Kuno नेशनल पार्क में फिर मां बनी 'गामिनी', तीन बच्चों को दिया जन्म, भारत के लिए कितना जरूरी है प्रोजेक्ट चीता?
Kuno National Park cheetah Gamini Cubs: मध्य प्रदेश के कूनो नेशनल पार्क (Kuno National Park) से वन्यजीव प्रेमियों के लिए, 18 फरवरी को एक सुखद खबर सामने आई है। दक्षिण अफ्रीका से लाई गई मादा चीता 'गामिनी' (Gamini) ने तीन स्वस्थ शावकों को जन्म दिया है।
केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री श्री भूपेंद्र यादव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' के पर इस खुशी को साझा किया। खास बात यह है कि यह खुशखबरी ठीक उस समय आई है जब भारत में दक्षिण अफ्रीकी चीतों के आगमन के तीन साल पूरे हुए हैं। जानिए क्या है प्रोजेक्ट चीता, भारत के लिए क्यों जरूरी है और इसकी क्या चुनौतियां हैं...

Cheetah Gamini Birth: दूसरी बार मां बनी चीता गामिनी
'प्रोजेक्ट चीता' (Project Cheetah) की सफलता की कहानी में आज एक और स्वर्णिम अध्याय जुड़ गया है। दक्षिण अफ्रीकी मूल की मादा चीता 'गामिनी' ने तीन शावकों को जन्म देकर कूनो नेशनल पार्क के कुनबे में इजाफा किया है। गामिनी अब भारत में दूसरी बार मां बनने वाली मादा चीता बन गई है।
कूनो नेशनल पार्क की फील्ड टीम और पशु चिकित्सकों की विशेष टीम गामिनी और उसके तीनों शावकों की चौबीसों घंटे निगरानी कर रही है। वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, जन्म के शुरुआती कुछ सप्ताह शावकों के जीवित रहने के लिए बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। गामिनी का पिछला रिकॉर्ड भी शानदार रहा है इससे पहले भी मार्च 2024 में उसने 6 शावकों को जन्म दिया था, जो इस कार्यक्रम के तहत एक रिकॉर्ड था।
India Cheetah Population 2026: आंकड़ों में 'प्रोजेक्ट चीता' की बड़ी छलांग
इन तीन नए नन्हे मेहमानों के आगमन के साथ ही भारत में चीतों के संरक्षण से जुड़े आंकड़े बेहद उत्साहजनक हो गए हैं। अब भारत में चीतों की कुल संख्या 38 हो गई है। भारत में अब तक चीतों के 9 सफल लिटर शावकों का जन्म हो चुका हैं। यहां जन्मे जीवित शावकों की संख्या अब बढ़कर 27 हो गई है।
फरवरी 2023 में दक्षिण अफ्रीका से 12 चीते भारत लाए गए थे। मंत्री भूपेंद्र यादव ने इस उपलब्धि पर गर्व जताते हुए कहा- कूनो के लिए और भारत के लिए यह गर्व का क्षण है। गामिनी और उसके तीन छोटे 'स्प्रिंटर्स' (दौड़ने वाले) स्वस्थ रहें और भारत की चीता पुनरुद्धार कहानी को गति और गरिमा के साथ आगे बढ़ाएं।
What is Project Cheetah: क्या है 'प्रोजेक्ट चीता'?
प्रोजेक्ट चीता केवल जानवरों को एक जगह से दूसरी जगह लाने का मिशन नहीं है, बल्कि यह भारत के पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) को फिर से जीवंत करने की एक ऐतिहासिक कोशिश है। यह दुनिया का पहला अंतर-महाद्वीपीय 'लार्ज कार्निवोर' (बड़े मांसाहारी जीव) ट्रांसलोकेशन प्रोजेक्ट है। जिसमें एक बड़े मांसाहारी जीव को एक महाद्वीप (अफ्रीका) से दूसरे महाद्वीप (एशिया) में लाकर बसाया जा रहा है।
बता दें कि ऐसी स्थिति एशियाई चीतों के विल्पुत होने के कारण शुरू हुई। बताते चलें कि भारत में कभी एशियाई चीते पाए जाते थे, लेकिन शिकार और जंगलों की कटाई से आवास की कमी के कारण 1952 में इन्हें भारत से विलुप्त घोषित कर दिया गया। 70 साल बाद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 17 सितंबर 2022 को नामीबिया से आए चीतों को कूनो नेशनल पार्क में छोड़कर इस प्रोजेक्ट की शुरुआत की।
चूंकि एशियाई चीते अब केवल ईरान में बचे हैं वहां भी उनकी संख्या बहुत कम, इसलिए भारत ने जेनेटिक रूप से मिलते-जुलते अफ्रीकी चीतों नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका को चुना है।
Cheetah Reintroduction Project भारत के लिए यह क्यों जरूरी है? क्या है इसकी चुनौतियां
पारिस्थितिकी तंत्र (Ecological Balance) की सही करने के लिए भारत लागातर प्रयत्न कर रहा है। दरअसल, चीता मुख्य रूप से घास के मैदानों और खुले जंगलों में रहता है। भारत में बाघ और शेर के संरक्षण से घने जंगलों को तो फायदा हुआ, लेकिन घास के मैदान खाली रह गए। चीता आने से इन 'ग्रासलैंड्स' का संरक्षण होगा, जिससे वहां रहने वाले अन्य जीव (जैसे काले हिरण, चिंकारा) भी सुरक्षित होंगे।
भारत दुनिया का इकलौता देश है जहां कभी शेर, बाघ, तेंदुआ और चीता चारों बड़े शिकारी साथ रहते थे। चीता की वापसी के साथ भारत ने अपनी खोई हुई प्राकृतिक विरासत को फिर से पा लिया है। यह फूड चेन (खाद्य श्रृंखला) के शिकारी के रूप में संतुलन बनाए रखेगा।
जलवायु परिवर्तन से लड़ाई
घास के मैदान कार्बन को सोखने (Carbon Sequestration) में जंगलों से कम नहीं होते। प्रोजेक्ट चीता के तहत जब इन मैदानों को संरक्षित किया जाता है, तो यह अप्रत्यक्ष रूप से जलवायु परिवर्तन के खिलाफ भारत की लड़ाई को मजबूती देता है। कूनो (मध्य प्रदेश) और गांधी सागर अभयारण्य जैसे इलाकों में चीता सफारी शुरू होने से 'इको-टूरिज्म' को बढ़ावा मिलेगा। इससे स्थानीय समुदायों के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और बुनियादी ढांचे का विकास होगा।
अब तक की सबसे बड़ी चुनौतियां
कूनो में चीतों के जीवीत रखना सबसे बड़ी चुनौती है क्योंकि अफ्रीकी और भारतीय जलवायु में अंतर है। शुरुआत में कुछ चीतों की मौत संक्रमण और मौसम के कारण हुई। चीता एक बहुत बड़ा इलाका (Territory) मांगता है। कूनो के बाद अब सरकार गांधी सागर अभयारण्य जैसे अन्य स्थानों को तैयार कर रही है ताकि उन्हें पर्याप्त जगह मिल सके। चीतों के खुले जंगल में जाने पर आसपास के गांवों के मवेशियों पर हमले का खतरा बना रहता है।
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