नागरिकता संशोधन विधेयक: क्या हैं राज्यसभा के समीकरण

अमित शाह
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नागरिकता संशोधन विधेयक को सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी ने लोकसभा में आसानी से पास करवा लिया. लोकसभा में बीजेपी के पास खुद अकेले दम पर बहुमत है. इस विधेयक पर वोटिंग के दौरान बीजेपी के 303 लोकसभा सदस्यों समेत कुल 311 सासंदों का समर्थन हासिल हुआ.

अब राज्यसभा में इस विधेयक को रखा जाना है. जहां से पास होने की स्थिति में ही यह क़ानून की शक्ल लेगा. बीजेपी ने 10 और 11 दिसंबर को अपनी पार्टी के राज्यसभा सांसदों के लिए व्हिप जारी किया है.

इसे देखते हुए यह उम्मीद की जा रही है कि दो दिनों के भीतर ही इस संशोधन विधेयक को राज्यसभा में रखा जाएगा. लेकिन सत्ताधारी पार्टी के लिए राज्यसभा की डगर इतनी भी आसान नहीं है.

राज्यसभा में सांसदों की मौजूदा संख्या 240 है. ऐसे में नागरिकता संशोधन विधेयक पर बहुमत पाने के लिए 121 सांसदों का समर्थन चाहिए.

सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के पास कुल 83 राज्यसभा सांसद हैं. मतलब यह कि इस विधेयक को क़ानून की शक्ल देने के लिए बीजेपी को राज्यसभा में अन्य 37 सासंदों का समर्थन जुटाना होगा.

राज्यसभा में विभिन्न राजनीतिक पार्टियों की स्थिति
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राज्यसभा में विभिन्न राजनीतिक पार्टियों की स्थिति

क्या है राज्यसभा का गणित?

राज्यसभा में कुल 245 सांसद होते हैं. राज्यसभा में वर्तमान सांसदों की संख्या 240 है. यानी यहां बहुमत का आंकड़ा 121 है.

अब अगर वोटिंग के दौरान अगर कुछ सांसद वॉकआउट कर जाते हैं तो बहुमत का आंकड़ा कम हो जाएगा.

कांग्रेस के मोतीलाल वोरा बीमार है. वे वोटिंग के दौरान राज्यसभा में अनुपस्थित रह सकते हैं.

संसद, राज्यसभा
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संसद, राज्यसभा

कौन करेगा बीजेपी का समर्थन?

बीजेपी के पास राज्यसभा में 83 सांसद हैं. महाराष्ट्र और केंद्र में उससे अलग हुई शिवसेना ने ढुलमुल रवैए और 'मोदी सरकार की हिंदु-मुसलमानों के बीच अदृश्य विभाजन की कोशिश' जैसे कई आरोप लगाने के बाद अंत में वोटिंग के दौरान अपना समर्थन दे दिया.

लिहाजा अब यह तय है कि राज्यसभा में भी उनके तीन सांसदों का समर्थन मिलेगा.

इसके अलावा एआईएडीएमके के 11 सांसद इस बिल पर सत्ताधारी पार्टी का समर्थन करेंगे, यह रुख़ उन्होंने पहले ही स्पष्ट कर दिया है.

साथ ही बीजेपी को बीजेडी के 7, जेडीयू के 6, अकाली दल के 3, नॉमिनेटेड 4 सांसदों और 11 अन्य का समर्थन भी मिल सकता है.

इन सब को मिलाकर बीजेपी के पास कुल 128 सांसदों का समर्थन मिल सकता है, जो इस विधेयक को पास करवाने के लिए पर्याप्त है.

यहां पूर्वोत्तर के दो सांसदों को शामिल नहीं किया गया है क्योंकि उन्होंने अपना रुख साफ़ नहीं किया है. इनके अनुपस्थित रहने की स्थिति में बहुमत का आंकड़ा बदल सकता है.

विपक्ष की नीति क्या होगी?

नंबर की बात करें तो राज्यसभा में पलड़ा बराबर की स्थिति में दिख रहा है जो वोटिंग के दौरान किसी भी तरफ झुक सकता है.

यह पूरी तरह से उस स्थिति पर निर्भर करता है कि क्या सभी पार्टियां अपनी विचारधारा और अब तक के रुख के अनुरूप वोटिंग में शामिल होती हैं या इस संशोधन विधेयक के पारित होने की राह आसान करने के लिए सदन से वाकआउट करती हैं.

अपने 46 राज्यसभा सांसदों के साथ विरोधियों की अगुवाई करेगी कांग्रेस पार्टी. वहीं तृणमूल कांग्रेस के 13 राज्यसभा सांसद, समाजवादी पार्टी के 9, वाम दल के 6, टीआरएस के 6, डीएमके के 5, आरजेडी के 4, आम आदमी पार्टी के 3, बीएसपी के 4 और अन्य 21 सांसद अब तक के अपने रुख के मुताबिक इसका विरोध करेंगे.

यानी कुल मिलाकर इस विधेयक पर राज्यसभा में 110 सांसद ख़िलाफ़ हैं.

नागरिकता संशोधन विधेयक के प्रस्तावित संशोधनों के ख़िलाफ़ राज्यसभा में विपक्ष दो सूत्रीय रणनीति पर काम करेगा.

लोकसभा में यह पास हो चुका है लेकिन इस मामले के जानकारों के मुताबिक अगर यह विधेयक राज्यसभा में पास भी हो गया तो विपक्ष इसकी समीक्षा प्रवर समिति (सेलेक्ट कमेटी) से करवाने के लिए दबाव डालेगा.

कांग्रेस, डीएमके और वाम दलों ने इसे लेकर अपने अपने मसौदे तैयार किए हैं.

ये पार्टी इस बात पर तर्क करेंगी कि चूंकि यह विधेयक भारत की नागरिकता क़ानूनों की नींव में भारी बदलाव करेगा लिहाजा इसे समीक्षा के लिए एक सेलेक्ट कमेटी को भेजना चाहिए.

संसद, राज्यसभा
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संसद, राज्यसभा

क्या होती है सेलेक्ट कमेटी?

संसद के अंदर अलग-अलग मंत्रालयों की स्थायी समिति होती है, जिसे स्टैंडिंग कमेटी कहते हैं. इससे अलग जब कुछ मुद्दों पर अलग से कमेटी बनाने की ज़रूरत होती है तो उसे सेलेक्ट कमेटी कहते हैं.

इसका गठन स्पीकर या सदन के चेयरपर्सन करते हैं. इस कमेटी में हर पार्टी के लोग शामिल होते हैं और कोई मंत्री इसका सदस्य नहीं होता है. काम पूरा होने के बाद इस कमेटी को भंग कर दिया जाता है.

नागरिकता संशोधन विधेयक का विरोध
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नागरिकता संशोधन विधेयक का विरोध

क्या है नागरिकता संशोधन विधेयक?

नागरिकता संशोधन विधेयक (Citizenship Amendment Bill) को संक्षेप में CAB भी कहा जाता है और यह बिल शुरू से ही विवाद में रहा है.

इस विधेयक में बांग्लादेश, अफ़गानिस्तान और पाकिस्तान के छह अल्पसंख्यक समुदायों (हिंदू, बौद्ध, जैन, पारसी, ईसाई और सिख) से ताल्लुक़ रखने वाले लोगों को भारतीय नागरिकता देने का प्रस्ताव है.

मौजूदा क़ानून के मुताबिक़ किसी भी व्यक्ति को भारतीय नागरिकता लेने के लिए कम से कम 11 साल भारत में रहना अनिवार्य है.

लेकिन इस विधेयक में पड़ोसी देशों के अल्पसंख्यकों के लिए यह समयावधि 11 से घटाकर छह साल कर दी गई है.

इसके लिए नागरिकता अधिनियम, 1955 में कुछ संशोधन किए जाएंगे ताकि लोगों को नागरिकता देने के लिए उनकी क़ानूनी मदद की जा सके.

मौजूदा क़ानून के तहत भारत में अवैध तरीक़े से दाख़िल होने वाले लोगों को नागरिकता नहीं मिल सकती है और उन्हें वापस उनके देश भेजने या हिरासत में रखने के प्रावधान है.

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