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पुण्यतिथि विशेष: कैसे मिला था चंद्रशेखर को ‘आजाद' नाम ? जानिए

Chandrashekhar Azad Death Anniversary: आजादी के महान स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आजाद आज ही के दिन 24 साल की छोटी उम्र में देश की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राण को न्योछावर कर दिये थे। उन्होंने कहा था कि मैं अंग्रेजों के हाथों कभी जिंदा नहीं पकड़ा जाऊंगा। इस वादे को निभाते हुए वो 27 फरवरी 1931 को अपनी ही पिस्टल से खुद को गोली मार ली थी।

इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में चंद्रशेखर आजाद ने अंग्रेजों से लोहा लेते हुए खुद को गोली मार ली थी। इनकी शहादत के बाद अब इस पार्क का नाम बदलकर आजाद पार्क कर दिया गया है। अपने नाम के ही अनुरुप आजाद के लिए ये पंक्ति बेहद ही सटीक साबित होती है 'दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे..आजाद ही रहे हैं, आजाद ही रहेंगे' आज के इस विशेष अवसर पर आइये जानते है कि चंद्रशेखर आजाद तिवारी के नाम के पिछे आजाद लगने की कहानी क्या है।

chandra shekhar azad

15 वर्ष की छोटी उम्र में असहयोग आंदोलन में शामिल हुए

1921 में गांधी जी द्वारा चलाया जा रहा असहयोग आंदोलन पूरे चर्म पर था। पूरे देश में क्रांति की लहर दौड़ रही थी। अंग्रेजों के खिलाफ भारतवासियों में जबरदस्त आक्रोश था। ऐसे में महान स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आजाद भी कहां पिछे हटने वाले थे वो भी मात्र 15 वर्ष की छोटी आयु में ही इस आंदोलन में शामिल हो गए। इसके लिए उन्हें ब्रिटिश पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। उसके बाद की जो घटना हुई उसने पूरे देश को इस स्वतंत्रता सेनानी के नाम का परिचय करवा दिया।

चंद्रशेखर को पुलिस ने गिरफ्तार करके जज के सामने पेश किया। जब जज ने उनसे पूछा तुम्हारा नाम क्या है तो उस किशोर ने जवाब दिया... नाम- "आजाद" जज ने फिर पुछा पिता का नाम- उन्होंने कहा- "स्वतंत्रता" पता- "जेलखाना" यह सुनते ही जज गुस्से से लाल हो गया और उसने 15 साल के चंद्रशेखर को 15 बेतों की सजा सुना दी।

इस घटना ने पूरे देश को हिला दिया

इस घटना ने पूरे देश को हिला के रख दिया। चंद्रशेखर आजाद को जैसे ही पहला बेंत लगा उन्होंने जोर से नारा लगाते हुए कहा वंदे मातरम। पहले से भी ज्यादा क्रुर तरीके से हर अगले बेंत से प्रहार किया जाता था। वो प्रत्येक बेंत पर वंदे मातरम, भारत माता की जय और महात्मा गांधी की जय का नारा लगाते रहे। यह देखकर अंग्रेजों के होश उड़ गए। छोटी उम्र देखकर अंग्रेजों ने सोचा वो इतनी मार खाने के बाद रो पड़ेंगे या माफी मांगेंगे लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। आजादी पाने का ऐसा जोश, ऐसा जुनून, ऐसी दीवानीगी कि सबकुछ छोड़ इन्होंने अपना जीवन भारत माता के लिए समर्पित कर दिया।

उस समय अंग्रेजों द्वारा बनाए गए बेंतों की सजा आजकल जैसी कोई आम सजा नहीं थी। इस सजा का उद्देश्य ही होता था आंदोलन में शामिल क्रांतिकारियों का मनोबल तोड़ना ताकि वह दोबारा क्रांतिकारी गतिविधियों में हिस्सा न ले। इस सजा में एक मोटी छड़ी (जिसे बेंत या कोड़ा भी कहते हैं) से कैदी की पीठ या जांघों पर जोरदार प्रहार किया जाता था। इस प्रहार से उनके चमड़ी भी फट जाते थे। कभी- कभी तो इस असहनीय प्रहार से लोग बेहोश भी हो जाते थे।

इस घटना के बाद पूरे देश ने इस क्रांतिकारी को जान लिया और उनका नाम पड़ा चंद्रशेखर आजाद। उनके पिता का नाम सीताराम तिवारी और माता का नाम जगरानी देवी था। आजाद का जन्म 23 जुलाई, 1906 को मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले के भाबरा नामक स्थान पर हुआ था।

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