पूरे परिवार को भूकंप में खो चुके हैं 106 साल के मुख्तार, बचपन में देखा था स्पेनिश फ्लू, अब कोरोना को दी मात

नई दिल्ली। पुरानी दिल्ली में रहने वाले मुख्तार अहमद अचानक चर्चा में आ गए हैं। 106 साल के मुख्तार अहमद को कोरोना हो गया था और करीब दो महीने पहले वो इससे ठीक हो गए। बुधवार को मीडिया में उनकी चर्चा शुरू हुई कि कैसे इतने ज्यादा उम्र के शख्स ने कोरोना को मात दे दी। इसके बाद तो सीएम अरविंद केजरीवाल ने भी उनको लेकर ट्वीट किया। 106 साल के मुख्तार की जिंदगी काफी दिलचस्प है। 106 साल में उन्होंने कई बड़े हादसे अपनी जिंदगी में देखे हैं।

106 साल की उम्र में कोरोना को मात देकर चर्चा में

106 साल की उम्र में कोरोना को मात देकर चर्चा में

मुख्तार अहमद को अप्रैल में कोरोना हो गया था। जिसके बाद 14 अप्रैल से उनका इलाज शुरू हुआ। 1 मई को उनका कोरोना टेस्ट निगेटिव आने के बाद उनको छुट्टी दे दी गई। माना जा रहा है कि 106 साल की उम्र में कोरोना होने के बाद ठीक हो जाने वाले मुख्तार देश के पहले व्यक्ति हैं। मुख्तार के लिए कोरोना पहली बीमारी नहीं है। वो महज पांच साल के थे जब 1918 में स्पेनिश फ्लू फैला। इस प्लू से बहुत सी जानें गईं थीं। हालांकि कोरोना वायरस को लेकर मुख्तार कहते हैं कि उन्होंने अपनी जिंदगी में इस तरह की महामारी नहीं देखी।

गांधी जी भी देखे, अग्रेजी राज को भी देखा

गांधी जी भी देखे, अग्रेजी राज को भी देखा

मुख्तार अहमद बताते हैं कि उनका जन्म महाराष्ट्र के उस्मानाबाद में 1913 में हुआ था। कुछ दिन बाद वो मुंबई आ गए और वहीं काम करने लगे। वो फिल्म सेट तैयार करते थे। कई फिल्मों के सेट उन्होंने तैयार किए। मुख्तार अहमद कहते हैं कि उन्होंने अंग्रेजी राज खूब देखा। गांधी जी की सभाएं भी देखीं, उनके भाषण भी सुने। फिर आजादी भी देखी। इस दौरान उनकी जिंदगी ठीक ही चल रही थी लेकिन 1993 में सब बदल गया।

भूकंप में खो दिया परिवार

भूकंप में खो दिया परिवार

1993 में मुक्तार की जिंदगी में बड़ा हादसा हुआ। 1993 में लातूर में आए भूकंप में मुख्तार का पूरा परिवार मर गया। जिसमें उनकी पत्नी, बेटे, पोते-पोती सभी थे। इसके बाद वो मुंबई छोड़ दिल्ली आ गए। दिल्ली में वो कभी राज मिस्त्री तो कभी मजदूर के तौर पर काम करते रहे। बढ़ती उम्र के साथ उनको काम मिलना मुश्किल होने लगा तो वो इधर उधर सड़कों पर भटकते रहते। इसी दौरान उनको पुरानी दिल्ली के अफीक का परिवार मिला। अफीक को जब मुख्तार की जिंदगी के बारे में पता चला तो उन्होंने उनको अपने साथ रख लिया और परिवार का हिस्सा बना लिया। बीते करीब दो दशकों से मुख्तार अफीक के परिवार का ही हिस्सा हैं।

'हम उन्हें गलियों में मरने को कैसे छोड़ते'

'हम उन्हें गलियों में मरने को कैसे छोड़ते'

अफीक बताते हैं कि वो अचनाक उनको एक फूड स्टॉल पर मिल गए थे। उनसे जब उन्होंने बात की तो पता चला कि किस तरह से उनका परिवार भूकंप से खत्म हो गया। बढ़ती उम्र की वजह से वो मेहनत मजदूरी अब कर नहीं सकते थे तो हम उन्हें घर ले आए। आखिर गलियों में मरने को कैसे छोड़ देते। अफीक के परिवार में तीन लोगों को अप्रैल में कोरोना हुआ था, जिसमें मुख्तार भी थे। हालांकि तीनों लोग रिकवर हो गए।

मैं अच्छे इलाज की वजह से बच गया: मुख्तार

मैं अच्छे इलाज की वजह से बच गया: मुख्तार

मुख्तार उम्र के चलते थोड़ा ऊंचा सुनते हैं और ठीक से बोल भी नहीं पाते हैं। कोरोना वायरस से ठीक होने को लेकर वो कहते हैं कि इस बीमारी की वजह से मैं इतना कमजोर हो गया था कि घुटनों पर चलने लग गया था। मैंने उम्मीद नहीं की थी कि मैं बचूंगा लेकिन अच्छा इलाज मिला, जिससे मैं बच गया।

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