नेता विपक्ष के लिए कांग्रेस सुप्रीम कोर्ट में जाने की तैयारी में!

लोकसभा से अलग राज्यसभा का भी यही हाल है और यहां पर अभी तक विपक्ष का नेता चुना नहीं जा सका है। खास बात है कि जो कांग्रेस आज 44 सीटें हासिल कर विपक्ष के नेता के तौर पर अपनी पार्टी को मुख्यत: देने की बात कर रही है, कभी उसी कांग्रेस ने 30 सीटें हासिल करने वाली पार्टी को यह पद देने से साफ इंकार कर दिया था।
लोकसभा स्पीकर ने किया इंकार
इन सबके बीच ही खबर आ रही है कि बीजेपी की अगुवाई वाली एनडीए सरकार और कांग्रेस के बीच राज्यसभा में विपक्ष के नेता के लिए जारी जद्दोजहद को खत्म करने के लिए कांग्रेस सुप्रीम कोर्ट तक जा सकती है।
सोमवार को सोनिया गांधी ने मांग की कि कांग्रेस को ही नेता विपक्ष का पद मिलना चाहिए।
इकोनॉमिक टाइम्स की खबर के मुताबिक लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन ने साफ कर दिया है कि वह किसी भी सूरत में कांग्रेस को प्रमुख विपक्षी दल के तौर पर मान्यता नहीं देंगी।
वहीं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व रेलवे मंत्री मल्लिकार्जुन खड़गे के मुताबिक यह स्पीकर के अधिकार क्षेत्र में आता है कि वह किस दल को विपक्षी दल की मान्यता दें या फिर नहीं। उन्हें ही फैसला लेना है।
सुप्रीम कोर्ट जाएगी कांग्रेस
इकोनॉमिक टाइम्स की इसी रिपोर्ट में सूत्रों की ओर से जानकारी दी गई है कि कांग्रेस अब इस पूरे मुद्दे का हल निकालने के लिए सुप्रीम कोर्ट की शरण में जाने के बारे में सोच रही है।
कांग्रेस इस पसोपेश में है कि वह उसे संसद के मामलों में सुप्रीम कोर्ट का सहारा लेना चाहिए या नहीं।
इससे पहले इस पूरे मुद्दे पर टिप्पणी करते हुए कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता की ओर से बताया गया था कि यहां पर अन्याय का सवाल ही नहीं उठता है और कोर्ट की ओर से दिया गया कोई भी फैसला हमें पूरी तरह से मान्य होगा।
इस वरिष्ठ कांग्रेसी नेता ने कहा कि पार्टी इस सच से वाकिफ है कि बीजेपी के नेताओं की ओर से इस पूरी स्थिति पर कंफ्यूजन पैदा करने की कोशिश की जा रही है लेकिन अगर संसद के साथ कोई भी अन्याय हुआ तो फिर हम सुप्रीम कोर्ट की शरण में जाने को बाध्य होंगे।
कानून के जानकारों के मुताबिक कांग्रेस का पक्ष काफी मजबूत है लेकिन वहीं उन्हें इस बात पर भी शक है कि क्या सुप्रीम कोर्ट संसद के आंतरिक मसलों में हस्तक्षेप करने को तैयार होगा?
कैबिनेट मंत्री की तरह नेता विपक्ष का ओहदा
आपको बता दें कि नेता विपक्ष का पद कैबिनेट में शामिल किसी मंत्री की ही तरह होता है। नेता विपक्ष सरकार की ओर से होने वाली कई महत्वपूर्ण नियुक्तियों जैसे चीफ विजिलेंस कमिश्न और लोकपाल बिल, के दौरान एक अहम रोल अदा करता है।
पिछले वर्ष जब सुषमा स्वराज विपक्ष की नेता थीं तो उन्होंने यह कहते हुए लोकपाल पैनल के लिए वकील पीपी राव की नियुक्ति का विरोध किया था कि वह कांग्रेस से सहानुभूति रखते हैं।
क्या है कांग्रेस का इतिहास
कांग्रेस की ओर से नेता विपक्ष के पद के लिए मांग को मजबूत किया जा रहा हो लेकिन कांग्रेस का इतिहास ही पार्टी के खिलाफ जाता है। वर्ष 1984 में जब राजीव गांधी की अगुवाई में कांग्रेस पार्टी को 415 सीटें हासिल हुई थीं, उस समय पार्टी की ओर से ही दूसरे नंबर पर आने वाली तेलगुदेशम पार्टी को लोकसभा में नेता विपक्ष के तौर पर मानने से इंकार कर दिया गया था।
तेलगुदेशम पार्टी को उस समय 30 सीटें हासिल हुई थीं और यह दूसरी सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी थी। इसके बावजूद कांग्रेस ने टीडीपी के पी उपेंद्र को नेता विपक्ष के तौर पर स्वीकारने से मना कर दिया था।
संसदीय मामलों के मंत्री वैंकेया नायडू के मुताबिक इंदिरा गांधी और राजीव गांधी जब सत्ता में थे तो उस समय भी औपचारिक तौर पर कोई भी नेता विपक्ष नहीं थी। नायडू के मुताबिक विपक्ष के नेता के बिना भी संसद का काम सही तरीके से चल सकता है।












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