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मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव, मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने खुद को सुनवाई से अलग किया

देश के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर नए कानून को चुनौती देने वाले मामले की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया है। यह मामला उस विवादास्पद कानून से संबंधित है। जिसने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय मंत्री को शामिल किया है। इस कानून ने नियुक्ति प्रक्रिया से मुख्य न्यायाधीश को बाहर कर दिया है। जिससे विपक्ष और नागरिक संगठनों के बीच तीखी बहस छिड़ गई है।

विवाद का केंद्र, कानून में संशोधन

संसद के शीतकालीन सत्र में भारी विरोध के बीच पारित इस कानून ने चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और स्वायत्तता पर सवाल खड़े किए हैं। इससे पहले सर्वोच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा था कि चुनाव आयोग की नियुक्तियां प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और मुख्य न्यायाधीश की समिति द्वारा की जाएगी। लेकिन नए कानून में मुख्य न्यायाधीश को इस प्रक्रिया से हटाकर उनकी जगह प्रधानमंत्री द्वारा चुने गए एक मंत्री को शामिल किया गया है।

supreme court

मुख्य न्यायाधीश ने सुनवाई से अलग होने का कोई औपचारिक कारण नहीं बताया है। लेकिन यह मामला अब 6 जनवरी को एक अलग पीठ द्वारा सुना जाएगा।

विपक्ष और नागरिक संगठनों की आपत्ति

विपक्षी दल और नागरिक संगठनों ने इस कानून की आलोचना की है। कांग्रेस नेता जया ठाकुर और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स जैसे संगठनों ने इसे अदालत में चुनौती दी है। उनका तर्क है कि चुनाव आयोग की स्वायत्तता पर यह कानून खतरा है और इससे नियुक्तियों में राजनीतिक हस्तक्षेप की संभावना बढ़ जाती है। आलोचकों का मानना है कि मुख्य न्यायाधीश को नियुक्ति प्रक्रिया से बाहर रखना। हितों के टकराव और पक्षपात की आशंका को जन्म देता है।

सरकार का बचाव

सरकार ने कानून का बचाव करते हुए कहा है कि नियुक्ति प्रक्रिया में शामिल सभी व्यक्तियों से निष्पक्षता और ईमानदारी की अपेक्षा की जाती है। विपक्ष और संगठनों द्वारा लगाए गए आरोप राजनीति से प्रेरित हैं और इनकी कोई ठोस कानूनी आधार नहीं है। सरकार का मानना है कि यह संशोधन लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को मजबूत करने के उद्देश्य से किया गया है।

चुनाव आयोग में रिक्तियों की चुनौती

चुनाव आयोग में प्रमुख पदों पर रिक्तियां बनी हुई हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार के अलावा आयोग में अन्य पद खाली थे। हाल ही में सरकार ने ज्ञानेश कुमार और सुखबीर सिंह संधू की नियुक्ति की। लेकिन इन नियुक्तियों को भी राजनीतिक और कानूनी विवादों का सामना करना पड़ा।

न्यायपालिका और लोकतंत्र पर प्रभाव

इस मामले का फैसला चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और भारत के लोकतांत्रिक ढांचे पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकता है। न्यायिक निगरानी को हटाने से चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता को बनाए रखने पर सवाल उठते हैं। राजनीतिक और न्यायिक भूमिकाओं के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया जा रहा है।

भारत में चुनावी प्रक्रिया की स्वतंत्रता को लेकर चल रही यह बहस लोकतांत्रिक मूल्यों को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है। आने वाले दिनों में 6 जनवरी की सुनवाई से जुड़े फैसले पर पूरे देश की निगाहें होंगी। क्योंकि इसका असर न केवल चुनाव आयोग की स्वायत्तता पर पड़ेगा। बल्कि यह भारत की चुनावी अखंडता और संवैधानिक संतुलन के लिए भी एक मिसाल बनेगा।

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