Caste Survey: बिहार के जाति आधारित सर्वे को सुप्रीम कोर्ट में किस आधार पर दी गई है चुनौती? जानिए सबकुछ

Caste Survey Bihar: बिहार में जातिगत सर्वे पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक तो नहीं लगाई है, लेकिन इस मामले पर पटना हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ दी गई चुनौती पर यहां सुनवाई चल रही है। सुप्रीम कोर्ट में बिहार सरकार के इस फैसले की संवैधानिकता पर सवाल उठाया गया है।

बार एंड बेंच की एक रिपोर्ट के मुताबिक शुक्रवार को यूथ फॉर इक्वलिटी बनाम बिहार राज्य के मामले में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस एसवीएन भट्टी की बेंच ने कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां की हैं।

caste survey bihar

आपकी जाति आपके पड़ोसियों को पता है- सुप्रीम कोर्ट
जस्टिस संजीव खन्ना ने इस सर्वे की वजह से निजता के उल्लंघन होने की दलील पर कहा है, 'आपकी जाति आपके पड़ोसियों को पता है। दुर्भाग्य से बिहार में यह सच्चाई है। दिल्ली में हम नहीं जानते।' इससे पहले 14 अगस्त को इसी अदालत ने इस विवादित जातिगत सर्वेक्षण पर रोक लगाने वाली याचिका को खारिज कर दिया था।

पटना हाई कोर्ट ने बिहार सरकार के फैसले पर लगाई है मुहर
इससे पहले 1 अगस्त को पटना हाई कोर्ट ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को जातिगत सर्वे का काम जारी रखने की अनुमति देकर बहुत बड़ी राजनीतिक राहत दी थी। हाई कोर्ट ने कहा था कि राज्य सरकार की प्रक्रिया पूरी तरह से वैध, उचित तरीके से शुरू की गई और 'जनहित के अनुरूप' है।

जातिगत सर्वे के पीछे की सोच ?
बिहार सरकार ने जातिगत सर्वे इस उद्देश्य से शुरू किया है कि इसकी मदद से एक व्यापक सामाजिक-आर्थिक डेटा जुटाया जा सकेगा। इससे उसे हाशिए पर रहने वाली जातियों/समुदायों के हिसाब से नीतियां बनाने में सुविधा होगी।

जातिगत सर्वे क्या है?
जातिगत सर्वे के माध्यम से बिहार सरकार राज्य में जातियों, उपजातियों और धार्मिक समूहों का पूरा ब्योरा जुटा रही है। लक्ष्य राज्य के 38 जिलों के लगभग 12.70 करोड़ लोगों का सामाजिक और आर्थिक आंकड़े जमा करना है। औपचारिक मकसद, जातियों और समुदायों का जीवन स्तर और आर्थिक हालातों का पता लगाना है।

जातिगत सर्वे की जरूरत क्यों पड़ी?
दलील ये दी गई है कि सामान्य जनगणना से अनुसूचित जाति और जनजातियों से जुड़ा व्यापक डेटा ही मिल पाता है। लेकिन, खासकर ओबीसी और अन्य जातियों की सामाजिक-आर्थिक हैसियत की जानकारी नहीं मिल पाती। इसकी वजह से उनके लिए खास नीतियां और योजनाएं तैयार करने में मुश्किल होती है। दलील यह भी दी गई है कि जातिगत सर्वे से विभिन्न जातियों के समान विकास में सहायता मिलेगी।

केंद्र का रुख
केंद्र सरकार के मुताबिक सामाजिक-आर्थिक जनगणना अव्यवहारिक, प्रशासनिक रूप से मुश्किल और बोझिल है। महाराष्ट्र सरकार की एक रिट याचिका के जवाब में केंद्र के हलफनामे में इस बात पर जोर दिया गया था कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के अलावा अन्य जाति-आधारित आंकड़े नहीं जुटाना, 1951 की जनगणना से ही एक सचेत नीतिगत निर्णय रहा है।

केंद्र का यह भी कहना है कि 1951 की जनगणना से ही आधिकारिक तौर पर जाति पर जोर नहीं देने की नीति का पालन किया गया है। 2011 में केंद्र सरकार ने सामाजिक-आर्थिक और जातीय जगणना की भी थी, लेकिन डेटा की गलतियों की वजह से करीब 130 करोड़ भारतीयों से संबंधित आंकड़े कभी जारी नहीं किए गए।

जातिगत सर्वे के विरोध में दलील?
जातिगत सर्वे के विरोध में एक दलील यह दी जाती है कि बिहार सरकार के इस फैसले से वह अपने संवैधानिक दायरे को लांघ रही है, क्योंकि इस तरह की व्यापक जनगणना का अधिकार सिर्फ केंद्र सरकार के पास है। यह भी कि यह कार्य कार्यपालिका के आदेश से हो रहा है, जिससे निजी डेटा का सरकार की ओर से दुरुपयोग किया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट के सामने अहम सवाल
सुप्रीम कोर्ट को यह तय करना है कि इस तरह का जातिगत सर्वेक्षण संवैधानिक मान्यताओं के अनुसार है या नहीं? सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला मील का पत्थर साबित हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट को यह भी देखना है कि कहीं इस तरह के आंकड़े लीक होने से नागरिकों के 'निजता का अधिकार' खतरे में तो नहीं पड़ेगा?

क्योंकि, हाल के वर्षों में खुद सुप्रीम कोर्ट ने इसपर बहुत ध्यान दिया है। यह भी देखना होगा कि कहीं सत्ताधारी राजनीतिक दल इस तरह से जुटाए गए डेटा का इस्तेमाल अपने सियासी फायदे के लिए तो नहीं करने लगेंगे?

सुप्रीम कोर्ट को यह भी देखना होगा कि कहीं इससे 'समानता का अधिकार' जैसे मौलिक अधिकार का तो उल्लंघन नहीं हो रहा है? क्या इस तरह की प्रक्रिया से सामाजिक भेदभाव कम होने के बजाए और बढ़ नहीं जाएंगे?

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+