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बीपी मंडल जिनकी सिफ़ारिशों ने भारत की राजनीति बदल दी

By Bbc Hindi
बीपी मंडल
Manish Shandilya/BBC
बीपी मंडल

साल 1990 में केंद्र की तत्कालीन विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार ने दूसरा पिछड़ा वर्ग आयोग, जिसे आमतौर पर मंडल आयोग के रूप में जाना जाता है, की एक सिफ़ारिश को लागू किया था.

ये सिफारिश अन्य पिछड़ा वर्ग के उम्मीदवारों को सरकारी नौकरियों में सभी स्तर पर 27 प्रतिशत आरक्षण देने की थी. इस फ़ैसले ने भारत, खासकर उत्तर भारत की राजनीति को बदल कर रख दिया. इस आयोग के अध्यक्ष थे बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल यानी बीपी मंडल.

साल 2018 बीपी मंडल का जन्मशती वर्ष है. बीपी मंडल का जन्म 25 अगस्त, 1918 को बनारस में हुआ था.

बीपी मंडल विधायक, सांसद, मंत्री और बिहार के मुख्यमंत्री भी रहे. लेकिन दूसरा पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष के रूप की गई सिफ़ारिशों के कारण ही उन्हें इतिहास में नायक, खासकर पिछड़ा वर्ग के एक बड़े आइकन के रूप में याद किया जाता है.

दूसरा पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन आपातकाल के बाद 1977 में हुए चुनावों में बनी जनता पार्टी की मोरारजी भाई देसाई की सरकार ने किया था.

दरअसल, जनता पार्टी ने अपने घोषणापत्र में ऐसे आयोग के गठन की घोषणा की थी.

बीपी मंडल
Manish Shandilya/BBC
बीपी मंडल

हरियाणा के पूर्व राज्यपाल धनिक लाल मंडल मोरारजी सरकार में गृह राज्य मंत्री थे. उन्होंने ही तब राज्य सभा में इस आयोग के गठन की घोषणा की थी. अभी चंडीगढ़ में रह रहे करीब 84 साल के धनिक लाल मंडल से मैंने फ़ोन पर पूछा कि आप की सरकार ने तब इस आयोग के अध्यक्ष बतौर बीपी मंडल का ही चुनाव क्यों किया?

इसके जवाब में वो कहते हैं, ''तय ये हुआ था कि आयोग का जो अध्यक्ष हो उसकी बड़ी हैसियत होनी चाहिए. वो (बीपी मंडल) बिहार के मुख्यमंत्री रह चुके थे. साथ ही वे पिछड़ा वर्ग के हितों के बड़े हिमायती थे. वे इसके बड़े पैरोकार थे कि पिछड़ा वर्ग को आरक्षण मिलना चाहिए.''

धनिक लाल मंडल
Shabhu Mandal/BBC
धनिक लाल मंडल

बचपन से की आवाज़ बुलंद

बीपी मंडल का जब जन्म हुआ था, तब उनके पिता रास बिहारी लाल मंडल बीमार थे और बनारस में आखिरी सांसें गिन रहे थे. जन्म के अगले ही दिन बीपी मंडल के सिर से पिता का साया उठ गया. मृत्यु के समय रास बिहारी लाल मंडल की उम्र सिर्फ़ 54 साल थी.

बीपी मंडल का ताल्लुक बिहार के मधेपुरा ज़िले के मुरहो गांव के एक जमींदार परिवार से था. मधेपुरा से पंद्रह किलोमीटर की दूरी पर बसा है मुरहो. इसी गांव के किराई मुसहर साल 1952 में मुसहर जाति से चुने जाने वाले पहले सांसद थे.

मुसहर अभी भी बिहार की सबसे वंचित जातियों में से एक है. किराई मुसहर से जुड़ी मुरहो की पहचान अब लगभग भुला दी गई है. अब ये गांव बीपी मंडल के गांव के रूप में ही जाना जाता है.

राष्ट्रीय राजमार्ग-107 से नीचे उतरकर मुरहो की ओर बढ़ते ही बीपी मंडल के नाम का बड़ा सा कंक्रीट का तोरण द्वार है. गांव में उनकी समाधि भी है.

बीपी मंडल की शुरुआती पढ़ाई मुरहो और मधेपुरा में हुई. हाई स्कूल की पढ़ाई दरभंगा स्थित राज हाई स्कूल से की. स्कूल से ही उन्होंने पिछड़ों के हक़ में आवाज़ उठाना शुरू कर दिया था.

जदयू प्रवक्ता एडवोकेट निखिल मंडल बीपी मंडल के पोते हैं. वे अभी बीपी मंडल जन्मशती सामरोह से जुड़े आयोजन के सिललिले में मुरहो में ही हैं.

निखिल मंडल
BBC
निखिल मंडल

वे बताते हैं, ''राज हाई स्कूल में बीपी मंडल हॉस्टल में रहते थे. वहां पहले अगड़ी कही जाने वाली जातियों के लड़कों को खाना मिलता उसके बाद ही अन्य छात्रों को खाना दिया जाता था. उस स्कूल में फॉरवर्ड बेंच पर बैठते थे और बैकवर्ड नीचे. उन्होंने इन दोनों बातों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई और पिछड़ों को भी बराबरी का हक मिला.''

स्कूल के बाद की पढ़ाई उन्होंने बिहार की राजधानी के पटना कॉलेज से की. पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने कुछ दिन तक भागलपुर में मजिस्ट्रेट के रूप में भी सेवाएं दीं और साल 1952 में भारत में हुए पहले आम चुनाव में वे मधेपुरा से कांग्रेस के टिकट पर बिहार विधानसभा के सदस्य बने.

बीपी मंडल को राजनीति विरासत में भी मिली थी. निखिल बताते हैं कि बीपी मंडल के पिता कांग्रेस के संस्थापक सदस्यों में से एक थे.

जगन्नाथ मिश्रा के साथ बीपी मंडल
Nikhil Mandal/BBC
जगन्नाथ मिश्रा के साथ बीपी मंडल

पचास दिन रहे मुख्यमंत्री

बीपी मंडल साल 1967 में लोकसभा के लिए चुने गए. हालांकि तब तक वे कांग्रेस छोड़कर राम मनोहर लोहिया की अगुवाई वाली संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के प्रमुख नेता बन चुके थे. 1967 के चुनाव के बाद बिहार में महामाया प्रसाद सिन्हा के नेतृत्व में पहली गैर कांग्रेस सरकार बनी जिसमें बीपी मंडल स्वास्थ्य मंत्री बने. ये एक गठबंधन सरकार थी और इसके अपने अंतर्विरोध थे. ये सरकार करीब 11 महीने ही टिक पाई.

इस बीच बीपी मंडल के भी अपने दल से गंभीर मतभेद हो गए. उन्होंने संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से अलग होकर शोषित दल बनाया और फिर अपने पुराने दल कांग्रेस के ही समर्थन से एक फरवरी, 1968 को बिहार के मुख्यमंत्री बने. मगर इस पद पर वे महज पचास दिन तक ही रहे.

उनके मुख्यमंत्री बनने के पहले केवल पांच दिन के लिए बिहार के कार्यवाहक मुख्यमंत्री रहे बीपी मंडल के मित्र सतीश प्रसाद सिंह उस दौर के घटनाक्रम को याद करते हुए कहते हैं, ''मुख्यमंत्री बनने के पहले उनका बिहार विधान परिषद का सदस्य बनना ज़रूरी था. एक एमएलसी परमानंद सहाय ने इस्तीफ़ा दिया. इसके बाद कैबिनेट की मीटिंग बुलाकर मैंने मंडल जी को एमएलसी बनाने की सिफ़ारिश की और फिर अगले दिन विधान परिषद का सत्र बुलाकर उनको शपथ भी दिला दी. इस तरह उनके मुख्यमंत्री बनने का रास्ता साफ़ कर दिया.''

बीपी मंडल
Nikhil Mandal/BBC
बीपी मंडल

इंदिरा ने लागू नहीं की रिपोर्ट

मंडल आयोग का गठन मोरारजी देसाई की सरकार के समय 1 जनवरी, 1979 को हुआ और इस आयोग ने इंदिरा गांधी के कार्यकाल के दौरान 31 दिसंबर 1980 को रिपोर्ट सौंपी. उनके मित्र रहे बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री सतीश प्रसाद सिंह बताते हैं, ''1980 के आम चुनाव में मैं कांग्रेस पार्टी के टिकट पर सांसद बना था. सरकार बदलने के बाद बीपी मंडल के कहने पर मैंने आयोग का कार्यकाल बढ़ाने की सिफारिश तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से की थी. जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया.''

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र कहते हैं कि उन्हें छोटे भाई के रूप में बीपी मंडल का स्नेह मिला. जगन्नाथ मिश्र बताते हैं कि बीपी मंडल ने अपनी रिपोर्ट में इंदिरा गांधी की तारीफ भी की है.

उनकी रिपोर्ट पर इंदिरा गांधी की राय जगन्नाथ मिश्र इन शब्दों में सामने रखते हैं, ''इंदिरा जी महसूस करती थीं कि ये सोशल हार्मोनी के लायक नहीं है. इसे तत्काल लागू करना ठीक नहीं है. बाद में अगर वीपी सिंह और देवी लाल का झगड़ा नहीं होता तो रिपोर्ट लागू ही नहीं होती.''

आयोग अध्यक्ष बीपी मंडल के काम का मूल्यांकन करते हुए धनिक लाल मंडल कहते हैं, ''काम तो ठीक ही कर रहे थे मगर उन्होंने रिपोर्ट पूरा करने में बहुत समय ले लिया. हम गृहमंत्री की हैसियत से उनको कहते भी रहे कि ज़रा जल्दी कर दीजिए जिससे कि हमारी सरकार इसकी अनुशंसाओं पर विचार कर सके. मगर उन्होंने समय कुछ अधिक लगा दिया.''

धनिक लाल मंडल का कहना है कि उनकी सरकार के कार्यकाल में अगर मंडल आयोग की रिपोर्ट मिल जाती तो उनकी सरकार ही पिछड़े वर्ग के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण लागू कर देती.

पत्नी के साथ बीपी मंडल
Nikhil Mandal/BBC
पत्नी के साथ बीपी मंडल

'ईमानदारी थे और कंजूस भी'

बीपी मंडल का जीवन सादगी और सहजता से भरा था. जैसा कि निखिल मंडल बताते हैं, ''मेरी बहन पटना के माउंट कॉर्मेल स्कूल में पढ़ती थी. दादाजी को जब मौका मिलता वे खुद कार चलाकर उसे स्कूल छोड़ने या लाने चले जाते थे. बिना लाव-लश्कर के मधेपुरा आया करते थे. वे जमींदार परिवार से थे लेकिन कोई गरीब व्यक्ति भी आता तो बराबरी और सम्मन के साथ बिठाकर बात करते थे.''

वहीं सतीश प्रसाद सिंह बताते हैं, ''गुण तो बहुत था मगर कुछ अवगुण भी थे. जो बोलना था वे बोल देते थे, उसके असर के बारे में सोचते नहीं थे. जैसे कि मुख्यमंत्री रहते कांग्रेस के एक नेता के बारे में कह दिया कि 'बार्किंग डॉग्स सेल्डम बाइट'. और इस बयान के कुछ दिन बाद उनकी सरकार गिरा दी गई. गुण ये था कि ईमानदार बहुत थे. साथ ही कंजूस भी बहुत थे. एक पैसा खर्च करना नहीं चाहते थे. हम दोनों के पास फिएट गाड़ी थी मगर वे कहते थे कि सतीश बाबू आपकी गाड़ी नई है, उसी से चलेंगे. इस पर मैं कहता कि ऐसी बात नहीं है, आप पैसे बचाना चाहते हैं.''

बीपी मंडल
Nikhil Mandal/BBC
बीपी मंडल

कोसी इलाके में जगन्नाथ मिश्र और बीपी मंडल के परिवार के बीच राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता भी रही. इसकी एक वजह मधेपुरा को ज़िला बनाने के लेकर हुआ विवाद भी था. बताया जाता है कि राजनीतिक कारणों से मधेपुरा से पहले सहरसा को ज़िला बना दिया गया.

लेकिन अस्सी के दशक में जब जगन्नाथ मिश्र ने मुख्यमंत्री रहते मधेपुरा को ज़िला बनाया तो बीपी मंडल ने मंच से जगन्नाथ मिश्र की तारीफ़ की.

जगन्नाथ मिश्र याद करते हैं, ''मधेपुरा के ज़िला बनने संबंधी आयोजन में जो जमात इकट्ठी हुई वो ऐतिहासिक थी. मंच से ही मैंने ज़िले के डीएम-एसपी के नाम की घोषणा की. मंच पर बीपी मंडल भी मौजूद थे. उन्होंने कहा कि ये (जगन्नाथ) मेरा बच्चा है. हम इसे आशीर्वाद देते हैं. ये मधेपुरा के लिए बहुत कुछ करेगा.''

13 अप्रैल, 1982 को पटना में बीपी मंडल की मौत हुई. उस वक्त जगन्नाथ मिश्र ही बिहार के मुख्यमंत्री थे.

मंडल के परिजनों ने ख्वाहिश जताई कि वे अंतिम संस्कार मधेपुरा स्थित पैतृक गांव मुरहो में करना चाहते हैं. जगन्नाथ मिश्र बताते हैं कि तब मैंने न सिर्फ़ उनका पार्थिव शरीर ले जाने के लिए सरकारी प्लेन का इंतजाम किया बल्कि उनके शव के साथ उनके गांव तक भी गया.

बीपी मंडल, इंदिरा गांधी, ज्ञानी जैल सिंह
Nikhil Mandal/BBC
बीपी मंडल, इंदिरा गांधी, ज्ञानी जैल सिंह

कई सिफ़ारिशें लागू होना बाक़ी

मंडल आयोग की सिफारिशों के आधार पर पहले 1990 में पिछड़ा वर्ग को नौकरियों में आरक्षण मिला और बाद में मनमोहन सिंह की सरकार के कार्यकाल के दौरान साल 2006 में उच्च शिक्षा में ये व्यवस्था लागू की गई.

मंडल आयोग की सिफ़ारिशें लागू होने, ख़ास कर नौकरी संबंधी सिफ़ारिश के लागू होने के बाद पिछड़ा वर्ग से आने वाली एक बड़ी आबादी अब जवान हो चुकी है.

ऐसे में मैंने युवा नेता और राष्ट्रीय लोकतांत्रिक दल के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य संतोष यादव से पूछा कि युवा पीढ़ी उन्हें किस रूप में याद करती है?

संतोष कहते हैं, ''मंडल कमीशन ने इस देश में एक नई चेतना का विस्तार किया है. मंडल के दौर में हम बच्चे थे. सिफ़ारिशों के लागू होने से हुई सामाजिक हलचल को मैंने देखा है. पिछड़ा वर्ग से आने वाले युवा उन्हें एक नायक, एक आइकन, एक उद्धारक के रूप में याद करते हैं.''

बीपी मंडल का पैतृक घर
Nikhil Mandal/BBC
बीपी मंडल का पैतृक घर

दूसरी ओर मंडल आयोग की कई अहम सिफ़ारिशों को अभी भी ज़मीन पर उतारा जाना बाकी है. ये जानना दिलचस्प है कि एक जमींदार परिवार से ताल्लुक रखते हुए भी मंडल आयोग की सिफ़ारिशों में भूमि सुधार संबंधी सिफ़ारिश भी है.

राजनीतिक विश्लेषक महेंद्र सुमन कहते हैं, ''देश की विशाल आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाले पिछड़ा वर्ग को आज़ादी के क़रीब पांच दशक बाद मंडल आयोग की एक सिफ़ारिश लागू होने से अधिकार मिला. लेकिन सामाजिक न्याय को पूरी तरह से ज़मीन पर उतारने के लिए उनकी दूसरी कई सिफ़ारिशों को भी लागू किया जाना ज़रूरी है. जिनमें शिक्षा-सुधार, भूमि-सुधार, पेशागत जातियों को सरकारी स्तर पर नई तकनीक और व्यापार के लिए वित्तीय मदद मुहैया कराने से जुड़ी सिफ़ारिशें शामिल हैं. इन्हें लागू करना ही बीपी मंडल को सही मायनों में श्रद्धांजलि देना होगा.''

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English summary
BP Division whose references changed the politics of India

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