चीन की नई हेकड़ी, मंत्री-सांसदों से सीधे बोला-तिब्बत के मामलों में न पड़ें
नई दिल्ली, 31 दिसंबर: भारत स्थित चीनी दूतावास ने सांसदों और मंत्री के एक ग्रुप को सीधे खत लिखकर कहा है कि वे तिब्बत की आजादी का समर्थन करने से दूर रहें। चीन की इस हरकत को कूटनीति के पूरी तरह से खिलाफ माना जा रहा है। चीन ने यह हेकड़ी दिल्ली के एक होटल में ऑल पार्टी इंडियन पार्लियामेंट्री फोरम की आयोजित बैठक में भाग लेने के बाद दिखाई है। तिब्बत के मसले पर भारतीय सांसदों और मंत्री की यह बैठक पिछले ही हफ्ते हुई थी, जिसमें केंद्रीय राज्यमंत्री राजीव चंद्रशेखर ने भी हिस्सा लिया था। लेकिन, शी जिनपिंग की सरकार को यह इतना नागवार गुजरा है कि वह कूटनीति की मर्यादा भी भी भूल गई है।

चीन ने सीधे सांसदों और मंत्री को लिखा खत
तिब्बत की निर्वासित संसद की ओर से दिल्ली के एक होटल में आयोजित डिनर में भारत के मंत्री और कई दलों के सांसदों की मौजूदगी को चीन पचा नहीं पा रहा है। यह कार्यक्रम 22 दिसंबर को आयोजित हुआ था। इसमें उद्यमिता, कौशल विकास, इलेक्ट्रॉनिक्स और प्रौद्योगिकी राज्यमंत्री राजीव चंद्रशेखर के अलावा बीजेपी सांसद मेनका गांधी और केसी रामामूर्ति, कांग्रेस के जयराम रमेश और मनीष तिवारी और बीजेडी के सुजीत कुमार जैसे सांसद पहुंचे थे। इस बैठक में तिब्बत की निर्वासित संसद के स्पीकर खेनपो सोनम तेनफेल भी मौजूद थे। लेकिन, चीन ने गुरुवार को असामान्य रूप से इसपर आपत्ति जताते हुए सीधे सांसदों को चिट्ठी लिखकर उन्हें ऐसे मामलों से दूर रहने को कहा है।

चीनी दूतावास ने मंत्री-सांसदों से क्या कहा है ?
गुरुवार को नई दिल्ली स्थित चीनी दूतावास के पॉलिटिकल काउंसलर ने एक ऐसी असामान्य चिट्ठी लिखी है, जिसे दिल्ली में कूटनीति की मर्यादा के विरुद्ध माना जा रहा है। क्योंकि, विदेशी राजनयिकों ने हाल के समय में कभी भी इस तरह से भारतीय सांसदों को इस अंदाज में खत नहीं लिखा है। चाइनीज काउंसलर ने लिखा है, 'जैसा कि सबको पता है, तथाकथित 'तिब्बत की निर्वासित सरकार' एक बाहरी अलगाववादी राजनीतिक समूह है और चीन के संविधान और कानून का उल्लंघन करते हुए पूरी तरह से एक गैर-कानूनी संगठन है। इसे दुनिया की किसी भी देश से मान्यता नहीं मिली है। तिब्बत प्राचीन काल से ही चीन का अविभाज्य अंग रहा है, और तिब्बत से जुड़े मामले पूरी तरह से चीन के आंतरिक विषय हैं, जिसमें किसी भी विदेशी दखल की अनुमति नहीं है।' शी जिनपिंग की सरकार की ओर से भारतीय सांसदों को यहां तक लिखा गया है कि, 'चीन तिब्बत की आजादी चाहने वाले ताकतों की ओर से चीन-विरोधी किसी भी गतिविधियों का पूरी दृढ़ता के साथ विरोध करता है, और किसी भी देश के अधिकारियों द्वारा किसी भी हैसियत से उनके साथ किसी भी प्रकार के संपर्क का विरोध करता है।'

'इनकी इतनी हिम्मत कैसे हुई ?'
बीजेडी सांसद सुजीत कुमार ने चीनी दूतावास से आई इस चिट्ठी पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा है, 'सबसे बड़े लोकतंत्र के संसद सदस्य को चीनी दूतावास का पॉलिटिकल काउंसलर लिखने वाला कौन होता है? भारतीय सांसदों को चिट्ठी भेजने की आपकी हिम्मत कैसे हुई? अगर कुछ है तो आप आधिकारिक तौर पर अपना विरोध दर्ज करा सकते हैं। मैं समझता हूं कि विदेश मंत्रालय को कोई स्टैंड लेना चाहिए।' कुमार इस फोरम के संयोजक भी हैं। उन्होंने कहा है कि 'निजी तौर पर कहूं, तो मैं तिब्बत को चीन का हिस्सा नहीं मानता। वह अलग है, क्योंकि भारत सरकार की आधिकारिक नीति अलग है। लेकिन, तिब्बत पर यह संसदीय मंच तिब्बती सांस्कृतिक और धार्मिक मान्यताओं के समर्थन के लिए है, और भारत के लोगों और निर्वासित तिब्बती सरकार के बीच है। इसमें ज्यादा राजनीति नहीं देखनी चाहिए।'

सांसदों ने चीन को जवाब देने से किया इनकार
जिस फोरम को लेकर चीन ने इतना बवाल काटा है, वह 1971 से है और अटल बिहारी वाजपेयी, जॉर्ज फर्नांडीस और मोहम्मदली करीम चागला जैसी शख्सियतें भी रह चुकी हैं। उधर कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने मीडिया में माना है कि उन्हें भी ऐसी चिट्ठी मिली है, लेकिन उन्होंने कहा कि वह इसका जवाब नहीं देंगे। जबकि मनीष तिवारी का कहना है कि न तो उन्हें ऐसी चिट्ठी मिली है और ना ही वह इस तरह की हरकतों पर प्रतिक्रिया देकर अपना कद घटाएंगे।












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