दिल्ली हाईकोर्ट का आदेश- फूड बिजनेस कंपनियां साफ-साफ करें वेज और नॉनवेज का खुलासा
नई दिल्ली, 16 दिसंबर: बहुत सी खाने वाली चीजों के वेज और नॉनवेज होने पर बहस होती रहती है। इससे संबंधित एक मामले में दिल्ली हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। जिस पर कोर्ट ने कहा कि ये सभी को जानने का हक है कि वो जो खा रहे वो वेज है या नॉनवेज। ऐसे में सभी फूड बिजनेस ऑपरेटर अनिवार्य रूप से इसका खुलासा करें कि उनके खाने में कौन-कौन से पदार्थ पड़े हैं। साथ ही वो वेज में आते हैं या नॉनवेज में। कोर्ट के मुताबिक बहुत से खाद्य पदार्थ जिसमें जानवरों से प्राप्त सामग्री का इस्तेमाल होता है, उनमें भी हरी बिंदी (वेज मार्क) लगा दिया जाता है। ऐसे में उनके कोड का खुलासा नामों से होना चाहिए।

जस्टिस विपिन सांघी और जस्टिस जसमीत सिंह की खंडपीठ ने कहा कि ऑपरेटरों को खाद्य सुरक्षा और मानक (पैकेजिंग और लेबलिंग) विनियम, 2011 के विनियम 2.2.2(4) का कड़ाई से पालन करना चाहिए। इस आधार पर अगर उनके द्वारा निर्मित खाने की वस्तु में जानवरों से प्राप्त सामग्री का मामूली प्रतिशत भी हो, तो उसे नॉनवेज की कैटेगरी में रखा जाए। किसी इंसान को धोखे में रखकर उसकी थाली में कुछ भी नहीं परोसा जा सकता। उसे जानने का हक है कि वो क्या खा रहा है। हालांकि कोर्ट ने साफ किया कि दूध और उससे जुड़े उत्पादों को नॉनवेज की कैटेगरी में ना रखा जाए।
एक गंभीर मामले का उदाहरण देते हुए कोर्ट ने कहा कि इंस्टेंट नूडल्स या आलू के चिप्स में एक घटक डिसोडियम इनोसिनेट का इस्तेमाल होता है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि ये मांस, मछली या फिर सुअर की चर्बी से प्राप्त होता है। इसके बावजूद भी फूड बनाने वाली कंपनियां उन्हें वेज बताकर बेचती हैं, जो गलत है। ऐसे में उत्पाद में किस प्रकार के खाद्य वनस्पति तेल, खाद्य वनस्पति वसा, पशु वसा या तेल, मछली, मुर्गी मांस या पनीर आदि का उपयोग किया गया, ये बताना अनिवार्य है। इसके अलावा FSSAI 30 जनवरी को अगली सुनवाई से पहले मामले में अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करेगा।












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