कर्नाटक में तख्तापलट या दिखावा? दिल्ली में सिद्धारमैया-शिवकुमार, आलाकमान के टेबल पर रखे उन बड़े प्लान का सच

कर्नाटक की सियासत में इस समय जबरदस्त हलचल मची हुई है। देश के दक्षिणी राज्य कर्नाटक में सत्ता संभाल रही कांग्रेस सरकार में अंदरूनी खींचतान अब खुलकर सामने आ गई है। पार्टी आलाकमान ने राज्य के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार को अचानक दिल्ली तलब किया है।

दोनों दिग्गज नेता सोमवार (25 मई) शाम को ही देश की राजधानी पहुंच चुके हैं। मंगलवार को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के आवास पर एक बेहद अहम और सीक्रेट बैठक होने जा रही है, जिसमें राहुल गांधी भी विशेष रूप से मौजूद रहेंगे। इस बैठक का एकमात्र एजेंडा है- कर्नाटक कांग्रेस का 'पॉलिटिकल रीसेट'।

Siddaramaiah and DK Shivakumar

पार्टी सूत्रों की मानें तो साल 2028 में होने वाले अगले विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस आलाकमान अभी से अपनी रणनीति को पूरी तरह बदलना चाहता है। सरकार के ढाई साल पूरे होने के बाद अब संगठन और सत्ता के बीच तालमेल बिठाने की कवायद तेज हो गई है। दरअसल जब 2023 में कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार बनी थी, तभी से मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर दोनों गुटों में शह-मात का खेल चल रहा है। अब देखना यह है कि दिल्ली के इस दरबार से क्या फैसला निकलता है।

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🔷पहला रास्ता: मुख्यमंत्री वही रहेंगे, लेकिन मंत्रियों की होगी छुट्टी

दिल्ली में चल रही चर्चाओं के मुताबिक, आलाकमान के सामने जो पहला और सबसे सुरक्षित विकल्प है, वह है- बिना मुख्यमंत्री बदले कैबिनेट में बड़ा फेरबदल करना।

इस फॉर्मूले के तहत सिद्धारमैया अपने पद पर बने रहेंगे, लेकिन उनके मंत्रिमंडल से उन मंत्रियों की छुट्टी की जा सकती है जिनका प्रदर्शन पिछले ढाई सालों में बेहद खराब रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य सरकार की छवि को सुधारना और जनता के बीच 'गुड गवर्नेंस' का संदेश देना है।

इस फेरबदल के जरिए कांग्रेस राज्य में सोशल इंजीनियरिंग यानी जातीय समीकरणों को भी साधने की कोशिश करेगी। इसके तहत 'अहिंदा' (AHINDA) यानी अल्पसंख्यकों, पिछड़े वर्गों और दलितों को कैबिनेट में और ज्यादा मजबूत प्रतिनिधित्व देने की तैयारी है।

इस पूरे रीसेट में उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार की पसंद-नापसंद का भी पूरा ख्याल रखा जाएगा ताकि सरकार के भीतर असंतोष को रोका जा सके। यह एक तरह का आपसी समझौता होगा जिससे सरकार में नया जोश भरा जा सके।

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🔷दूसरा रास्ता: डीके शिवकुमार को मिलेगी कमान, सिद्धारमैया जाएंगे दिल्ली

दूसरा विकल्प राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील और धमाकेदार है। पार्टी के भीतर एक बड़ा धड़ा लगातार यह मांग कर रहा है कि अब वक्त आ गया है कि कर्नाटक की कमान डीके शिवकुमार को सौंप दी जाए।

जब 2023 में सरकार बनी थी, तब शिवकुमार के समर्थकों का दावा था कि आलाकमान ने ढाई-ढाई साल के पावर-शेयरिंग फॉर्मूले का वादा किया था। अब जब सरकार का आधा कार्यकाल बीत चुका है, तो शिवकुमार के वफादार विधायक और नेता सार्वजनिक रूप से उन्हें मुख्यमंत्री बनाने की मांग उठा रहे हैं।

इस दूसरे परिदृश्य के तहत एक सुचारू लीडरशिप ट्रांजिशन (नेतृत्व परिवर्तन) का प्लान है। इसके तहत मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को सम्मानपूर्वक केंद्र की राजनीति में लाया जा सकता है और उन्हें राज्यसभा भेजा जा सकता है।

इसके बाद डीके शिवकुमार राज्य की कमान संभालेंगे और उनके आते ही पूरे मंत्रिमंडल का दोबारा पुनर्गठन किया जाएगा ताकि सिद्धारमैया और शिवकुमार दोनों ही गुटों के विधायकों को संतुष्ट किया जा सके। शिवकुमार इस मुद्दे पर हमेशा यही कहते आए हैं कि "समय ही हर सवाल का जवाब देगा।"

🔷तीसरा रास्ता: मल्लिकार्जुन खड़गे की 'वाइल्ड कार्ड' एंट्री

अगर सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के गुटों के बीच गतिरोध बहुत ज्यादा बढ़ जाता है और दोनों ही नेता किसी भी समझौते पर राजी नहीं होते, तो आलाकमान के पास तीसरा और सबसे चौंकाने वाला 'वाइल्ड कार्ड' विकल्प भी मौजूद है। यह विकल्प हैं खुद कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे। खड़गे कर्नाटक के एक बेहद सीनियर और कद्दावर दलित नेता हैं और लंबे समय से उनके मन में अपने गृह राज्य का मुख्यमंत्री बनने की इच्छा रही है।

अगर दोनों गुटों में टकराव बढ़ता है, तो खड़गे को एक सर्वसम्मति वाले चेहरे (Consensus Candidate) के रूप में आगे किया जा सकता है। हालांकि, इस कदम की संभावना थोड़ी कम है क्योंकि अगर खड़गे बेंगलुरु जाते हैं, तो इससे दिल्ली में कांग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व का पूरा ढांचा हिल जाएगा। राहुल गांधी और पार्टी के अन्य रणनीतिकारों को राष्ट्रीय स्तर पर संगठन संभालने के लिए एक नए चेहरे की तलाश करनी होगी, जो इस समय पार्टी के लिए एक नई चुनौती बन सकता है।

चुनाव और नियुक्तियों का डबल प्रेशर

कर्नाटक कांग्रेस में चल रही यह सियासी उठापटक सिर्फ मुख्यमंत्री की कुर्सी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे आने वाले दिनों में होने वाले कुछ बेहद महत्वपूर्ण चुनाव भी हैं। राज्य में तीन राज्यसभा सीटों के लिए चुनाव होने वाले हैं, जिनके लिए नामांकन दाखिल करने की आखिरी तारीख 8 जून तय की गई है। इसके साथ ही विधान परिषद (Legislative Council) की 9 सीटों पर भी चुनाव होने हैं।

इन दोनों ही बड़े चुनावों के लिए उम्मीदवारों का चयन करना कांग्रेस के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। दोनों ही गुट अपने-अपने वफादार नेताओं को टिकट दिलाने के लिए पूरा जोर लगा रहे हैं। यही वजह है कि दिल्ली की यह बैठक केवल एक रूटीन रिव्यू नहीं है, बल्कि कांग्रेस आलाकमान के लिए एक ऐसी नाजुक डोर पर चलने जैसा है जहां उन्हें जातिगत समीकरणों, गुटीय हितों और 2028 के चुनावी दंगल की तैयारियों के बीच एक परफेक्ट बैलेंस बनाना होगा।

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