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Delhi Ordinance के बदले विधेयक को केंद्र की मंजूरी, दिल्ली में नौकरशाही पर कंट्रोल को लेकर बनेगा कानून

GNCTD Ordinance अब संसद में विधेयक के रूप में पेश किया जाएगा। दिल्ली में नौकरशाहों पर कंट्रोल के संबं में ये विधेयक काफी अहम है, क्योंकि AAP सरकार को सुप्रीम कोर्ट से मिले अधिकारों को सरकार ने अध्यादेश के माध्यम से वापस ले लिया है।

संसद के मॉनसून सेशन में चार दिनों तक लगतार हुए हंगामे के बीच केंद्र सरकार अध्यादेश को बिल से रिप्लेस कर कानून बनाने की ताक में है। केंद्र सरकार ने कैबिनेट मीटिंग में मंगलवार को अधिकारियों पर नियंत्रण से जुड़े दिल्ली अध्यादेश की जगह लेने वाले विधेयक को मंजूरी दे दी।

Delhi Ordinance

ये भी बेहद दिलचस्प है कि इस आप सरकार ने अध्यादेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। Delhi Ordinance पर एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार, सूत्रों ने बताया कि केंद्रीय कैबिनेट ने मंगलवार को जून के अध्यादेश को बदलने के लिए विधेयक को मंजूरी दे दी।

अध्यादेश के माध्यम से केंद्र ने अधिकारियों की पोस्टिंग पर दिल्ली सरकार का नियंत्रण छीन लिया। अब सूत्रों ने कहा है कि GNCTD अध्यादेश के बदले जल्द ही विधेयक संसद में पेश और पारित कराया जाएगा।

यह अध्यादेश दिल्ली में भाजपा और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल नीत AAP सरकार के बीच टकराव का सबसे ज्वलंत मुद्दा बना हुआ है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने भी AAP सरकार के रूख का समर्थन किया है।

बता दें कि सरकार अध्यादेश का सहारा उस समय लेती है जब संसद सत्र नहीं चल रहा होता है। नियमों के अनुसार, अध्यादेश को संसद या राज्यों के मामले में विधानसभाओं से छह सप्ताह के भीतर पारित कराया जाना अनिवार्य है।

फिलहाल संसद में मानसून सत्र चल रहा है, ऐसे में अध्यादेश के बदले विधेयक पेश कर अधिकारों को कानून की शक्ल देने की तैयारियां हो रही हैं। हालांकि, अभी यह स्पष्ट नहीं है कि सरकार विधेयक को किस दिन पेश करने की योजना बना रही है।

अध्यादेश में दिल्ली, अंडमान और निकोबार, लक्षद्वीप, दमन और दीव और दादरा और नगर हवेली (सिविल) सेवा (DANICS) कैडर के ग्रुप ए अधिकारियों के स्थानांतरण के लिए एक राष्ट्रीय राजधानी सिविल सेवा प्राधिकरण स्थापित करने का प्रावधान है।

यह निकाय को उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू करने का अधिकार भी देगा। आम आदमी पार्टी का दावा है कि अध्यादेश ने उच्चतम न्यायालय की अवहेलना की है जिसने राज्य सरकार के पक्ष में फैसला सुनाया था।

बता दें कि विगत 11 मई को सत्ता संघर्ष मामले का निपटारा करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि दिल्ली सरकार का सेवाओं पर नियंत्रण होना चाहिए और उपराज्यपाल उसके फैसले से बंधे हैं।

देश की सबसे बड़ी अदालत के न्यायाधीश केंद्र सरकार की इन दलीलों से असहमत थे कि दिल्ली सरकार के पास सेवाओं पर कोई शक्ति नहीं है और कहा कि केवल सार्वजनिक व्यवस्था, पुलिस और भूमि को उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर रखा गया है।

गौरतलब है कि 11 मई के इस आदेश से पहले, दिल्ली सरकार के सभी अधिकारियों का स्थानांतरण और पोस्टिंग उपराज्यपाल के कार्यकारी नियंत्रण में था। सुप्रीम कोर्ट अध्यादेश के खिलाफ आप सरकार की याचिका पर सुनवाई कर रहा है।

पिछले हफ्ते सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ इस बात की जांच करेगी कि क्या संसद सेवाओं पर राज्य का नियंत्रण हटाने के लिए कानून बना सकती है। हालाँकि, उसने अध्यादेश पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है।

दरअसल, दिल्ली में ब्यूरोक्रेट के तबादले और नियुक्ति को लेकर उपराज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच तनाव की खबरें अक्सर आती हैं। इसी बीच सुप्रीम कोर्ट ने गत जून में एक अहम फैसला सुनाया और कहा कि अधिकारियों को नियुक्त या ट्रांसफर करने का अधिकार AAP सरकार का होगा।

महज 10 दिनों के भीतर केंद्र सरकार के कानून मंत्रालय ने GNCTD Ordinance के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट का फैसला बेअसर कर दिया। इस अध्यादेश के मुताबिक कमेटी अधिकारियों की ट्रांसफर पोस्टिंग के बारे में फैसला करेगी। विवाद की स्थिति में अंतिम फैसला उपराज्यपाल का होगा।

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