Bofors घोटाला: जब 34 साल पहले विपक्षी सांसदों की 'एकजुटता' से आया संसद में भूचाल, 10 बड़ी बातें
Bofors घोटाला पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार के दौरान का ऐसा विवादित मामला है, जिसका तीन दशक से अधिक समय बीतने के बाद भी गाहे-ब-गाहे राजनीतिक गलियारों में जिक्र होता ही है।
बोफोर्स के मामले में 24 जून की तारीख विशेष है। ऐसा इसलिए क्योंकि इसी दिन बोफोर्स स्कैम मामले में CAG की रिपोर्ट आने के बाद बड़ी संख्या में लोक सभा सांसदों ने इस्तीफे दिए। इसे राजनीतिक पंडित विपक्षी एकजुटता की नजीर भी मानते हैं।

- बोफोर्स एक स्वीडिश हथियार निर्माता है। भारत को 155 मिमी फील्ड होवित्जर (सेना द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला युद्ध का एक भारी हथियार) की सप्लाई के बोली और फाइनल बिडिंग के दौरान रिश्वतखोरी के आरोप लगे।
- 24 जून 1989 को बोफोर्स तोप सौदे पर नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट के मुद्दे पर संसद में हंगामा। अधिकांश विपक्षी सदस्यों ने लोकसभा से इस्तीफा दे दिया।
- बोफोर्स घोटाले की गंभीरता और हाईप्रोफाइल केस का अंदाजा इसी से होता है कि 1980 और 1990 के दशक में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी सहित कई प्रमुख कांग्रेस राजनेता जांच के दायरे में थे।
- 34 साल पहले इस घोटाले के कारण जनाक्रोश भी पनपा। 1989 के आम चुनावों में सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी की करारी हार हुई। जांच से जुड़ी मीडिआ रिपोर्ट्स में शीर्ष कांग्रेस राजनेताओं और रक्षा अधिकारियों को 12 मिलियन डॉलर की रिश्वत देने की बातें सामने आई।
- रक्षा मंत्री के रूप में विश्वनाथ प्रताप सिंह के कार्यकाल के दौरान घोटाले का पर्दाफाश हुआ। खोजी पत्रकारों के साथ एन. राम ने इसका खुलासा किया। खबरों को दबाने जैसे आरोप भी लगे।
- पत्रकार चित्रा सुब्रमण्यम ने 350 से अधिक दस्तावेज़ जुटाए, जिनसे रिश्वत का पता लगा। सरकार के भारी दबाव के बावजूद द इंडियन एक्सप्रेस और द स्टेट्समैन जैसे अखबारों में प्रकाशन के बाद हड़कंर मचा।
- रिपोर्ट्स के अनुसार, घोटाले की 25वीं वर्षगांठ पर एक इंटरव्यू में, स्वीडिश पुलिस के पूर्व प्रमुख स्टेन लिंडस्ट्रॉम ने सुब्रमण्यम के साथ दस्तावेज़ शेयर करने के कारण बताए थे।
- बोफोर्स की शुरुआत 1986 में ही हो गई थी। भारत ने 150 मिमी वाले 400 से अधिक हॉवित्जर तोपों की आपूर्ति के लिए बोफोर्स के साथ 1.4 बिलियन डॉलर की डील की।
- 1987 तक, स्वीडिश रेडियो के अनुसार, डील के लिए शीर्ष भारतीय रक्षा अधिकारियों और राजनेताओं को रिश्वत दी गई। हालांकि, तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया।
- भारत में बोफोर्स घोटाले को लेकर भले ही राजनीतिक विवाद हुआ। पाकिस्तान के खिलाफ कारगिल युद्ध में बोफोर्स तोप पाक को पटखनी देने में बेहद मारक साबित हो जाए। युद्धक्षेत्र कमांडरों की मानें तो, इससे भारत को पाकिस्तान पर निश्चित बढ़त मिली थी।
अमेरिकी जासूस और बोफोर्स
गौरतलब है कि बोफोर्स घोटाले में प्राइवेट अमेरिकी जासूस मिशेल हर्शमैम का नाम सामने आया था। मिशेल का आरोप था कि राजीव गांधी और तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने उसकी पड़ताल को रोकने की कोशिश की। मिशेल के अनुसार, राजीव इस बात से काफी अपसेट थे कि स्विस बैंक खातों की जानकारी उस तक कैसे पहुंची।
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