पूर्व सेना प्रमुख बोले-बॉर्डर पर इस बार कोई भी दुस्साहस चीन के लिए खतरनाक साबित होगा
नई दिल्ली। भारत और चीन के बीच लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (एलएसी) पर तनाव को एक माह होने को हैं। कब यह विवाद सुलझेगा कोई नहीं जानता है। इस बीच इंडियन आर्मी के पूर्व चीफ जनरल (रिटायर्ड) बिक्रम सिंह ने कहा है कि हिमालय में चीन मिलिट्री के साथ जो 'दुस्साहस' कर रहा है वह उसके लिए खतरनाक साबित हो सकता है। जनरल बिक्रम ने अमेरिकी चैनल सीएनएन की वेबसाइट के लिए लिखे एक आर्टिकल में यह बात लिखी है। जनरल सिंह 31 मई 2013 से 31 जुलाई 2014 तक सेना प्रमुख के पद पर थे। जनरल सिंह के कार्यकाल में चीन की सेनाएं लद्दाख के दौलत बेग ओल्डी सेक्टर तक आ गई थीं। वह विवाद करीब 20 दिन बार जाकर सुलझ सका था।
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डोकलाम के बाद सबसे बड़ा विवाद
उन्होंने लिखा है, 'पिछले कुछ माह में भारतीय सेना और पीपुल्स लिब्रेशन आर्मी (पीएलए) के बीच एलएसी पर हिमालय की ऊंची चोटियों पर विवादित बॉर्डर पर कई टकराव हो चुके हैं। नॉर्थ सिक्किम में स्थिति को स्थानीय स्तर और आपसी प्रोटोकॉल के जरिए सुलझा लिया गया, पूर्वी लद्दाख में जारी विवाद बढ़ता ही जा रहा है। इसकी वजह से अब चीन की शंकाओं पर अटकलें बढ़ती जा रही हैं।' उन्होंने लिखा है कि एशिया की इन दो महाशक्तियों के बीच आखिरी बार डोकलाम में 2017 में सबसे बड़ विवाद हुआ था और 73 दिन तक चला था। इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बी अप्रैल 2018 में वुहान में और फिर अक्टूबर 2019 में मम्मलापुरम में मुलाकात हुई।

LAC स्पष्ट न होने से बड़ा संकट
जनरल सिंह के मुताबिक इस वार्ता के दौरान दोनों ही नेताओं ने सीमाई इलाकों की रणनीतिक अहमियत पर जोर दिया था। साथ ही दोनों इस बात पर रजामंद हुए थे कि वो अपनी-अपनी सेनाओं को संयम बरतने और आपसी भरोसे को बढ़ाने के लिए निर्देश देंगे। उनका कहना है कि रणनीतिक और ऑपरेशनल स्तर पर तो दोनों सेनाओं ने संयम रखा हुआ है। लेकिन एलएसी की वास्तविक स्थिति स्पष्ट न होने से अलग-अलग नजरिया बना हुआ है और यह टकराव होते रहते हैं। साधारण तौर पर इन टकराव को स्थानीय तौर पर सुलझा लिया जाता है मगर इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे सड़क और रक्षा निर्माण से जुड़े टकरावों को सुलझाने में काफी समय लग जाता है। उनका कहना है कि इस तरह के टकराव को सैन्य और कूटनीतिक स्तर के मिले-जुले प्रयासों से ही सुलझाया जा सकता है।

1975 से चीन ने नहीं चलाई एक भी गोली
जनरल सिंह ने लिखा है कि दोनों देशों के बीच सन् 1993 और 2013 में द्विपक्षीय समझौता साइन हुआ था। इसका मकसद दोनों देशों को सामयिक झगड़े से आगे जाकर बल का प्रयोग करने से रोकना था। भारत और चीन के बीच सन् 1975 के बाद से एक भी गोली नहीं चली और अब इसमें किसी भी बदलाव की संभावना न के बराबर है। जनरल सिंह के मुताबिक कोरोनोवायरस महामारी के दौरान चीन को घर में और बाहरी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में हिमालय में उसका कोई भी दुस्साहस उसे खतरे में डाल सकता है। उनकी मानें तो अगर अब चीन ने कोई भी कदम उठाया तो फिर साल 2050 तक उसका वैश्विक महाशक्ति बनने का सपना टूट सकता है। अमेरिका के साथ ट्रेड वॉर जारी है, बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव प्रोजेक्ट की गति भी धीमी हो गई है। साथ ही हांगकांग और ताइवान जैसे मसले और अब कोरोना वायरस महामारी ने भी चीन की समस्याओं को दोगुना कर दिया है।

जनरल सिंह के समय 20 दिन तक चला विवाद
जनरल सिंह 31 मई 2013 से 31 जुलाई 2014 तक सेना प्रमुख के पद पर थे। 15 अप्रैल 2013 में चीनी सेना भारतीय सीमा के 19 किलोमीटर के दायरे तक आ गई थीं। चीनी जवान लद्दाख के वेस्टर्न सेक्टर में दौलत बेग ओल्डी में दाखिल हो गए थे। यहां पर उन्होंने अपने कैंप बना लिए थे और करीब 20 दिन बाद यह विवाद सुलझ सका था। इस पूरे टकराव में भारत ने चीन के कैंप के सामने अपनी पोस्ट स्थापित कर दी थी। चीन लगातार यह कहता रहा था कि उसकी सेना अपनी सीमा के अंदर ही है। 16 अप्रैल को भारत ने चीन ने यथास्थिति बहाल करने की मांग की थी। कई फ्लैग मीटिंग्स के बाद पांच मई को आखिरकार चीन की सीमा ने अपने टेंट वहां से हटाए और अपनी सीमा में जवान वापस लौटे थे।

इस बार क्यों चिढ़ा है चीन
भारत और चीन के बीच इस बार तनाव का केंद्र बिंदु है गलवान घाटी। कहा जा रहा है कि चीनी सेना गलवान घाटी तक आ गई है। भारत की तरफ से बॉर्डर इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत किया जा रहा है।पिछले वर्ष बॉर्डर रोड ऑर्गनाइजेशन (बीआरओ) ने डारबुक-श्योक-डीबीओ यानी दौलत बेग ओल्डी में एक सड़क का निर्माण शुरू किया था। यह हिस्सा भारत की सीमा में पड़ता है। जिस जगह पर सड़क निर्माण हो रहा है वह भारतीय सीमा के 10 किलोमीटर के अंदर है और तकनीकी तौर पर भारत की सीमा है। लेकिन चीन इस बात को मानने पर राजी नहीं है। यह सड़क खासतौर पर गलवान नदी से होकर गुजरती है। सड़क को एलएसी से जोड़ने के मकसद से भारत इस सड़क का निर्माण करा रहा है। चीन को इस बात पर ही आपत्ति है।












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