दयाशंकर के कारण बसपा को मिली 'संजीवनी'!
लखनऊ। स्वामी प्रसाद मौर्या, आरके चौधरी सरीखे वरिष्ठ नेताओं के साथ बसपा का टाइटल मिट जाने के बाद बहुजन समाज पार्टी में जंग अस्तित्व को बचाने की खातिर शुरू हो गई थी। बसपा सुप्रीमों मायावती संजीवनी की तलाश में जुटीं थी कि किसी तरह से वे आने वाली सर्दियों में चुनावी सरगर्मियां बढ़ाने का माद्दा रखें। इस फेहरिस्त में उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के उपाध्यक्ष दयाशंकर के बयान ने बसपा में फिर से प्राण फूंक दिए।
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महंगा पड़ेगा बयान!
सूबे में सियासी माहौल के आंकलन और लोगों से बातचीत के मुताबिक भाजपा की जबरजस्त वापसी हुई थी लेकिन दयाशंकर के इस बयान से कहीं न कहीं सभी लोगों को आपत्ति होगी। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक भी यह माया के लिए बहुत बड़ा मौका साबित होगा। और भाजपा की इस गलती का वे बखूबी फायदा उठाएंगी।
एक तीर कई निशाने
सूबे में सियासत में अपनी अच्छी तरह से पकड़ बनाने के लिए सियासी दलों ने आंबेडकर को तो कांधे पर लादकर अपना बताना शुरू कर दिया लेकिन स्त्रीत्व पर हुई इस टिप्पणी पर पुरजोर विरोध होना लाजिमी है। साथ ही मायावती ने दांव चलते हुए कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने के लिए बेबाकी से धमकी भी दे डाली कि अब यदि उनके कार्यकर्ता सड़कों पर उतर आएं तो उनकी जिम्मेदारी नहीं होगी।
मतलब साफ है...एक विशालकाय प्रदर्शन। जिसमें मुखालिफत होगी सभी दावेदारों की। जनता यकीन भी करेगी क्योंकि बसपा प्रमुख मायावती के पास तथ्य है दयाशंकर की बद्जुबानी का।
सुपरस्टार तो न बन पाए, फ्लॉप जरूर हो गए
जहां बीते कई कार्यक्रमों में भाजपा दलितों को करीब लाने की हर संभव कोशिश करती हुई नजर आई है, उसे इस घटनाक्रम के बात तगड़ा झटका लगने वाला है। हालांकि उपाध्यक्ष पद से दयाशंकर को हटाया जाना भी दलितों का हिमायती बताने की खातिर हुआ है।
संदेश है कि किसी भी तरह की विवादित टिप्पणी करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। लेकिन कई कद्दावर पार्टी के वरिष्ठ पदों पर आसीन हैं और विवादित बयानों की बात...तो बिलकुल पूछिए ही मत। मुग़ालता दयाशंकर को भी यही था कि वे इस बयान के सहारे दिनों दिन सुपर स्टार बन जाएंगे। लेकिन बयान में जिसको घेरना चाहा वो तो नहीं बल्कि पूरा स्त्रीत्व समा गया और सितारे गर्दिश में चले गए।
मिल गया बसपा को मुद्दा
मुद्दा ''विकास'' हो नहीं सकता क्योंकि गुलाबी पत्थरों पर विकास की परिभाषा चीख-चीखकर पैसे के बेफजूल खर्च की दुहाईयां दे रही है। जातिवाद के सहारे यूपी की सियासत में कुर्सी पाने की लालसा करीबन सभी दलों की थी। जिसमें आंबेडकर को सभी दलों द्वारा कंधे पर टिकाने के बाद बसपा की ख्वाहिशों में धूल जरूर पड़ी थी। पर, अब मुद्दा होगा महिलाओं की इज्जत, मायावती का अपमान, सियासत में फायदा तलाशने की खातिर चरित्र पर लांछन..... जिसमें मायावती के साथ दलित खेमे के साथ अन्य भी फिर से एकजुट होते नजर आ रहे हैं।












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