मुख्यमंत्री की कुर्सी के विवाद में कांग्रेस गंवा चुकी है 5 राज्य, कैसा रहा है CM बदलने का पार्टी का इतिहास
जयपुर, 26 सितंबर। किसी भी राज्य में सरकार के पांच साल के कार्यकाल के दौरान बीच में मुख्यमंत्री को बदलना कांग्रेस पार्टी के लिए हमेशा से ही बड़ी चुनौती रहा है। जिस तरह से स्थानीय नेताओं की अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा रहती है उसके चलते मुख्यमंत्री को बदलना पार्टी के लिए मुश्किल चुनौती हो जाता है। राजस्थान में कांग्रेस पार्टी अजीब मझधार में घिर गई है, जिस तरह से अशोक गहलोत का समर्थन कर रहे 83 विधायकों ने विधायक दल की बैठक में हिस्सा लेने से इनकार किया और अशोक धारीवाल के घर पर इकट्ठा हुए उसके बाद कांग्रेस के पर्यवेक्षक को समझ ही नहीं आ रहा था कि आखिर वो करें तो क्या करें।

पुड्डुचेरी में हाथ से गई सत्ता
इन बागी विधायकों ने पार्टी की समस्या और उस वक्त बढ़ा दिया जब इन विधायकों ने सीपी जोशी को अपना इस्तीफा सौंप दिया। इन विधायकों ने यहां तक धमकी दी कि अगर सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाया जाता है तो वह अपना इस्तीफा दे देंगे। कुछ इसी तरह की परिस्थिति 2008 में भी पार्टी के सामने खड़ी हुई थी। उस वक्त पुड्डुचेरी के मुख्यमंत्री एन रंगास्वामी को जबरन पद से हटा दिया गया था और उनकी जगह वी वैथिलंगम को कांग्रेस आला कमान ने नियुक्त किया था। वर्ष 2011 में रंगास्वामी ने कांग्रेस पार्टी को छोड़ दिया था और एनआर कांग्रेस का गठन किया और अब वह यहां पर भाजपा के समर्थन के साथ प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं।

आंध्र प्रदेश में गंवाई सत्ता
पिछले कुछ सालों में कांग्रेस ने अपने कई युवा और लोकप्रिय नेताओं को खोया है। ये सभी नेता मुख्यमंत्री पद के चलते पार्टी से बाहर जा चुके हैं। वर्ष 2009 में वाईएस राजशेखर रेड्डी जब हेलीकॉप्टर हादसे में निधन हुआ तो कांग्रेस ने उनके बेटे जगनमोहन की जगह के रोसैया को मुख्यमंत्री बना दिया। जब जगन को प्रदेश में यात्रा निकालने की अनुमति नहीं मिली तो उन्होंने कांग्रेस से अलग होकर वाईएसआर कांग्रेस का गठन किया और 2019 में प्रदेश के मुख्यमंत्री बने।

मध्य प्रदेश में खोई कुर्सी
कुछ इसी तरह की घटना मध्य प्रदेश में भी हुई ,जहां ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस से अलग होने का फैसला लिया। 15 साल के बाद कांग्रेस पार्टी की मध्य प्रदेश में वापसी हुई थी, लेकिन कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच मुख्यमंत्री पद को लेकर हुई कलह के चलते सिंधिया ने कांग्रेस से खुद को अलग कर लिया। दो साल के बाद प्रदेश की सरकार गिर गई और भाजपा ने फिर से सत्ता में वापसी की। बाद में सिंधिया को केंद्रीय मंत्री बनाया गया।

पंजाब में सीएम की कुर्सी का विवाद
पंजाब में भी कांग्रेस के सामने बड़ा संकट खड़ा हुआ और अंत में पार्टी के हाथ से सत्ता ही चली गई। यहां पर अमरिंदर सिंह किनारे लगाने की कोशिश की गई, इसके बाद इसके बाद नवजोत सिंह सिद्धू सीएम पद की रेस में थे, लेकिन पार्टी ने चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री पद दिया। लेकिन 6 महीने के बाद हुए चुनाव में सिद्धू और चन्नी दोनों चुनाव हार गाए और प्रदेश में आम आदमी पार्टी की जबरदस्त जीत हुई। अमरिंद सिंह ने कांग्रेस छोड़ दिया और भाजपा में शामिल हो गए। चुनाव में कांग्रेस का ऐसा हाल हुआ कि वह सिर्फ 18 सीटों पर सिमट गई।

भाजपा से सीख की जरूरत
एक तरफ जहां कांग्रेस के लिए मुख्यमंत्री को बदलना इतना मुश्किलभरा हो रहा था तो भारतीय जनता पार्टी इस काम को बेहद आसानी से करने में सफल हुई है। उत्तराखंड में दो बार पार्टी ने मुख्यमंत्रियों को ब दला, गुजरात में भी ना सिर्फ मुख्यमंत्री बल्कि पूरी कैबिनेट को ही बदला गया लेकिन किसी भी तरह की कोई बगावत देखने को नहीं मिली। ऐसे में कांग्रेस के लिए भारतीय जनता पार्टी एक बेहतरीन सबक जरूर है, जहां से उसे सीखना चाहिए।

असम में भी कुर्सी की जंग में गई सत्ता
असम में भी मुख्यमंत्री पद की कुर्सी को लेकर कांग्रेस को बड़ी विफलता हाथ लगी थी। यहां तरुण गोगोई और हिमंत बिस्व सरमा के बीच तकरार को पार्टी संभाल नहीं पाई और प्रदेश की सत्ता हाथ से चली गई। पार्टी ने हिमंत बिस्व सरमा को दरकिनार किया, जिसके परिणामस्वरूप हिमंता ने कांग्रेस छोड़ दी और भाजपा में शामिल हो गए। उन्होंने इस वक्त कहा था कि राहुल गांधी अपने कुत्तों पर ज्यादा ध्यान देते हैं। उसके बाद हिमंता भाजपा में शामिल हो गए और एक ताकतवर नेता के तौर पर उभरे, फिलहाल वह प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं।












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