बीएमसी पोल: विधानसभा चुनाव के बाद बीएमसी में भी हुई दुर्गति, मुंह के बल गिरी MNS
2009 के विधानसभा चुनाव में मनसे ने 288 में से 13 सीटों पर जीत दर्ज की और चौथी सबसे बड़ी पार्टी बन गई। लेकिन 2014 का चुनाव मनसे के लिए कई मायनों में नैया डुबोने वाला बन गया।
मुंबई। बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) चुनाव में करारी शिकस्त के साथ महाराष्ट्र की राजनीति में राज ठाकरे और उनकी पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के लिए अस्तित्व का संकट आ गया है। पार्टी के लिए बीएमसी चुनाव एक तरह से खुद को बचाए रखने की लड़ाई थी लेकिन इस बार पार्टी की नाव डूब गई। साफ संकेत है कि चुनाव में सिर्फ सात सीटें पाने वाली मनसे का हाल बेहाल हो चुका है।

पार्टी के मराठी राग ने सीमित किया दायरा
राज ठाकरे ने साल 2006 में शिवसेना से अलग होकर जब मनसे की घोषणा की तभी से उनका राग सिर्फ मराठी ही था। महाराष्ट्र में दूसरे राज्यों से आने वाले लोगों (खास कर उत्तर भारत के लोगों) के प्रति पार्टी का रवैया जगजाहिर है। मनसे के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने यूपी और बिहार के लोगों से काफी दुर्व्यवहार किया। धीरे-धीरे पार्टी को इसका खामियाजा भुगतना पड़ा और राजनीतिक तौर पर प्रतिनिधित्व के मामले में पार्टी सिमटती गई। आलम यह हुआ कि पिछवे चुनाव में बीएमसी में 28 सीटें जीतने वाली मनसे सात सीटों पर सिमट गई। READ ALSO: BMC चुनाव में शिवसेना की जिद से चमका बीजेपी का GOOD LUCK

2009 में बनी थी चौथी सबसे बड़ी पार्टी
2009 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने 288 में से 13 सीटों पर जीत दर्ज की और चौथी सबसे बड़ी पार्टी बन गई। लेकिन 2014 का चुनाव मनसे के लिए कई मायनों में नैया डुबोने वाला बन गया। चुनाव में पार्टी ने पूरे राज्य में सिर्फ एक सीट जीती। पार्टी ने अपने कब्जे वाली सारी सीटें खो दीं। READ ALSO: BMC चुनाव में कांग्रेस की करारी हार, संजय निरुपम का इस्तीफा

2014 में रिकॉर्ड 203 उम्मीदवारों की जमानत हुई थी जब्त
पार्टी ने 2014 के विधानसभा चुनाव में 288 में से 218 सीटों पर उम्मीदवार उतारे लेकिन उसे मुंह की खानी पड़ी। 203 सीटों पर पार्टी के उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई। इस चुनाव में करारी हार के बाद मनसे के पास उबरने का एक मौका महानगरपालिका के चुनाव ही थे। लेकिन यहां भी उससे करारी शिकस्त मिली। READ ALSO: BMC चुनाव 2017 मतगणना: बीजेपी-शिवसेना में जबरदस्त टक्कर, कांग्रेस तीसरे नंबर पर

कई बार झेलनी पड़ी आलोचना
लगातार मिली हार और कम होती सीटों की वजह से मनसे के सामने अपने ही गढ़ में अस्तित्व का संकट आ गया है। पार्टी के अगुवा राज ठाकरे और उनके सहयोगियों ने राज्य में जिस तरह अपना वर्चस्व कायम करने के लिए कदम उठाए उससे कई बार सवाल उठे और आलोचना भी झेलनी पड़ी। पार्टी के लिए 2014 का चुनाव बेहद अहम था। पिछले चुनावों में शिवसेना और मनसे के करीब आने भी काफी चर्चा रही लेकिन यह गठबंधन नहीं हो सका और इसका पतन जारी रहा।
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