्त रह चुके अब्दुल बासित ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि "क्या इस बयान की ज़रूरत थी?"

एक वीडियो विश्लेषण मे बासित ने कहा, "कई लोग विदेश मंत्री के इस बयान को बड़ा ज़बर्दस्त मान रहे हैं. उनका ये कहना कि पाकिस्तान में अगर दहशतगर्दी फैलाई जाएगी तो वह अफ़ग़ानिस्तान की सीमा में घुस कर जवाब देगा. अमेरिका भी ऐसा करता है. आतंकी संगठनों के ठिकानों को टारगेट कर हमले करने चाहिए. अमेरिका 9/11 के बाद अफ़गानिस्तान में आतंकवादी ठिकानों पर ड्रोन हमले कर चुका है तो पाकिस्तान को भी ऐसा करना चाहिए. अगर कोई अन्य देश ऐसा कर सकता है तो पाकिस्तान क्यों नहीं कर सकता."

"हमें तालिबान के साथ अपने रिश्तों को दोबारा देखने की ज़रूरत है और वो हो जाए तो हमें देखना चाहिए कि हम कैसे अफ़ग़ानिस्तान के साथ मिलकर टीटीपी जैसे संगठनों से निपट सकते हैं. सिर्फ़ बातों से काम नहीं चलेगा, आप अमेरिका में बैठ कर बयान दें ये ठीक नहीं है."

"हमें तालिबान सरकार के सामने झुकना नहीं है लेकिन ये बात बंद दरवाजें के भीतर होनी चाहिए थी. तालिबान भी ख़ुद को वरिष्ठ मानता है उसे लगता है कि उसने अमेरिका को हराकर हूकूमत पाई है तो वह पाकिस्तान के लिए भी परेशानियां पैदा कर सकते हैं, तो मुझे लगता है कि बात यहाँ तक नहीं आई चाहिए थी."

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